भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 804 में से

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७ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०१ प्राणियों की मुक्ति हो, जो व्यक्ति आत्मघाती है स्वयं ही धर्म को नहीं मानता है, नरक का भय नहीं करता है—वह धर्म का उपदेश कैसे देगा ? वह उपदेश दे भी तो उसका उपदेश वेदमूलक कैसे हो सकता है ? उन्होंने वेद से ही धर्मतत्त्व की अवगति की और वेद के विरुद्ध प्रचार किया, माता और पिता का द्रोही है जो माता और पिता को जनक और जननी नहीं मानता है, गौतम बुद्ध ने भी वेद से ही धर्म के तत्त्व की अवगति की किन्तु वह अपने धर्मोपदेश को वेदमूलक नहीं मानता है, धर्म और अधर्म प्रत्यक्ष के अयोग्य हैं, अतः कितना बड़ा भी योगी क्यों न हो, वह अपने प्रभाव से उनका प्रत्यक्ष कर उपदेश नहीं दे सकता है। इसलिए, जब उस मत को मानने वाले स्वयं ही जब धर्म को वेदमूलक नहीं मानते हैं, तब श्रद्धा के कारण जड़मति वर्णाश्रम को मानने वाला उनके उपदेश को वेदमूलक कहे तो यह कैसे सङ्गत होगा ? “हेतु-दर्शनात् च” । इनकी स्मृतियाँ लोभ आदि अनेक कारणों के वर्तमान रहने से, उनको वेदमूलक नहीं कहा जा सकता है। बौद्धगण अपने सम्प्रदाय में अनुस्मृत स्मृतियों को वेदमूलक होने से प्रमाण नहीं माना है। अपि तु अनेक हेतु जालों से उनके उपदेश की धर्मप्राणता सिद्ध करने का प्रयास किया है। वैदिकों के धर्मोपदेश के आधार पर यागादि को धर्म नहीं माना है। यदि इस प्रसङ्ग में यह कहा जाय कि “शिष्टाकोपे अविरुद्धम्” । साधारण रूप में बुद्ध आदि की स्मृतियाँ अनादरणीय भले ही हो, किन्तु अहिंसा, शम, दम, दान आदि विषयों की कर्त्तव्यता का उपदेश होने से उनके साथ वेदानुशिष्टकर्मों का किसी प्रकार का विरोध न होने से वे प्रमाण हैं और वे धर्मार्थ में बुद्धादि की स्मृति होने पर भी ज्ञातव्य क्यों नहीं होगी ? अर्थात् ज्ञातव्य ही होगी । इस प्रसङ्ग में कहना है कि ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि, यह सङ्गत नहीं है, “शास्त्रपरिमाणत्वात्” क्योंकि, सभी शास्त्र परिमित हैं, क्योंकि किस-किस शास्त्र से धर्म ज्ञातव्य है—इसका शास्त्रों में ही निर्देश कर दिया गया है। बौद्ध आदि स्मृतियाँ उनके अन्तर्गत नहीं हैं, अतः उनसे धर्म ज्ञातव्य नहीं है। “मनुर्वे यत्किञ्चिन आवदत् तद् भेषजम्” अर्थात् मनु ने जो कहा है वह मनुष्य के पाप= व्याधि का भेषज=औषध है, इत्यादि वेद वचन के द्वारा ही निर्दिष्ट है। किस शास्त्र से धर्म ज्ञातव्य है—इसमें वेद का निर्देश ही प्रमाण है। वेद के अनुसार ही स्मृति में भी कहा गया है— पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ चार वेद, छ वेदाङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा एवं धर्मशास्त्र ये चौदह स्थान अर्थात् शिष्टों से परिगृहीत शास्त्र ही विद्या एवं धर्म के चतुर्दश स्थान हैं। ये नित्य हैं, प्रत्येक कल्प में मनु आदि महर्षिगण पूर्ववत् वेदार्थ का स्मरणादि (स्मृतियाँ) निबद्ध कर देते हैं, आकल्प विच्छेद से ये सर्वथा रहित हैं। अतः, इनसे ही धर्मतत्त्व ज्ञातव्य है बौद्ध ग्रन्थों से ज्ञातव्य नहीं हैं। २६

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