भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२५ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १५७ अच्छी तरह पुरोडाश के पाक करने की प्रशंसा कथित होती है। फलतः, प्रकरण का सम्बन्ध अक्षुण्ण रहता है। किन्तु इसको विधि मानने पर दर्शपूर्णमास प्रकरण में इसका कोई भी सम्बन्ध नहीं रहेगा, क्योंकि, विधि “नैर्ऋतो विदग्धः कर्तव्यः” यही इसका याग स्वरूप मानना पड़ेगा, किन्तु दर्शपूर्णमास प्रकरण में निर्ऋत याग का उपदेश नहीं है। प्रकरण के सम्बन्ध की रक्षा की ओर दृष्टि रखने पर इसको अन्यथा करना सम्भव नहीं है, अर्थवाद को विधि मानने में यह भी दोष है। 'प्रकरणे'=दर्शपूर्णमास आदि प्रकरण में, 'सम्भवम्' = अन्वय सम्भव होने पर, 'अपकर्षः'=प्रकरण से विच्युति, 'न कल्प्येत'=कल्पना करना उचित नहीं है; “धियानर्थक्य”=विधि की व्यर्थता 'हि'=क्योंकि, “तं प्रति”=प्रकरण सम्बन्ध के पक्ष में, जो प्रकरण में अन्वित हो सकता है उसका अपकर्ष अर्थात् प्रकरण से विच्युति करना उचित नहीं है। प्रकरण का सम्बन्ध अक्षुण्ण रखने पर विधि मानना व्यर्थ है ॥ २४ ॥ विधौ च वाक्यभेदः स्यात् ॥ १.२.२५ ॥ शा० भा०—औदुम्बरो यूपो भवतीति विधावेतस्मिन्नाश्रीयमाणे ऊर्जोऽ- वरुद्ध्या इत्येतस्मिंश्च वाक्यं भिद्येत । इत्थमौदुम्बरो यूपः प्रशस्तः, स चोर्जोऽ- वरुद्ध्या इति । तस्माद् विधिवन्निगदानामपि स्तुतिरेव कार्यमर्थवादाना- मिति ॥ २५ ॥ भा० वि०—एवं फलविधित्वनिराकरणेन स्तुतित्वमुक्त्वा विधित्वे दोषान्तर- माह - विधौ वेति सूत्रं व्याचष्टे—औदुम्बर इति । एतस्मिंश्च विधावाश्रीयमाण इत्यनुषङ्गः वाक्यभेदमभिनयति - इत्थमिति । औदुम्बरो यूपो भवतीत्यस्यैव तावद्वर्तमानापदेशत्वसन्देहान्न विनार्थवादं पञ्चमलकारत्वेन विधित्वावसाय इति प्रथमं तावदर्थवादतया सम्बन्धनीयमूर्जोऽवरुध्या इत्यन्तेन, पुनश्च तस्यैवोर्जोव- रुध्यै यूपः कार्य इति विध्यन्तर्भावि वाक्यभेदः स्यादित्यर्थः; अधिकरणार्थमुप संहरति—तस्मादिति । वायुर्वेत्यादिसमुच्चयार्थोऽपि शब्दः ॥ २५ ॥ त० वा०—स्तुतित्वेन विधिविभक्तिमुपजनय्य पुनस्तेनैव फलकल्पनायां वाक्यभेदः तस्मादर्थवाद एवेति ॥ २५ ॥ (इति विधिवन्निगदाधिकरणम् ॥ २ ॥) न्या० सु०—औदुम्बर इत्यादिभाष्यादौदुम्बरो यूपो भवतीत्यस्यापि प्राशस्त्यपरत्वं प्रतिभाति । तच्चायुक्तम् । विध्येकवाक्यत्वं विनार्थवादत्वायोगात् । सोमापौष्णविध्येक- वाक्यत्वाभ्युपगमे त्वौदुम्बरो यूपः प्रशस्त इतिभाष्यानुपपत्तिप्रसङ्गादित्याशङ्कयाह—