मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३ ] .प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३१७ मुभयत्राप्यानुपूर्वी दर्शनीयेत्याशयः । श्रुतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयपरिहारायापेक्षितो यः स्मृत्यप्रामाण्यरूपोऽर्थः, तमाद्ये क्षणे दृढसिद्धत्वेनावधिं कृत्वा विरोधे स्मृत्यप्रामाण्याच्छ्र- त्यबाधः । श्रुत्यबाधाच्च तद्विरोधे स्मृतिमूलश्रुतिकल्पनानुपपत्तिर्यावत्तावद्गच्छेत्तावता ह्यपरश्रुतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयपरिहारसाध्यः श्रुतिप्रामाण्यरूपोऽर्थः सिद्धयति । तथा स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्यापरिहार्यतयापेक्षितो यः श्रुतिप्रामाण्यरूपोऽर्थः तमाद्ये क्षणे दृढसिद्धत्वेनावधिं कृत्वा विरोधे श्रुतिप्रामाण्यात् स्मृतिमूलश्रुत्यकल्पनम्, तदकल्पनाच्च स्मृतेर्भ्रान्त्यादिमूलत्वकल्पनं यावत्तावद् गच्छेत् तावता ह्यपरः स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रया- परिहार्यत्वसाध्यः स्मृत्यप्रामाण्यरूपोऽर्थः सिद्धयतीत्यर्थः । ननु भाष्यकृतैकविधानुपूर्विकथनादानुपूर्वीद्वयाभिधानं भाष्यव्याख्यानानुपयोगित्वाद- नर्थकं स्यादित्याशङ्कयाह—तदेकेनेति । उपलक्षणार्थमेकानुपूर्विकथनमित्याशयः । कीदृशी तर्हि द्वितीयानुपूर्वी दर्शनीयेत्यपेक्षायामाह—द्वितीयेति । स्वयं पूर्वोक्तस्याप्यस्य मार्गस्य भाष्योक्तापेक्षया द्वितीयत्वम् । नन्वित्याशङ्कापूर्वकं तुल्यबलविकल्पोपपत्तिप्रतिपादनार्थं भाष्यं व्याचष्टे—व्रीहीति । तस्माद्युक्तमिति सूत्रार्थोपसंहारभाष्यं व्याचष्टे—अत इति । ॥ इति वार्तिकव्याख्यायां सर्वानवद्याकारिण्यां द्वितीयं विरोधाधिकरणम् ॥ ३ ॥ भा० प्र०—पूर्वं अधिकरण में स्मृति का प्रामाण्य प्रतिष्ठापित किया गया है । प्रकृतमें यह विचारणीय है कि श्रुतिविरुद्ध स्मृति प्रमाण है या नहीं ? जैसे "औदुम्बरवृक्ष से निर्मित स्थूणा = स्तम्भ का समग्रभाव से वेष्टन करना चाहिए" यह स्मृति वाक्य "औ- दुम्बरीं स्पृष्ट्वा उद्गायेत्" अर्थात् उदुम्बर निर्मित स्तम्भ का स्पर्शंकर उद्गाता गान करे इस श्रुति वाक्य से विरुद्ध है । क्योंकि, स्मृति के अनुसार सम्पूर्ण का वस्त्र के द्वारा वेष्टन करने पर उनका स्पर्श सम्भव नहीं है अर्थात् स्तम्भ के साथ त्वचा का संयोग सम्भव नहीं है । इसी प्रकार "अष्टाचत्वारिंशद् वर्षाणि वेदब्रह्मचर्यं चरेत्" अड़तालीस वर्ष तक वेद के अध्ययन के लिए ब्रह्मचर्यंका अवलम्बन करे, यह स्मृतिवाक्य "जातपुत्रः कृष्णकेशः अग्नीनादधीत" अर्थात् जिसको पुत्र हो गया है ऐसा व्यक्ति कृष्णकेश की अवस्था में ही अर्थात् केशपकने से पूर्व ही अग्नि का आधान करे, इस श्रुतिवाक्य का विरोध है, कारण, अडतालीस वर्ष तक ब्रह्मचर्यं का पालनकर इसके बाद दश वर्ष से कम वर्ष की कन्याके साथ पाणिग्रहणपूर्वकं पुत्रकी उत्पत्ति पर्यन्त अपेक्षाकरने से पूर्व ही उसका केश पक जायगा, अतः बाल पकने से पूर्व अग्नि का आधान सम्भव नहीं है । इस प्रकार उपलभ्यमान श्रुति के विरुद्ध स्मृतियाँ प्रमाण है या अप्रामाण्य है पूर्व अधिकरण में उल्लिखित युक्ति के अनुसार श्रुति के समान स्मृति भी जब प्रमाण है, तब स्मृति के अप्रमाण होने की आशङ्का उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर सभी स्मृतियों का ही अप्रामाण्य प्राप्त होगा । अतः परस्पर विरुद्ध श्रुति वाक्यों में जिस प्रकार विकल्प का आश्रयण कर दोनों का ही प्रामाण्य माना जाता है, प्रकृत में भी ऐसी स्थिति में उसी के समान परस्पर विरुद्ध श्रुति और स्मृति में भी वैसा ही विकल्प मानना उचित है ।