भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२२४ मीमांसादर्शनम् [ सू० व्याख्याय, कर्त्तव्यमित्यनेन च हेतुप्रतिपादनार्थत्वेन संस्कारत्वादिति सूत्रावयवं व्याख्याय पुनरुपायान्तरेणापि सा प्राप्नोतीत्यन्यथापि स्मृतिसिद्धेरानर्थक्यमाशङ्क्योनानेनोपायेनेत्यनेन भाष्येणादृष्टसंस्कारत्वादिव्यावृत्त्या स एव व्याख्यातः तत्सर्वं तात्पर्यतो व्याचष्टे—येयमिति । संस्कारत्वादिति सूत्रावयवं स्वयमन्यथा व्याचष्टे—अथ वेति ॥ ३७॥ भा० प्र०—'बुद्धशास्त्रात्' इस सूत्र में पूर्वपक्षियों ने दोष उद्भावन किया है, किन्तु वह ठीक नहीं है। क्योंकि मन्त्र के द्वारा अनुष्ठेय विषय का स्मरण होता है। मन्त्र के द्वारा स्मरण करने पर याग संबंधी अपूर्व निष्पन्न होता है, अन्यथा नहीं। अतः, ऐसे स्थलों में मन्त्र के द्वारा ही स्मरण करना चाहिए—इसी नियम की कल्पना करना चाहिए। 'संस्कारार्थात्' इसके अर्थ में आचार्य कुमारिल ने कहा है कि—स्मृति उद्बो- धक सापेक्ष है। और मन्त्र स्मरणीय विषयक उस उद्बोधनरूप संस्कार का साधन है। अतः, मन्त्र के द्वारा अग्नीध्र का संस्कार अर्थात् स्मृति का उद्बोध न होने से वह निरर्थक नहीं है। इसलिए, जूता पहने हुए पैर में पुनः जूता के पहनने का दृष्टान्त इस स्थल में उपयुक्त नहीं है। “सम्प्रेष”='अग्नीदग्नीन् विहर' इत्यादि प्रैषण में, 'कर्मगर्हा'=ज्ञातकर्म को पुनः ज्ञापनरूप निन्दा या दोष का उदाहरण दिया है वह “अनुपालम्भः” = निन्दा या दूषण नहीं है 'संस्कारत्वात्' = क्योंकि, उसके द्वारा अग्नीध्र का संस्कार होता है ॥३७॥ अभिधानेऽर्थवादः ॥ १.२.३८ ॥ शा० भा०—'चत्वारि शृङ्गा' इत्यसद्भिधाने गौणः शब्दः । गौणी कल्पना प्रमाणवत्त्वात् । उच्चारणाददृष्टमप्रमाणम् । चतस्रो होत्राः शृङ्गाणीवास्य । त्रयोऽस्य पादा इति सवनाभिप्रायम् । द्वे शीर्षे इति पत्नीयजमानौ । सप्त हस्तास इति च्छन्दांस्यभिप्रेत्य । त्रिधा बद्ध इति त्रिभिर्वेदैर्बद्धः । वृषभः कामा- न्वर्षतीति, रोरवीति शब्दकर्मा, महो देवो मर्त्यानाविवेशेति मनुष्याधिकाराभि- प्रायम् । तद्यथा चक्रवाकस्तनी हंसदन्तावली काशवस्त्रा शैवालकेशी नदीति नद्याः स्तुतिः । यज्ञसमृद्धये साधनानां चेतनसादृश्यमुपपादयितुकाम आमन्त्रणशब्देन लक्ष- यति ओषधे त्रायस्वैनमिति, शृणोत ग्रावाण इति च । अतः परं प्रातरनुवाकानु- वचनं भविष्यति, यत्राचेतनाः सन्तो ग्रावाणोऽपि शृणुयुः, किं पुनर्विद्वांसोऽपि ब्राह्मणा इति । इत्थं चाचेतना अपि ग्रावाण आमन्त्र्यन्ते ॥ ३८ ॥ भा० वि० — असदर्थत्वेनानर्थक्यं दूषयति — अभिधाने इति । सूत्रं व्याचष्टे— चत्वारीति । अविद्यमानमपि चतुश्शृङ्गत्वदिरूपकल्पनयाभिधाय यागस्तावको- ऽयं मन्त्रः इत्यर्थः ।