मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४४ मीमांसादर्शनम् [ सू० वरोधनेनेयं स्तुतिर्न च तदस्ति। तत्राविद्यमानबहुक्षीरसंकीर्तनवदेतत्स्यात् स्व- रूपतस्तावदुदुम्बरेऽन्नत्वं पक्षधर्मेणाप्रसिद्धम्। अन्वयाप्रसिद्धेश्च हेतुत्वाप्रसिद्धिः ! न हि यद्यदन्नम्, स स यूप इति लोके वेदे वा प्रसिद्धमित्यसंबद्धम्। तस्मादसंवा- दाद्वरं विधिरेव, किं स्तुत्या संवादापेक्षिण्येति ॥ २१ ॥ न्या० सु०—नैतदेवमिति भाष्यं व्याचष्टे—नायमिति। लोके इति भाष्यं व्याचष्टे— स्तुतेरिति। अविदित इति भाष्यं द्वेधा व्याचष्टे—वेदे स्थित्विति। पूर्ववचनादिवेति। भाष्यं पूर्ववदेव द्वेधा व्याचष्टे—पूर्वेति। विदितत्वादेवेति भाष्यं व्याचष्टे—न चेति। वैदिकेष्विति भाष्यं जाताशङ्कत्वं द्विधोपपादयन् व्याचष्टे—वेदे स्थित्विति। न लौकिकी स्तुतिर्विरुद्धा, प्रमाणान्तरेणास्याविदितपूर्वत्वादिति, वैदिकायाः स्तुतेः दार्ष्टान्तिकत्वनिरा- करणपरतया सूत्रव्याख्यानार्थमपि चेति भाष्यं व्याचष्टे—अपि चेति। अधर्मशब्दवद्वि- रुद्धवचनेनासंवादशब्देन विसंवादोऽभिप्रेतः। विसंवादोपपादनाथंमुज्जॉवरुद्ध्या इति भाष्यं व्याचष्टे—वर्त्तमानेनेति। स्तुतौ स्वार्थसत्यत्वानादरत्वस्योक्तत्वादिसंवादेऽपि स्तुतिनिर्वाहमाशङ्क्य विदितत्वादित्येतद्भाष्योक्तलौकिकस्तुतिविषयस्वार्थसत्यत्वादर- न्यायेनात्रापि पूर्वपक्षे स्थित्वा तदादरमाह—तत्रेति। ऊगुंदुम्बर इति भाष्यं व्याचष्टे—स्वरूपत इति। ऊक्शब्दाभिधेयमन्नत्वं भवत्पक्षे पक्षधर्मत्वेनाप्रसिद्धम्। तस्य चाप्रसिद्ध्या यूपप्रकृतित्वेनौदुम्बरो यूपो भवतीत्यप्रसिद्धम्। अन्वयाप्रसिद्धिमेवोपपादयति—न हीति। पक्षधर्मत्वसूचितहेतुत्वान्यथानुपपत्तिकल्पितं यद्यदन्नं स स यूप इत्यन्वयवाक्यमङ्गीकृत्यैतदुक्तम्। हेतुत्वाप्रसिद्ध्या साध्याप्रसिद्धिप्रति- पादनार्थं तस्मादिति भाष्यम्। ऊर्गुदुम्बर इत्यनुतवचनादन्यदप्यस्य तत्साध्यं यस्मादूर्गु- दुम्बरः, तस्मात्तन्मयो यूपः कर्त्तव्य इति, तदप्यमृतमिति सुयोजत्वान्न व्याख्यातं विसंवा- दाभिधानस्य प्रकृतोपयोगमाह—तस्मादिति ॥२१॥ भा० प्र०—लौकिक वचन प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से गम्य रहने पर ही उसमें विश्वास किया जाता है। विक्रय योग्य गौ आदि के प्रशंसा-सूचक-वाक्य वक्ता एवं क्रेता को पूर्व से ही विदित रहता है। जाने हुए का ज्ञान निरर्थक है। इसीलिए उसकी प्रशंसा की जाती है। किन्तु वेदवाक्य का वचन अन्य प्रमाण से प्रमाणयुक्त नहीं है अर्थात् गम्य नहीं है और प्रमाणान्तर विरुद्ध होने पर भी प्रमाण नहीं होगा। इस स्थल में उदुम्बर का अन्न-सम्पादकत्व प्रमाणान्तरगम्य नहीं है। इसी प्रकार ऊर्ग्व वा (वै) उदुम्बरः। इस स्थल में 'वै' शब्द के द्वारा उदुम्बर की अन्न के प्रति हेतुता भी जो कही गई है, वह प्रमाणान्तर से गम्य नहीं है। अतः, उसका अब्याहत प्रामाण्य मानने के लिए उसको विधि ही मानना होगा, क्योंकि, विधि ही स्वार्थ में प्रमाण है अर्थवाद स्वार्थ में तात्पर्य- रहित रहता है, इसीलिए, स्वार्थ में प्रमाणविहीन होने से अर्थवाद नहीं हो सकता है।