भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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३१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २०१ अन्यथा नहीं हो सकता है। मन्त्र का अर्थ ब्राह्मण वाक्य में ही कथित होने से मन्त्र अर्थवाद के समान स्वार्थ में अप्रमाण है। मन्त्रों का केवल उच्चारण के द्वारा ही प्रयो- जन सिद्ध होता है, अतः, मन्त्र अदृष्ट या अपूर्व का ही जनक है। मन्त्र को उच्चारणार्थक मानने पर अदृष्टरूप प्रयोजन की कल्पना होगी और अर्थ की विवक्षा मानने पर दृष्ट प्रयोजन भी सिद्ध होगा, अतः, ब्राह्मण को अनुवादक मान कर भी मन्त्र अर्थ का अभिधायक होगा, अर्थात् मन्त्र का अर्थ विवक्षित रहेगा, इसलिए अन्य दोष के लिए द्वितीय सूत्र की अवतारणा की गई है। वाक्यान्नियमात्=मन्त्रवाक्यों का पदविन्यास नियमबद्ध है, अतः मन्त्रार्थ विवक्षित नहीं है। मन्त्र स्वार्थ का प्रतिपादक नहीं है, क्योंकि, मन्त्रवाक्य का पदविन्यास नियमबद्ध है। आशय यह है कि मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है, इसमें दूसरा कारण यह भी है कि मन्त्र के पदों का जो क्रम है, उसका परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। जैसे 'अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुद्' इस मन्त्र के पदों का क्रमभङ्ग कर 'अग्निर्दिवोमूर्द्धा' इस प्रकार पढ़ा जाय तो मन्त्र का पाठ विफल होगा; यह सभी को मानना पड़ेगा। अपने अर्थ का प्रकाश करना ही यदि मन्त्र का प्रयोजन होता तब यहाँ प्रयोग क्रम का बन्धन नहीं रहता, क्योंकि, मन्त्र के पदों का क्रमभङ्ग करने पर भी अर्थ की प्रतीति में किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं होती। पाठक्रम नियम को अदृष्टरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिए मानने पर भी मन्त्रपाठ अर्थबोध के लिए ही है, इस आशङ्का से अन्यदोष की अवतारणा की गई है— बुद्धशास्त्रात् = ज्ञात विषय का ही अनुशासन होने से मन्त्रों का अर्थ विवक्षित नहीं है। मन्त्र स्वार्थ में विवक्षाशून्य है। आशय यह है कि पैर में जूता पहनने के बाद जूता पहनता है— यह कथन जैसे निष्प्रयोजन है, वैसे ही जो विषय पूर्व से अवगत है; उसी का पुनः मन्त्र से कथन निष्प्रयोजन है। याज्ञिकों को मन्त्रपाठ के पूर्व से ही अपने-अपने कर्तव्य की जानकारी रहती है, कारण, जो व्यक्ति जिसका जानकार नहीं रहता है वह व्यक्ति उस कर्म को नहीं कर सकता है। “अग्नीदग्नीन् विहर” (तै० सं० ६।३।१।२) हे अग्नीध्र अर्थात् ऋत्विग्विशेष अग्नि लेकर विहरण करें इत्यादि मन्त्र याज्ञिकों के कर्तव्य के बोधक हैं, इनके द्वारा अपने अर्थ का प्रतिपादन जूता पहनने के बाद जूता पहनने के समान निष्प्र- योजन है। इसलिए, मन्त्रों का अर्थ विवक्षित नहीं है। अवगत अर्थ का प्रमादवश विस्मरण के परिहार के लिए मन्त्र का अर्थ स्मारक हो सकता है, अतः अन्य दोष की आशङ्का से अन्य सूत्र की अवतारणा की है— अविद्यमानवचनात् = जिसका अस्तित्व नहीं है, उन वस्तुओं के विषय में कहा गया है, अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है।