भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 804 में से

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८६ : मीमांसादर्शनम् [ सू० ब्राह्मण भाग के विधिवाक्य के साथ अन्वय होता है । ब्राह्मण भाग के विधि में “ऐन्द्रं हविर्जुहोति” अर्थात् इन्द्र देवता के उद्देश्य से घृत दान करे और मन्त्र भाग में “वज्रहस्तपुरन्दरः इन्द्रो वृत्रम् अवधीत्” अर्थात् इन्द्र के हाथ में वज्र है और उस वज्र से वृत्र का वध किया । इस स्थल में विधिवाक्य के द्वारा अवगत अर्थ इन्द्र के विशेषण के रूप में अन्वित होकर वाक्यार्थ में प्रविष्ट हो जाता है । अतः मन्त्र भाग के साथ विधिवाक्य की वाक्यैकवाक्यता ही सम्भव है । इसी के आधार पर भाष्यकार ने उपनिषद् का सादृश्य प्रदर्शन करते हुए क्रियाविधिशेषत्व का वर्णन किया है । पूर्वपक्षियों ने यह आशंका की है कि ब्राह्मण भाग के अर्थवाद और मंत्र भाग के मंत्र के समान वेदान्तवाक्यके क्रिया सम्बद्ध न होने पर वेदान्त का प्रामाण्य नहीं रहेगा । इस प्रसङ्ग में यह कहा जा सकता है कि वेदान्त वाक्य के क्रियापरक न होने पर भी ब्रह्मस्वरूपविधिपरक हो सकता है और ऐसा होने पर “विधिना त्वेकवाक्यत्वात्” इस जैमिनिसूत्र के सिद्धान्त की रक्षा भी हो सकती । अप्रवृत्त प्रवर्त्तक ही विधि होती है— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उत्पत्ति विधि किसी को प्रवृत्त नहीं करती है, केवल अज्ञात- विषय की ज्ञापक ही उत्पत्ति विधि होती है । जैसे “अग्निहोत्रं जुहुयात्” अर्थात् अग्निहोत्रहोम करे यह वाक्य अज्ञात अग्निहोत्र की कर्त्तव्यता का ही ज्ञापन करता है, क्योंकि इतिकर्त्तव्यता या स्वरूपादि का जब तक वर्णन नहीं होता है तब तक वह किसी को प्रवृत्त नहीं कर सकता है, अतः, उत्पत्ति विधि के द्वारा अप्रवृत्त-प्रवर्त्तकता के समान ही अज्ञात-ब्रह्मज्ञापक-वेदान्त में विधि क्यों नहीं होगी ? ऐसी स्थिति में वेदान्त का ब्रह्म विषय में प्रमाण होगा ही । परिनिष्ठित अर्थात् सिद्ध वस्तु में विधि कैसे सम्भव है ? विधि का विषय क्रिया ही होती है, सिद्ध वस्तु नहीं । उत्पत्ति विधि साक्षात् प्रवर्त्तक भले ही न हो क्रिया- बोधक होने से विनियोग विधि के साथ मिलित होकर प्रयोग विधि के रूप में परिणत होती है । ब्रह्मस्वरूपज्ञापक वेदान्त-वाक्य वैसा नहीं है । अतः उत्पत्ति विधि के समान ब्रह्मस्वरूप-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्य-प्रमाण नहीं हो सकता है । कोई भी अनागत अर्थात् उत्पाद्य भाव को ही विषय करता है । प्रकृत में भाव शब्द का अर्थ भावना होता है । जिस पुरुष-व्यापार के द्वारा किसी कार्य के करने में प्रवृत्ति उत्पन्न होती है—वही भावना है । णिच्प्रत्ययान्त √भू धातु से भाव अर्थ में घञ् प्रत्यय कर 'भाव' शब्द सिद्ध होता है । इसी भाव का अर्थ भावना है । केवल √भू धातु से घञ् प्रत्यय करने पर जो भाव शब्द की निष्पत्ति होती है उस भाव शब्द का अर्थ उत्पत्ति होता है । भावनाबोधक ही विधि होती है । भावना अनागत और उत्पाद्य दोनों होती है । उत्पाद्यत्व का हेतु ही अनागतत्व है । यह विधि चार प्रकार की है—अधिकार, विनि- योग, प्रयोग और उत्पत्ति । अधिकार विधि पुरुष के साथ फल का सम्बन्ध अवगत कराती है । यदि अन्य पुरुष को फल की प्राप्ति होती है तो फल के जनक कार्य में कर्त्ता

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