भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 804 में से

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११८ मीमांसादर्शनम् [ सू० पूर्वक इस जाति रूप तन्तु की रक्षा करो । क्योंकि, जाति का आश्रय स्वरूप व्यक्ति का असाङ्कर्य या शुद्ध वर्णता तुम्हारे ही अधीन है । इस प्रकार श्रुतियां स्त्रियों को व्यभि- चारिता रूप अपराध को जाति की उच्छेद का कारण कह रही है । अन्यथा जाति-तन्तु पितृपरम्परा क्रम में सनातन होने से निश्चित ही है । अतः, किसी किसी स्त्री की ऐसी दुश्चरित्रता का कारण एवं उत्पादक क्या है, यह जननी को ही प्रत्यक्षगम्य होने से विशुद्ध जन्मा व्यक्ति को की उत्पत्ति के सम्बन्ध में संशय होना स्वाभाविक है । उत्पादक का संशय होने पर जाति-प्रत्यक्ष में भी संशय होगा, क्योंकि, उत्पादक के जाति का स्मरण भी जाति प्रत्यक्ष का सहकारी कारण है । इस प्रकार जाति प्रत्यक्षगम्य होने पर भी जाति के विषय में संशय होना अस्वाभाविक नहीं है। इसी संशय को लक्ष्य कर इस स्थल में मैं ब्राह्मण या अब्राह्मण, यह नहीं जानता हूँ, इस प्रकार कहा गया है, किन्तु, यह प्रवरानुमन्त्रण विधि का शेष या अङ्ग होने से इसके द्वारा प्रवरानुमन्त्रण की इस प्रकार प्रशंसा की गई है कि प्रवरानुमन्त्रण का ऐसा ही सामर्थ्य है कि ब्राह्मण या अब्राह्मण यह अनिश्चित रहने पर भी इसके द्वारा वरणीय व्यक्ति ब्राह्मण के रूप में अव- धारित होगा । अतः, इसमें प्रत्यक्ष विरोध दोष नहीं है । स्त्र्यपराधात्, स्त्रियों के अपराध से अर्थात् दोष से, 'कर्तुः' कर्ता = उत्पादक कर्ता जार का 'च' - भी “पुत्रदर्शनम्” पुत्र होता है, ऐसा देखा जाता है। दुष्ट स्त्रियों के दोष से उत्पादन कर्ता अर्थात् उपपति से भी पुत्र की उत्पत्ति होती है, अतः, “नचैतद्विद्म” इत्यादि कथन में दृष्टविरोध नहीं है । भाष्यभूमिका में भी इस सूत्र के विश्लेषण में कोई नवीनता नहीं है । पति और उपपति दोनों के पुत्र देखे जाते है, अतः, अपना जन्म कैसा है—यह दुर्विज्ञेय है । इसी अभिप्राय से यह प्रयोग है, अतः, दृष्टविरोध नहीं है । अपने ब्राह्मण्य के सन्देह के लिए यह प्रयोग नहीं है ॥१३॥ आकालिकेप्सा ॥ १.२.१४ ॥ शा० भा० - शास्त्रदृष्टविरोघे उदाहरणं को हि तद्वेदेति, दिक्ष्वतीकाशान्करो- तीति साकाङ्क्षत्वादस्य विधेः शेषः । प्रत्यक्षफलत्वेन स्तुतिः । अनवक्लृप्तिवचनं विप्रकृष्टफलत्वाद् गौणम् ॥ १४ ॥ भा० वि० - ननु सत्यपि स्त्र्यपराधे मातुः क्षेत्रिणो वा पुत्रः स्यात्, तयोश्च निश्चितत्वात् ब्राह्मण्यस्य कथं दुर्ज्ञानं पुत्रस्य ब्राह्मण्यमत आह- कर्तुश्चेति । कर्तुर्नषेक्तुरेव पुत्रो, न मातुः क्षेत्रिणो वेत्यस्यार्थस्य "अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेतम्" इत्यनेन वैदिकेन प्रजातन्तुरक्षणे प्रमादपरिहारविधानरूपेण लिङ्गेन “माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव स" इति स्मृत्या च प्रदर्शनात् भर्तृव्यतिक्रमशङ्कायां

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