मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०० मीमांसादर्शनम् [ सू० अग्राह्य ही रहता है। इसलिए आचमन उपवीतित्व बद्धशिखत्व, दक्षिणाचारता अवश्य ही कर्तव्य है। सभी स्थलों में कृताचमनत्व, यज्ञोपवीतित्व, बद्धशिखत्व, दक्षिणाचारता आदि विचारित विषयों में सभी का अनुकूल वेद वचन विद्यमान रहने से इनको स्मार्तं कर्म अर्थात् अप्रत्यक्ष श्रुतिविहित कर्म मानकर श्रुतिविहित क्रम इत्यादि के साथ इनका विरोध उपेक्षणीय है या नहीं—इसप्रकार किया गया विचार दृढ़ नहीं है, कारण; ये यदि प्रत्यक्षश्रुति से उपदिष्ट न होते तो श्रौत कर्म और स्मार्तं कर्म या पदार्थ का विरोध उपेक्षणीय है कि नहीं—इस प्रकार का विचार बलवान् होता, किन्तु, दोनों ही श्रौत हैं तब उनका विरोध रहने पर भी वे प्रबल नहीं हैं। इसलिए, वार्त्तिककार ने इस स्थल में भिन्न प्रकार से ही अधिकरण की रचना की है। अतः पूर्व अधिकरण का “विरोघे त्वनपेक्षं स्यात् असति ह्यनुमानम्” “हेतुदर्शनाच्च” शिष्टाकोपेऽविरुद्धमिति चेत्” “न शास्त्रपरिमाणत्वात्” इन चार सूत्रों को लेकर एक अधिकरण माना है। “अपि वा कारणाग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन्” यह सूत्र एवं आगे के सूत्र का 'तेष्वदर्शनात् विरोधस्य' यहाँ तक के अंश को ग्रहण कर दूसरा अधिकरण होता है। इस प्रकार जिन दो अधिकरणों की रचना हुई है; उनमें पूर्व अधिकरण में पाञ्चरात्र, पाशुपत एवं शाक्यमत के प्रामाण्य का खण्डन किया गया है। पाञ्चरात्र, एवं पशुपत ये कहो वेदमूलक भी हैं, किन्तु शाक्य- मत तो सर्वथा वेद बाहर है। इसलिए शाक्यमत का खण्डन ही वार्त्तिक मत में प्रदर्शित किया गया है। पूर्व अधिकरण के द्वारा स्मृतियों का वेदमूलकत्व सिद्ध किया गया है, प्रदर्शित दृष्टि के अनुसार यदि शाक्य आदि के स्मरणों को भी वेदमूलकत्व मानकर उनके प्रामाण्य की आशङ्का भी की जा सकती है, शाक्य सिंह (बुद्ध, महावीर) क्षत्रिय हैं, अतः क्षत्रिय मनु की स्मृतियों के समान उनका भी प्रामाण्य मानने में क्या आपत्ति है, क्योंकि, उन लोगों ने भी वेद का ज्ञान किया होगा ? इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि “विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्”, “हेतुदर्शनाच्च”। आशय यह है कि शाक्य आदि की स्मृतियों का वेदमूलकत्व अनुमान नहीं हो सकता है, क्योंकि “असति अनुमानम्” वेद का विरोध न रहने पर वेदमूलकता का अनुमान हो सकता है, किन्तु, “विरोधे त्वनपेक्ष्यम्” अर्थात् शाक्य आदि की वेद विरुद्धता अतिशय स्पष्ट है, इसलिए उनकी स्मृतियां वेदमूलक नहीं है। धर्म का उपदेश करना क्षत्रिय का कर्तव्य नहीं है। ब्राह्मण से अतिरिक्त वर्णों के लिए धर्म का उपदेश करना निषिद्ध है, केवल ब्राह्मण का ही यह कार्यं है। बुद्ध आदि ने क्षत्रिय होकर भी अशेष जीवन को धर्म के उपदेश देने में ही व्यतीत किया है, अतः उनका सम्पूर्ण जीवन शास्त्र विरुद्ध कर्मों के अनुष्ठान में ही व्यतीत हुआ है। आत्मा का उद्धार करना ही सभी लोगों के लिए प्रथम कर्तव्य के रूप में शास्त्र में कहा गया है, किन्तु, उन्होंने कहा कि मैं अनन्त नरक में ही जाऊँ कोई क्षति नहीं है, संसार के