भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२०३ मीमांसादर्शनम् [ सू० आशय यह है कि मन्त्र का अर्थ विवक्षित होने पर यज्ञ के साधन या उपकरण का ही मन्त्र के द्वारा कहना उचित था। किन्तु, चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा। द्वे शीर्षे सप्तहस्तासो अस्य (ऋ० ४।५८।३) चार सींग, तीन पैर, दो मस्तक एवं सात हाँथ इत्यादि मन्त्र का अर्थ असम्भव है। क्योंकि, इस तरह की यज्ञसाधन वस्तु नहीं है। इसलिए सम्भव होने पर भी इससे यज्ञ में किसी प्रकार का उपकार नहीं हो सकता है। अतः, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है। ये मन्त्र उच्चारण से ही क्रिया के सम्पादक हैं और इसी से अदृष्ट या अपूर्व होता है। पूर्वोक्त मन्त्र के अनुरूप कोई देवता हो सकता है, इस आशङ्का से अन्य दोष की अवतारणा के लिए अचेतनेऽर्थवन्धनात् (जै० १।२।०५) सूत्र दिया है। अचेतनेऽर्थबन्धनात् = चेतनाहीन द्रव्य में सम्बोधन आदिरूप अर्थ का सम्बन्ध होने से मन्त्र का अर्थ अविवक्षित है। अर्थबन्धनात् = सम्बोधनादि रूप अर्थ का बन्ध = सम्बन्ध रहने से। आशय यह है कि “ओषधे त्रायस्वैनं, स्वधिते मैनं हिंसीः” (तै० सं० १।२।११) “शृणोति ग्रावाणः” (तै० सं० १।३।१३) हे औषधि ? तुम इसकी रक्षा करो, हे स्वधिति ? (कुठार या अस्त्रविशेष) तुम इसकी हिंसा मत करना। हे ग्रावण ? अर्थात् प्रस्तरखण्ड ? तुम सुनो इत्यादि मन्त्रों का अर्थ बाधित है। कारण, इन स्थलों में चैतन्य- शून्य औषधि, कुठार, प्रस्तर आदि को सम्बोधन किया है। सम्बोधन का अर्थ अभिमुखी- करण—वक्ता के प्रति मनोयोग आकर्षण है। किन्तु, चेतना-विहीन जडवस्तु का अभि- मुखी करण नहीं हो सकता है। इसलिए, मन्त्रों का अर्थ अविवक्षित है। जडवस्तु के अभिमानी देवता का व्यवहार व्याससूत्र में निर्दिष्ट किया गया है। अभिमानिव्यपदेशस्तु (वे० सू० २।१।५) अतः, औषधि आदि के अभिमानी चेतन देवता की विवक्षा की जा सकती है, इस आशङ्का से अन्य दोष के लिए सूत्र की अवतारणा कर रहे है— विप्रतिषेधात्=मन्त्र के पदों के अर्थों का परस्पर विरोध होने से मन्त्रों का अर्थ निष्प्रयोजन है। आशय यह है कि अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षम् (ऋ० १।८९।१०) अदिति ही द्यौ है, अदिति ही अन्तरिक्ष है, इत्यादि मन्त्रों के पदों में परस्पर विरोध है। कारण एकबार अदिति को द्यौ कहा गया है और पुनः उसी अदिति को अन्तरिक्ष कहा गया है। इसी एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे । असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् (वा० सं० १६।५४) रुद्र एक है, द्वितीय नहीं। जगत् में संख्याविहीन हजार-हजार रुद्र हैं, इत्यादि मन्त्रों के अर्थ में विशेष रूप से विरोध लक्षित होता है, कारण, एक बार एक रुद्र कहा गया और पुनः हजार-हजार रुद्र कहे गये हैं। इस प्रकार मन्त्र के पदों के अर्थ में विरोध होने से मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है।