मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९२ मीमांसादर्शनम् [ सू० साम्प्रदायिकशब्दो वा धारणाऽध्ययनपरतयानेन भाष्येण व्याख्यायत इत्याह-अत वेति । यत्त्वस्मिन्व्याख्याने पुरुषाधीनप्रामाण्यप्रसङ्गादित्यादिना दूषणं पूर्वसूत्रव्याख्योप- क्रमेऽभिहितम्, तत्परिहरति-सम्भाव्यते चेति । पूर्वोक्तमध्ययनविधिप्रमाणकं सर्वस्य यदस्य प्रयोजनवदर्थपर्यवसायित्वमेतत्सूत्राऽढं कर्तुमध्ययनविधिपरतया साम्प्रदायिकशब्दं स्वयं व्याचष्टे-तुल्यं चेति । उनयोरपि व्याख्यायोरतत्सूत्रोक्तस्य सामान्योपयोगस्य पूर्वसूत्रोक्त- विशेषोपयोगसिद्धयर्थत्वप्रतिपादनार्थमतो नेत्यादिभाष्यमिति दर्शयितुं ग्रन्थशेषः ॥ ८ ॥ भा० प्र०-यह सन्देह स्वाभाविक है कि विधिवाक्य न रहने पर अर्थवाद वाक्य सप्रयोजन नहीं हो सकते हैं, और प्राशस्त्यज्ञापक अर्थवाद वाक्यों की सहायता के बिना भी विधिवाक्य प्रवृत्ति-जनक हो सकता है, क्योंकि, बाद में किसी कारण से पुरुष की प्रवृत्ति कुण्ठित होने पर भी विधिवाक्य के सुनने पर प्रथम प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । ऐसी स्थिति में अर्थवादों को प्रमाद से पठित मानने पर भी कार्य चल सकता है, क्योंकि पूर्वोक्त रीति से अर्थवाद वाक्यों के प्रति अनेक आपत्तियाँ उत्थापित हो सकती हैं । इसी आशङ्का के उत्तर में कहा गया है-"तुल्यं तु साम्प्रदायिकम्" । साम्प्रदायिक अर्थात् अनध्याय आदि नियमों का पालन करते हुए गुरु शिष्य क्रम में वेद का अध्ययन आ रहा है, अर्थवाद भी इसी रूप में अध्ययन का विषय है और अर्थवाद वाक्यों का वेदत्व भी सभी ने दृढ़तापूर्वक स्वीकार किया है । अतः, अर्थवाद वाक्य को प्रामादिक पाठ नहीं कहा जा सकता है । अनवधानतावश वेदाध्ययन के मध्य में अर्थवाद वाक्यों ने स्थान प्राप्त कर लिया है-यह नहीं कहा जा सकता है । इसलिए अर्थवाद प्रमादवश पठित होने से अप्रमाण है-यह नहीं कहा जा सकता है । तुल्य = समान या एक रूप । च शब्द का अर्थ हेतु है । साम्प्रदायिक=गुरु शिष्य परम्परा से प्राप्त अध्ययन । अर्थात् अर्थवाद वाक्य भी गुरु शिष्य परम्परा क्रम में विद्यात्मक वेद के अध्ययन के समान है । अथवा अर्थवाद भी विधि के समान ही वेद के ही अन्तर्गत होने से उनका अप्रामाण्य नहीं कहा जा सकता है ॥ ८ ॥ अप्राप्ता चानुपपत्तिः प्रयोगे हि विरोधः स्याच्छब्दार्थ- स्तवप्रयोगभूतस्तस्मादुपपद्येत ॥१.२.९॥ शा० भा०-अपि च यैषाऽनुपपत्तिरुक्ता शास्त्रदृष्टविरोधादित्येवमाद्या सा, सोऽरोदीदित्येवमादिषु न प्राप्नोति । कुतः ? प्रयोगे हि स्तेयादीनामुच्यमाने विरोधः स्यात् । शब्दार्थस्तवप्रयोगभूतः । तस्मादुपपद्यते-स्तेनं मनोऽनृतवादिनी वागिति ॥ ९ ॥ भा० वि०-एवं सूत्रद्वयेन स्वसिद्धान्तकथनेनानर्थक्यसूत्रोक्तदोषं निरस्योत्तर- सूत्रोक्तदोषान्तरपरिहारार्थमप्राप्ता चेत्यादिसूत्रम् । तत्र न केवलं स्तुत्यर्थत्वेनानर्थक्य-