मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १४१ और उदुम्बर स्वरूप ऊर्क् है अर्थात् अन्न के द्वारा अध्वर्यु यजमान के लिए पशुरूप अन्न प्राप्त करता है—यज्ञ के फल के रूप में लाभ करता है । अतः उदुम्बर निर्मित यूप अन्न की अवरुद्धि अर्थात् अवरोध या संस्थान या सम्पादन का कारण होता है । यह वेदवाक्य के अर्थ में संशय होता है कि इससे किसी का विधान है या किसी की प्रशंसा की जाती है । अर्थात् यह विधि है या अर्थवाद । पूर्वपक्षी इसके उत्तर में कहता है— यह विधि है, यह अर्थवाद नहीं हो सकता है । "अपूर्वत्वात्" प्रकृत में उदुम्बरस्वरूप गुण एवं अन्नसम्पादनरूप फल अपूर्वं अर्थात् अप्राप्त अर्थात् प्रमाणान्तर से अज्ञात है । "धनलाभाय राजसेवा" इत्यादि स्थल में तादर्थ्य में चतुर्थी होती है, यहाँ भी "ऊर्जोऽ- वरुद्ध्यै" में तादर्थ्य में चतुर्थी है । राजसेवा जिस प्रकार धन लाभ का साधन है, वैसे ही यूप का उदुम्बरस्वरूप गुण भी ऊर्ज की अवरुद्धि के अर्थात् अन्न सम्पादनरूप फल का हेतु है । यद्यपि यहाँ विधिविभक्ति नहीं है, तथापि विधिजन्य प्रवृत्ति होती है, कारण, ऐसे स्थलों में यह फल है, यह इसका साधन है—इस प्रकार का ज्ञान होने से ही प्रवृत्ति होती है । यदि इसको विधि न कहा जाय तो वाक्य अनर्थक हो जायेगा, क्योंकि, अर्थवाद स्वार्थ का प्रतिपादक न होने से वाक्य अनर्थक होगा, कारण, अर्थवाद स्वार्थ का प्रतिपादक होने पर अन्य की प्रशंसा कर चरितार्थ होता है । किन्तु यहाँ किसी प्रकार की प्रशंसा नहीं है । (पूर्वपक्ष) 'विधिः' = विधि, 'वा' अवश्य, 'स्यात्' होगी, अपूर्वत्वात् अपूर्व अर्थात् अप्राप्त होने से 'वादमात्रं' केवल अर्थवाद, 'हि' = क्योंकि "अनर्थकम्"=अनर्थक अर्थात् निष्प्रयोजन है । क्योंकि विधि सम्पर्क शून्य केवल अर्थवाद अनर्थक होता है, इसलिए ऊर्ग॒ या उदुम्बरः इत्यादि स्थल में विधि ही मानना होगा ॥ १९ ॥ लोकवदिति चेत् ॥ १.२.२० ॥ शा० भा०—इति चेत्पश्यसि—स्तुतिरनर्थिका, न च शब्देनावगम्यत इति । लौकिकानि वाक्यानि भवन्तो विदाङ्कुर्वन्तु । यद्यथेयं गौः क्रेतव्या देवदत्तीया, एषा हि बहुक्षीरा, स्त्र्यपत्या, अनष्टप्रजा चेति । क्रेतव्येत्यप्युक्ते गुणाभिधाना- त्प्रवर्तन्तेतरां क्रेतारः । बहुक्षीरेति च गुणाभिधानमवगम्यते । तद्वद् वेदेऽपि भविष्यति ॥ २० ॥ भा० वि०—यदुक्तं वादमात्रमनर्थकमिति तत्र चोदयति—लोकवदिति । स्तुतेरर्थवत्त्वं प्रतिजानान इति चेदिति व्याचष्टे—इति चेदिति । इति शब्दार्थ- माह—दृश्यत इत्यादिना । ऊर्जोऽवरुध्या इत्यादिना शब्देन या स्तुतिर्गम्यते, सानार्थिकेति, ⋯न⋯ दृश्यते युज्यते अर्थवत्येव युक्तेत्यर्थः, कुत इत्याशङ्क्य लोक- वदिति भागं व्याचष्टे—लौकिकानीति । विदाङ्कुर्वन्तु—विचारयन्तु । कानि