मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ मीमांसादर्शनम् [ सू० स्तुतित्वेनेति । न स्तुत्यर्थत्वेनेदमुपन्यस्तम्, किन्तु स्तुत्यन्वयवशनास्मिन्वर्तमानापदेश- सन्दिग्धे पञ्चमलकारत्वनिश्चयात् विधावाश्रीयमाण इति स्तुतिनिश्चयेन विधित्वप्रतिपाद- नार्थमिति भावः—उपजनय्येति । निश्चाय्येत्यर्थः ॥ २५ ॥ इति न्यायसुधायां द्वितीयमौदुम्बराधिकरणम् । भा० प्र०—'युक्तं तुवाक्यशेषत्वम्' इस सूत्र में कहा गया है कि वाक्य को विधि मानने के लिए प्रथमतः इसको स्तुति अर्थात् अर्थवाद के रूप में इसको मानना होगा । ‘वै’ आदि वाक्य को स्तुति के द्वारा विधि मानने पर वाक्यभेद का प्रसङ्ग होगा । वेद में वाक्यभेद का परिहार ही समीचीन है । प्रकृत में ‘ऊग् वै’ इत्यादि वाक्य को स्तुति के द्वारा अन्न रूप फल की विधि मानना उचित नहीं है, क्योंकि अन्न रूप फल की विधि के लिए उदुम्बरत्व की प्रशंसा की गई है और उदुम्बरत्व का फल भी विज्ञापित होता है—इस रूप में दो अर्थ मानने से वाक्यभेद होगा । इसलिए यह विधि नहीं है, किन्तु अर्थवाद है । ‘विधौ’=‘ऊक् वै’ इत्यादि वाक्य को विधि मानने पर, ‘च’=और, ‘वाक्यभेदः’= वाक्यभेद नामक दोष, “स्यात्”=होगा, यदि विचार कर वाक्य को विधि मानने पर वाक्यभेद दोष होगा । इस प्रसङ्ग में ‘वाक्यभेद’ दोष की अवगति करना आवश्यक है । अपौरुषेय वेद वाक्य में वाक्यभेद एक दोष है । एक बार पठित वाक्य की आवृत्ति कर अनेक अर्थ ग्रहण करना वाक्यभेद है । यह सत्य है कि पौरुषेय वाक्य में वाक्यभेद दोषावह नहीं है । क्योंकि, अभिप्राय के अनुसार ही एक वाक्य के अनेक अर्थ की कल्पना की जा सकती है । आकार इङ्गित और प्रमाणान्तर की सहायता से मनुष्य के अभिप्राय की अवगति होती है । इन स्थलों में वक्ता के अभिप्राय के अनुसार एक वाक्य के अनेक अर्थ की कल्पना दोषावह नहीं है । इसीलिए, श्लेषालङ्कार का प्रामाण्य रक्षित होता है । किन्तु, वेद अपौरुषेय है, उसका कोई स्वतन्त्र वक्ता नहीं है और स्वतन्त्र वक्ता न होने से वेद में वक्ता के अभिप्राय के होने की सम्भावना ही नहीं है । वक्ता का अभिप्राय ही तात्पर्य है, अतः, इस तात्पर्य लक्षण के अव्याप्ति-दोषदुष्ट होने से मीमांसक मत में तत्प्रतीत गयोग्यत्व ही तात्पर्य है यह माना है । अनेक अर्थ मानने पर एक अर्थ को पौरुषेय मानना होगा और पौरुषेय वाक्य वेदवाक्य न होने से उसका अप्रामाण्य भी अनिवार्य है । ‘ग्रहं सम्माष्टि’ इस वाक्य में ग्रह=यज्ञीयपात्र विशेष का सम्मार्जन विहित है, किन्तु उसका एकत्व और अनेकत्व अविवक्षित है । क्योंकि ग्रह का मार्जन एवं ग्रह का एकत्व एक प्रयत्न से एक वाक्य के द्वारा विहित नहीं हो सकता है, क्योंकि ग्रह के एकत्व की विवक्षा करने पर “ग्रहं सम्माष्टिः तं च एकम्” इस प्रकार दो वाक्य होगा और द्वितीय वाक्य पौरुषेय अर्थात् पुरुषकृत आवृत्ति के द्वारा कथित होने से प्रमाण नहीं है । इसलिए