मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २०३ यदि यह कहा जाय कि त्वमेव माता च पिता त्वमेव इत्यादि के समान अन्तरिक्ष आदि रूप में अदिति की स्तुति की गई है। इसी प्रकार एक रुद्र की भी योग सामर्थ्य से अनेकरूपता हो सकती है, अतः, अर्थ में विरोध नहीं है, अतः अन्य दोष के लिए दूसरे सूत्र की अवतारणा की गई है । स्वाध्यायवद्वचनात्=वेद के अध्ययन के लिए जिस प्रकार "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" यह विधि है, प्रयोग के समय में मन्त्र के अर्थ जानने के लिए वैसी कोई विधि नहीं है। इसलिए, मन्त्र का अर्थ विवक्षित नहीं है, या किसी समय पूर्णिका नाम की कोई स्त्री धान छांट रही थी। उसी के समीप में माणवक अध्ययन के समय अवघात मन्त्र का अभ्यास कर रहा था। अर्थ के प्रकाशन की विवक्षा वहाँ नहीं है। प्रत्येक मुसल के प्रहार के साथ मन्त्र को नहीं पढ़ा जा रहा था, अतः, अक्षर-ग्रहण के लिए ही उस मन्त्र का और अन्य मन्त्रों का अभ्यास करता है। अध्ययन के समय पढ़ा गया भी अवधान जैसे पूर्णिका नाम की स्त्री के प्रति अपने अर्थ का प्रकाशन नहीं करता है, वैसे ही कर्म के समय में भी वह अपने अर्थ को नहीं कहता है। स्वाध्यायवत् = स्वाध्याय के समान। अवचनात् = वचन न होने से। यदि यह कहा जाय कि माणवक को वहाँ अर्थ की विवक्षा नहीं है पूर्णिका भी अर्थ को जानने में असमर्थ है। कर्म में अध्वर्यु को अर्थ विवक्षा रहती है और बोध भी हो सकता है - इस आशङ्का से अन्य सूत्र की अवतारणा की गई है- अविज्ञेयात् = कतिपय ऐसे मन्त्र हैं, जिनका अर्थ अविज्ञेय है, अतः, वे उच्चारणरूप प्रयोजन के लिए हैं, वैसे ही अन्य मन्त्र भी हैं। आशय यह है कि मन्त्रों का अर्थ कर्म के अनुष्ठान में निष्प्रयोजन है, क्योंकि, "अम्यक् सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे, त्रीण्येव जर्फरी तुर्फरीतू", इत्यादि मन्त्रों का कोई अर्थ नहीं होता है। मन्त्रों का अर्थ विवक्षित होने पर इन मन्त्रों का भी अर्थ होता, किन्तु, इनका कोई अर्थ नहीं है। अतः, उक्त मन्त्र केवल पाठ के द्वारा ही यज्ञ का उपकारक है, अन्य मन्त्रों की भी वैसी ही स्थिति है। यदि यह कहा जाय कि ऐसे मन्त्रों के अर्थ के ज्ञान के लिए ही निगम, निरुक्त, व्याकरण प्रवृत्त हुए हैं--इस आशङ्का से अन्य सूत्र की अवतारणा की गई है। अविज्ञेयात् = कतिपय मन्त्रों का अर्थ अविज्ञेय है। अतः केवल उच्चारणार्थक होने से अन्य मन्त्र भी वैसे ही हैं। अनित्यसंयोगान्मन्त्रानर्थक्यम् = जननमरणशील अर्थ के वाचक शब्दों का प्रयोग होने से मन्त्र का अर्थ निष्प्रयोजन है। आशय यह है कि "किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः (ऋ० ६।५३।१४) इत्यादि मन्त्रों में कीकट नामक नगर, नैचाशाख नामक नगर एवं प्रमगन्द नामक राजा के