भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२८० मीमांसादर्शनम् [ सू० बन्ध्या के दौहित्र के मकान के स्मरण के समान इसको नहीं कहा जा सकता है। मनु आदि महर्षि यदि वेदवचन को ही स्मृति निबद्ध न करें तो उनके समान अन्य महर्षि उनका अनुष्ठान कैसे करेंगे ? अतः यह मानना होगा कि स्मृतिवाक्य श्रुतिवाक्य के समान ही प्रमाण हैं। पूर्वोक्त स्मृति के मूलाधार श्रुतिवचनों का भाष्यकार ने स्वयं उद्धार किया है। यथा "यां जानाः प्रतिनन्दति", इस वेदमन्त्र का एवं "एषा वै सम्वत्सरस्य पत्नी यदेकाष्टका" ये अर्थवाद वाक्य स्मृति के मूल हैं। "स्थलया उदकं परिगृह्णन्ति" यह अर्थवाद तडाग स्मृति का मूलवचन है। "धन्वन्निव प्रपा असि" यह मन्त्र प्रपा स्मृति का मूल है। भाष्य के आपातलभ्य अर्थ से यह अवगत होता है कि गुरु का अनुगमन, तडाग, प्रपा विषयक स्मृतियां दृष्टार्थ हैं, अर्थात् उनका दूसरे का उपकार करना आदि लौकिक प्रयोजन ही है। किन्तु वार्तिककार ने कहा है कि यह भाष्यकार का प्रौढ़िवाद मात्र है, वस्तुतः वे भी अदृष्ट जनक हैं अर्थात् धर्म के साधन हैं, किन्तु लौकिक प्रयोजनका निर्वाह उनका अविनाभूत फल है। स्मृति वेद विषयक हैं, वे धर्म में प्रमाण हैं इस प्रसङ्ग में सूत्र में सूचित अनुमान का स्वरूप निम्नलिखित है। स्मृतियां, वेद मूलक हैं ( प्रतिज्ञा ) क्योंकि, वेद प्रामाण्यवादी उनका कर्ता है ( हेतु ) जो वेदप्रामाण्यवादी कर्ता से निबद्ध नहीं हैं, वे वेदमूलक नहीं हैं, यथा बौद्धादि सम्प्रदाय के शास्त्र ( उदाहरण ) इसी प्रकार स्मृतियां धर्म में प्रमाण है ( प्रतिज्ञा ) क्योंकि, वे वेदमूलक हैं ( हेतु ) जो वेदमूलक नहीं हैं वे धर्म में प्रमाण नहीं है, यथा बौद्ध आदि सम्प्रदाय के शास्त्र ( उदाहरण ) ( स्मृति प्रामाण्याधिकरण ) ॥ २ ॥ [ २ ] विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम् ॥ ३ ॥ सि० शा० भा०—अथ यत्र श्रुतिविरोधस्तत्र कथम्। यथौदुम्बर्याः सर्ववेष्टनम्। 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' इति श्रुत्या विरुद्धम्। अष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्म- चर्यचरणं 'जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत' इत्यनेन विरुद्धम्। क्रीतराजको भोज्यान्न इति 'तस्मादग्नीषोमीये संस्थिते यजमानस्य गृहेऽशितव्यम्' इत्यनेन विरुद्धम्। तत्प्रमाणम्, कर्तृसामान्यादित्येवं प्राप्ते— ब्रूमः।