मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १२९ चावश्यकत्वस्य, द्वयोः प्रणयन्तीत्यस्य च मध्यमपर्वद्वयविषयत्वस्यार्थवादप्रामाण्याधीन- त्वात् ॥ १८ ॥ इति सर्वानवद्यायां न्यायसुधायामर्थवादाधिकरणम् । भा० प्र०—अप्रसक्त का प्रतिषेध होने मे "नान्तरिक्षे अग्निश्चेतव्यः" इत्यादि अर्थवाद वाक्य अप्रामाणिक हैं, इस प्रकार की आपत्ति के परिहार के लिए "विधिना त्वेकवाक्यत्वात्" इत्यादि सूत्रों को कहा गया है । "नान्तरिक्षे अग्निश्चेतव्यः" इत्यादि अर्थवाद "हिरण्यं निधाय चेतव्यम्" (तै० सं० ५।२।६।१) अर्थात् स्वर्ण रखकर उसके ऊपर अग्नि का चयन करना चाहिए, यह विधि का शेष या अङ्ग है। अन्तरिक्ष में चयन निषेध नित्यानुवाद अर्थात् नित्यसिद्ध विषय का कथन मात्र है। क्योंकि, अन्तरिक्ष में या द्युलोक में अग्नि के चयन की सम्भावना नहीं है, "बबरः प्रावहणिः" इत्यादि वाक्यों का दृष्टान्त देकर जो अप्रामाण्य की आशङ्का की गई है, वह भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि, जननमरणशील किसी व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा गया है। "स्वयं तु श्रुति सामान्यमात्रम्" (मी० द० १।१।३१) इस सूत्र में कहा गया है। इसलिए अर्थवाद वाक्यों के प्रामाण्य स्वीकार करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं है। अन्त्ययोः = अन्य दो आपत्तियों के परिहार में, "यथा उक्तम्"=जो कहा गया है। अवशिष्ट दो आपत्तियों के परिहार में जैसा समाधान कहा गया है, यही इसमें भी समझना चाहिए ॥ १८ ॥ द्वितीयमौदुम्बराधिकरणम् विधिर्वा स्यादपूर्वत्वाद्वादमात्रं ह्यनर्थकम् ॥ १.२.१९ ॥ शा० भा०—इह ये विधिवन्निगदा अर्थवादास्ते उदाहरणम् । 'औदुम्बरो यूपः, भवत्यूर्गवा उदुम्बर, ऊर्कं पशव, ऊर्जैवास्मा ऊर्जं पशूनाप्नोति, ऊर्जाऽवरुद्ध्यै [तै० सं० २-१-१ ६] इति । किमस्य विधिः कार्यम्, उतास्यापि स्तुतिरिति ॥ किं तावत्प्राप्तम् । विधिर्वा स्यादपूर्वत्वाद्वादमात्रं ह्यनर्थकम् । विधिवन्नि- गदेष्वेवंजातीयकेषु फलविधिः स्यात् । फलं ह्यवगम्यते । तथा ह्यपूर्वमर्थं विधास्यति । इतरथा स्तुतिवादमात्रमनर्थकं स्यात् । स्तुतश्चास्तुतश्च तावानेव सोऽर्थः । अपि च ऊर्जाऽवरुद्ध्यै इति प्रयोजनं श्रूयते । न च प्रशस्तोऽयमर्थ इति कश्चिच्छब्दोऽस्ति । लक्षणया तु स्तुतिर्गम्येत । श्रुतिश्च लक्षणाया ज्यायसीति ॥ १९ ॥ भा० वि०—सामान्येनार्थवादानामानर्थक्यनिरासेन स्तुतिलक्षणया विध्येक- वाक्यत्वेन प्रामाण्ये साधिते, तेष्वेव केषुचित् विधित्वेनैवार्थवत्त्व- ९