भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 804 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

[ ११ ] होता है । आपस्तम्ब ने भी 'मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' यह लिखा है, क्योंकि जैमिनि ने त्रिविध मन्त्रों को 'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या' (२।१।३२) इस सूत्र के द्वारा सामान्य लक्षण निर्दिष्ट कर 'शेषे ब्राह्मणशब्दः' यह सूत्र कहते हैं । अतः, यह सुस्पष्ट है कि मन्त्र से भिन्न वेद भाग ही ब्राह्मण है । मन्त्र के लक्षण में छन्द का निर्देश नहीं किया गया है । छन्द के न रहने से यजुर्मन्त्र वेद से बहिर्भूत नहीं हो सकते हैं । पं० श्री गजानन्द शर्मा ने स्वाध्याय मण्डल से प्रकाशित तैत्तिरीय संहिता की भूमिका में लिखा है 'छन्दोवन्धाभावे शेषे ब्राह्मणशब्द इति शास्त्रात् यजुषां मन्त्राणामपि ब्राह्मणवाक्यत्वप्रसङ्गः' (वेदवेदिका पृ० १८) में लिखा था—यह पूर्व विश्लेषण से निरस्त हो जाता है । मीमांसा दर्शन आस्तिक नास्तिक के भेद से सामान्य रूप में दर्शन के दो वर्ग माने गये हैं । आस्तिक दर्शनों में मीमांसा का मुख्यतम स्थान है । मीमांसा पूजित विचार अर्थ में प्रयुक्त होता है । पूजा अर्थ के वाचक मान् धातु से जिज्ञासा अर्थ में (मान जिज्ञासायाम्) "मानेर्जिज्ञासायाम्" (३।१।६) इस वार्तिक के द्वारा सन् प्रत्ययघटित नित्य प्रयोग से अप्रत्यय कर मीमांसा शब्द निष्पन्न होता है । विचार पूर्वक वेदानुसार अर्थ निर्णय ही मीमांसा है । पूजितत्व का परिष्कृत रूप देते हुए आचार्यों ने कहा है— 'परमपुरुषार्थ-हेतुभूत-सूक्ष्मतमार्थनिर्णयजनकत्वम्' । परम पुरुषार्थ के साधन रूप सूक्ष्मतम अर्थ रूप प्रयोजनवान् पूजितत्व है । वैदिक धारा का अन्वेषण करने पर दो धारायें सम्मुख उपस्थित होती हैं । एक ऋषिधारा, और दूसरी मुनिधारा । वैदिक ऋषियों ने अनेक प्रसङ्ग में अदेव एवं देवनिन्द के प्रति अतिशय कटाक्ष किया है । यद्यपि इसका सामान्य अर्थ वेदनिन्दक होता है, किन्तु, नास्तिक के रूप में चार्वाक आदि का ग्रहण नहीं है, वरन् सम्प्रदाय- वाद के बाद की भूमि पर किसी सिद्धान्त के प्रवर्तक का ही ग्रहण किया है । दार्शनिक चिन्ता धारा वैदिक हो या अवैदिक इतना सत्य है कि दर्शन मनन का ही फल है अतः दर्शन को तर्क प्रस्थान कहा गया है, और इसी की धरा पर प्रवहमान मीमांसा है । दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है । एक बौद्ध धारा (Rationalist) और दूसरी ब्राह्मण्य (Intuitionist) धारा है यही मुनि धारा है, जो तार्किक आघात-प्रतिघात में अपनी धारा की रक्षा के लिए लक्ष्य से बहुत दूर हो जाती है । यही मुनि धारा दार्शनिक इतिहास की पृष्ठभूमि है । इसका आयतन इतना विशाल है कि सहस्र धाराओं में प्रवा- हित इस धारा के लिए मुनिमत-द्वैध के कारण श्रुतिद्वैध आभासित होने लगता है । इस धारा में ही कर्म, भक्ति और ज्ञान एवं ईश्वरवाद, अनीश्वरवाद, आत्मवाद, निरात्मवाद तक अवस्थित हुआ । योगभूमि पर मुनियों की आगन्तुक सर्वज्ञता का तारतम्य तथा