मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ ७ ] प्राक्कथन वेद, मन्त्र और ब्राह्मण है। वेद के मन्त्रों की ब्राह्मण में व्याख्या की गई है। वेद के मन्त्रों में ही मन्त्र शब्द का पुनः पुनः उल्लेख मिलता है। ऋक्संहिता के प्रथम अष्टक में 'मन्त्रं मनसा वनोषिष्टम्'१ 'मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्'२ 'हृदा यत्तष्टान् मन्त्रं अशंसन्'३ 'मन्त्रं वोचामग्नये'४ 'आनो मन्त्रं सरथे होपयातम्'५ 'अहे बुध्निये मन्त्रं मे गोपाय'६। अब यह विचारणीय है कि इस मन्त्र शब्द का क्या अर्थ है ? आचार्य जैमिनि ने मन्त्र का लक्षण निर्दिष्ट करते हुए लिखा है:-'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या' (जै० सू० २।१।३२) वेद सम्प्रदाय के रक्षक अभियुक्तों ने वेद के जिन अंशों को मन्त्र के रूप में स्मरण किया है या मन्त्र के रूप में व्यवहार किया है; वे ही मन्त्र हैं७। इस प्रसङ्ग में भट्टकुमारिल ने कहा है 'अध्येतृवृद्धव्यवहारसिद्धं चेदम्' । आशय यह है कि शब्द के अर्थ ज्ञान में शिष्टों का व्यवहार ही प्रमाण है। वेद सम्प्रदाय के रक्षक वैदिकों या याज्ञिकों ने जिसको मन्त्र कहकर व्यवहार किया है—वेही मन्त्र माने गये हैं। इस विषय में अभियुक्तों की उक्ति और व्यवहार ही प्रमाण है। यह सत्य है कि बहुकाल तक भारत विदेशियों के अधीनस्थ रहा, किन्तु मन्त्र शब्द के अर्थ की परम्परा सदा ही अक्षुण्ण रूप में प्रवाहित रही। इसलिए यह एकान्त सत्य है कि वेद के धारक, वाहक और प्रधानतया वेद के अनुष्ठापक वेद के लिए एक मात्र अभियुक्त हैं। वेद ही वेदार्थ निर्णायक है। वेद का विभाग ऋग्वेद की शाकल, शाङ्खायन और बाष्कलसंहिता प्रसिद्ध हैं। बालखिल्यसूक्त शाकलसंहिता के परिशिष्ट रूप में कथित होने से इसी संहिता के अन्तर्भुक्त हैं। संज्ञान- सूक्त को यद्यपि शाकलसंहिता का परिशिष्ट कहा जाता है, किन्तु शांखायन संहिता के मध्य में पठित है, अतः शाकलसंहिता के परिशिष्ट में पठित मन्त्र भी ऋक् मन्त्र ही है। ऋग्वेद के निविदध्याय के परिशिष्ट के रूप में होने पर ऋक् संहिता में निवित् का उल्लेख है।८ १. ऋ. सं. १।२५।१३, २. ऋ. सं. १।३१२.१५, ३. ऋ. सं. १।५१।१४, ४. ऋ. सं. १।२१।१, ५. ऋ. सं. ८।६१।११, ६. तै. ब्रा.।२।१. ७ अभिधानस्य चोदकेषु एवं जातीयकेषु अभियुक्ता उपदिशन्ति मन्त्रान् अधीमहे मन्त्रान् अध्यापयामः, मन्त्राः वर्तन्त इति' शा. भा. २।१।३२, ८. शंसन्ति केचिन्निविदो मनाना। । (ऋ. सं. ५।१।१०) ।