मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ १२ ] उनके मौन की व्याख्या में तार्किक समीक्षा आधार के लिए प्रतिष्ठित ज्ञान को पाश्चात्य दार्शनिकों के विद्याविलासात्मक फिलौसफी के समान इसके अध्ययन को मनन तक ही सीमित कर दिया तथा आचार से उपक्रम कर प्रस्तुत ज्ञान को इच्छा, कृति, चेष्टा के रूप में आचार और प्रचार से शून्य कर दिया । यह है मनन के आधार पर प्रस्तुत मुनि धारा जिससे निरतिशय सर्वज्ञ से उपलब्ध ऋषि धारा सर्वथा म्लान क्षीण हतप्रभ हो प्रवह्या होने लगी । वेद मीमांसा तो दूर वेदमनन पर प्रतिष्ठित तर्कात्मक घात-प्रतिघात के अध्ययन में ही जीवन की इति श्री होने लगी । भारत की देवी अखण्डिता या अदिति एक थोथे विचार का विषय या देव जननी मात्र रह गई और पौराणिक गाथाओं में उनका सत्य स्वरूप विस्मृत होने लगा । यह सत्य है कि मन्त्र भूमि की व्याख्या ही ब्राह्मण है । प्राचीनतम वेद का विभाग मन्त्र और ब्राह्मण ही है, आरण्यक और उपनिषद ब्राह्मण के ही अन्तर्गत हैं । मन्त्र और ब्राह्मण की अपेक्षा उपनिषद् की भाषा और भाव की सरलता से इसका अतिशय प्रचार हुआ । मन्त्र की व्याख्या ब्राह्मण को मानने पर भी उसे कर्ममीमांसा माना जा सकता है, वेदार्थमीमांसा नहीं । मन्त्र के साथ ज्ञान के फल क्रिया या आचार का योग असाधारण है । क्रिया का सुश्रृंखल और सुस्पष्ट रूप का निदर्शन ही ब्राह्मण है । व्याख्या में मन्त्र के रहस्यार्थ का अविष्कार आवश्यक होने से मीमांसा के द्वारा रहस्यार्थ का अविष्कार किया गया है, अतः यह ऋषि धारा है । इस प्रसङ्ग में यह स्पष्ट करना आवश्यक है, ज्ञान और कर्म के मध्य में एक प्राचीर की रचना परवर्ती काल की देन है । वैदिक युग एक अदिति (अखण्ड) दीप्ति की उपा- सना होने से यहां यह भेदक प्राचीर नहीं था । द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ की चर्चा गीता में उपलब्ध है, वहाँ भी समस्त कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में ही की गई है । आत्मा चेतना को लोकोत्तर चिन्मयभूमि में अवतीर्ण करना ही ज्ञान और कर्म का समान लक्ष्य है । इस चिन्मय भूमि का ही नाम स्वर्ग है, जिसकी प्राचीन संज्ञा 'स्वः' दीप्तिमय अनुभव है । ज्ञानयज्ञ से जिस भूमि पर उत्तीर्ण करना चाहते हैं, वही द्रव्ययज्ञ से भी उत्तीर्ण करना है । स्वर्ग और मोक्ष ये दोनों परस्पर विरुद्ध भावना नहीं वरन् एक ही की दो संज्ञा है । शुक्ल यजुर्वेद के संहिताभाग के अवसान में ईशोपनिषद् अन्तर्भुक्त है, यजुर्वेद को कर्मवेद माना गया है । इस उपनिषद् का कर्म के अवसान में सन्निवेश अतिशय अर्थपूर्ण है । उदार एवं उदात्त दृष्टि के साथ विराट् समन्वय की चेष्टा ही इसकी अतुलनीय देन है । कर्म के शेष में सार्वभौम ज्ञान की दीप्ति में ही कर्म का अवसान तत्त्व ज्ञान है, इसीलिए उत्तरमीमांसा अन्त में है : ज्ञान की धारा के प्रदीप को योगी याज्ञवल्क्य ने अपनी प्रियतमा मैत्रेयी को गृहस्थ कर्म के शेष में उद्दीप्त किया - 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासित-