मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१८ मीमांसादर्शनम् [ सू० विकल्प दो प्रकार का होता है—(१) इच्छा विकल्प (२) व्यवस्थित विकल्प । जिस स्थल में कर्ता अपनी इच्छा के अनुसार शास्त्र में उल्लिखित एक से अधिक पदार्थों में जिस किसी पक्ष का इच्छा से अनुसरण कर सकता है—वह इच्छा विकल्प है । जैसे—'व्रीहिभिर्यजेत यवैर्वा यजेत' अर्थात् व्रीहि के द्वारा याग करे या यव के द्वारा याग करे । इस स्थल में कर्ता का स्वातन्त्र्य है । व्रीहि या यव किसी के द्वारा भी याग कर सकता है । जिस स्थल में विकल्पित पदार्थ विशेष अधिकारी के मध्य में व्यवस्थित रहता है — उसको व्यवस्थित विकल्प कहते हैं । जैसे—"उदिते जुहोति" अनुदिते जुहोति" अर्थात् सूर्योदय होने पर अग्निहोत्र होम करे, एवं सूर्योदय होने से पूर्व अग्निहोत्र होम करे । इस स्थल में एक शाखा के व्यक्तियों के लिए उदित होम का विधान है, और अन्य शाखा के व्यक्तियों के लिए अनुदित होम व्यवस्थित है, इस शाखा के लिए उदित होम अकर्तव्य है । क्योंकि दोनों स्थलों में अर्थवाद वाक्य में निन्दा की गई है । प्रकृत में परस्पर विरुद्ध श्रुति और स्मृति में इच्छा का विकल्प होगा । इस प्रकार पूर्वपक्ष के उत्तर में सिद्धान्त के रूप में कहा गया है कि "विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्" श्रुति और स्मृति में विरोध रहने पर श्रुति ही प्रमाण है, स्मृति प्रमाण नहीं है । क्योंकि श्रुति शब्द प्रमाण है; वह स्वतः प्रमाण है और स्मृति का प्रामाण्य श्रुति सापेक्ष है । इसलिए, श्रुति बलवती है और स्मृति दुर्बल है । उपजीव्य और उपजीवक में विरोध होने पर उपजीव्य ही प्रमाण होता है, क्योंकि, उपजीवक उपजीव्य के आश्रित होने से उपजीव्य को छोड़कर अर्थात् अप्रमाण कर उपजीव्य स्थान नहीं पा सकता है, और न प्रमाण हो सकता है । प्रकृत में श्रुति उपजीव्य है और स्मृति उपजीवक है । अतः, स्मृति और श्रुति का समान बल नहीं है । समान बल में ही विकल्प होता है, इसलिए इन दोनों में विकल्प नहीं हो सकता है । पूर्वपक्षी के द्वारा प्रस्तुत विकल्प की चर्चा भी ठीक नहीं है, क्योंकि, विकल्प मानने पर आठ दोष होते हैं । अतः अन्य पक्ष सम्भव रहने पर आठ दोषों से युक्त विकल्प नहीं माना जाता है। जैसे 'व्रीहिभिर्यवैर्वा यजेत' व्रीहि या यव के द्वारा याग करे । इस विधि में व्रीहि और यव का समुच्चय निरर्थक होने से विकल्प माना गया है । इस विकल्प को मानने पर यव से यज्ञ करने पर (१) व्रीहि में शास्त्र के द्वारा प्राप्त प्रामाण्य का त्याग (२) अप्राप्त अप्रामाण्य का स्वीकार (३) व्रीहि के ग्रहण के समय यव शास्त्र का प्रामाण्य परित्यक्त हुआ था उसका पुनः उज्जीवन या पुनः स्वीकार । (४) प्राप्त अप्रामाण्य का हान या परित्याग करना होगा—इस प्रकार यव के पक्ष में चार दोष हैं और इसी प्रकार व्रीहि के द्वारा यज्ञ करने पर (१) यव- शास्त्र के पूर्वप्राप्त प्रामाण्य का परित्याग (१) अप्रामाण्य की कल्पना (३) यव के ग्रहण के समय व्रीहिशास्त्र का प्रामाण्य जो परित्यक्त हुआ था उसका पुन उज्जीवन, (४) प्राप्त अप्रामाण्य का परित्याग—इस प्रकार व्रीहिपक्ष में भी चार दोष होते हैं । इस प्रकार