मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
४०० मीमांसादर्शनम् [ सू० अग्राह्य ही रहता है। इसलिए आचमन उपवीतित्व बद्धशिखत्व, दक्षिणाचारता अवश्य ही कर्तव्य है। सभी स्थलों में कृताचमनत्व, यज्ञोपवीतित्व, बद्धशिखत्व, दक्षिणाचारता आदि विचारित विषयों में सभी का अनुकूल वेद वचन विद्यमान रहने से इनको स्मार्तं कर्म अर्थात् अप्रत्यक्ष श्रुतिविहित कर्म मानकर श्रुतिविहित क्रम इत्यादि के साथ इनका विरोध उपेक्षणीय है या नहीं—इसप्रकार किया गया विचार दृढ़ नहीं है, कारण; ये यदि प्रत्यक्षश्रुति से उपदिष्ट न होते तो श्रौत कर्म और स्मार्तं कर्म या पदार्थ का विरोध उपेक्षणीय है कि नहीं—इस प्रकार का विचार बलवान् होता, किन्तु, दोनों ही श्रौत हैं तब उनका विरोध रहने पर भी वे प्रबल नहीं हैं। इसलिए, वार्त्तिककार ने इस स्थल में भिन्न प्रकार से ही अधिकरण की रचना की है। अतः पूर्व अधिकरण का “विरोघे त्वनपेक्षं स्यात् असति ह्यनुमानम्” “हेतुदर्शनाच्च” शिष्टाकोपेऽविरुद्धमिति चेत्” “न शास्त्रपरिमाणत्वात्” इन चार सूत्रों को लेकर एक अधिकरण माना है। “अपि वा कारणाग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन्” यह सूत्र एवं आगे के सूत्र का 'तेष्वदर्शनात् विरोधस्य' यहाँ तक के अंश को ग्रहण कर दूसरा अधिकरण होता है। इस प्रकार जिन दो अधिकरणों की रचना हुई है; उनमें पूर्व अधिकरण में पाञ्चरात्र, पाशुपत एवं शाक्यमत के प्रामाण्य का खण्डन किया गया है। पाञ्चरात्र, एवं पशुपत ये कहो वेदमूलक भी हैं, किन्तु शाक्य- मत तो सर्वथा वेद बाहर है। इसलिए शाक्यमत का खण्डन ही वार्त्तिक मत में प्रदर्शित किया गया है। पूर्व अधिकरण के द्वारा स्मृतियों का वेदमूलकत्व सिद्ध किया गया है, प्रदर्शित दृष्टि के अनुसार यदि शाक्य आदि के स्मरणों को भी वेदमूलकत्व मानकर उनके प्रामाण्य की आशङ्का भी की जा सकती है, शाक्य सिंह (बुद्ध, महावीर) क्षत्रिय हैं, अतः क्षत्रिय मनु की स्मृतियों के समान उनका भी प्रामाण्य मानने में क्या आपत्ति है, क्योंकि, उन लोगों ने भी वेद का ज्ञान किया होगा ? इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि “विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्”, “हेतुदर्शनाच्च”। आशय यह है कि शाक्य आदि की स्मृतियों का वेदमूलकत्व अनुमान नहीं हो सकता है, क्योंकि “असति अनुमानम्” वेद का विरोध न रहने पर वेदमूलकता का अनुमान हो सकता है, किन्तु, “विरोधे त्वनपेक्ष्यम्” अर्थात् शाक्य आदि की वेद विरुद्धता अतिशय स्पष्ट है, इसलिए उनकी स्मृतियां वेदमूलक नहीं है। धर्म का उपदेश करना क्षत्रिय का कर्तव्य नहीं है। ब्राह्मण से अतिरिक्त वर्णों के लिए धर्म का उपदेश करना निषिद्ध है, केवल ब्राह्मण का ही यह कार्यं है। बुद्ध आदि ने क्षत्रिय होकर भी अशेष जीवन को धर्म के उपदेश देने में ही व्यतीत किया है, अतः उनका सम्पूर्ण जीवन शास्त्र विरुद्ध कर्मों के अनुष्ठान में ही व्यतीत हुआ है। आत्मा का उद्धार करना ही सभी लोगों के लिए प्रथम कर्तव्य के रूप में शास्त्र में कहा गया है, किन्तु, उन्होंने कहा कि मैं अनन्त नरक में ही जाऊँ कोई क्षति नहीं है, संसार के
७ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०१ प्राणियों की मुक्ति हो, जो व्यक्ति आत्मघाती है स्वयं ही धर्म को नहीं मानता है, नरक का भय नहीं करता है—वह धर्म का उपदेश कैसे देगा ? वह उपदेश दे भी तो उसका उपदेश वेदमूलक कैसे हो सकता है ? उन्होंने वेद से ही धर्मतत्त्व की अवगति की और वेद के विरुद्ध प्रचार किया, माता और पिता का द्रोही है जो माता और पिता को जनक और जननी नहीं मानता है, गौतम बुद्ध ने भी वेद से ही धर्म के तत्त्व की अवगति की किन्तु वह अपने धर्मोपदेश को वेदमूलक नहीं मानता है, धर्म और अधर्म प्रत्यक्ष के अयोग्य हैं, अतः कितना बड़ा भी योगी क्यों न हो, वह अपने प्रभाव से उनका प्रत्यक्ष कर उपदेश नहीं दे सकता है। इसलिए, जब उस मत को मानने वाले स्वयं ही जब धर्म को वेदमूलक नहीं मानते हैं, तब श्रद्धा के कारण जड़मति वर्णाश्रम को मानने वाला उनके उपदेश को वेदमूलक कहे तो यह कैसे सङ्गत होगा ? “हेतु-दर्शनात् च” । इनकी स्मृतियाँ लोभ आदि अनेक कारणों के वर्तमान रहने से, उनको वेदमूलक नहीं कहा जा सकता है। बौद्धगण अपने सम्प्रदाय में अनुस्मृत स्मृतियों को वेदमूलक होने से प्रमाण नहीं माना है। अपि तु अनेक हेतु जालों से उनके उपदेश की धर्मप्राणता सिद्ध करने का प्रयास किया है। वैदिकों के धर्मोपदेश के आधार पर यागादि को धर्म नहीं माना है। यदि इस प्रसङ्ग में यह कहा जाय कि “शिष्टाकोपे अविरुद्धम्” । साधारण रूप में बुद्ध आदि की स्मृतियाँ अनादरणीय भले ही हो, किन्तु अहिंसा, शम, दम, दान आदि विषयों की कर्त्तव्यता का उपदेश होने से उनके साथ वेदानुशिष्टकर्मों का किसी प्रकार का विरोध न होने से वे प्रमाण हैं और वे धर्मार्थ में बुद्धादि की स्मृति होने पर भी ज्ञातव्य क्यों नहीं होगी ? अर्थात् ज्ञातव्य ही होगी । इस प्रसङ्ग में कहना है कि ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि, यह सङ्गत नहीं है, “शास्त्रपरिमाणत्वात्” क्योंकि, सभी शास्त्र परिमित हैं, क्योंकि किस-किस शास्त्र से धर्म ज्ञातव्य है—इसका शास्त्रों में ही निर्देश कर दिया गया है। बौद्ध आदि स्मृतियाँ उनके अन्तर्गत नहीं हैं, अतः उनसे धर्म ज्ञातव्य नहीं है। “मनुर्वे यत्किञ्चिन आवदत् तद् भेषजम्” अर्थात् मनु ने जो कहा है वह मनुष्य के पाप= व्याधि का भेषज=औषध है, इत्यादि वेद वचन के द्वारा ही निर्दिष्ट है। किस शास्त्र से धर्म ज्ञातव्य है—इसमें वेद का निर्देश ही प्रमाण है। वेद के अनुसार ही स्मृति में भी कहा गया है— पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ चार वेद, छ वेदाङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा एवं धर्मशास्त्र ये चौदह स्थान अर्थात् शिष्टों से परिगृहीत शास्त्र ही विद्या एवं धर्म के चतुर्दश स्थान हैं। ये नित्य हैं, प्रत्येक कल्प में मनु आदि महर्षिगण पूर्ववत् वेदार्थ का स्मरणादि (स्मृतियाँ) निबद्ध कर देते हैं, आकल्प विच्छेद से ये सर्वथा रहित हैं। अतः, इनसे ही धर्मतत्त्व ज्ञातव्य है बौद्ध ग्रन्थों से ज्ञातव्य नहीं हैं। २६
४०२ मीमांसादर्शनम् [ सू० अहिंसा, दान आदि वेद से उपदिष्ट होने पर भी बौद्धों के संस्पर्श से सुराभाण्ड में स्थित गङ्गाजल के समान हैं, कुत्ते के चमड़े से बनायी गई दृति (किस्ति) में रखे गये गोदुग्ध के समान वह अपवित्र हो जाने से उनकी स्मृतियों से वे ज्ञातव्य होने पर धर्म नहीं होंगे। अपितु वेद में उल्लिखित महर्षियों के ग्रन्थों से ही धर्म होता है—इसीलिए आचार्य कुमारिल भट्ट ने कहा है— “वेदेनैवाभ्यनुज्ञाता येषामेव प्रवक्तृता । नित्यानामभिधेयानां मन्वन्तरयुगादिषु ॥ तेषां विपरिवर्तेषु कुर्वतां धर्मसंहिताः । वचनानि प्रमाणानि नान्येषामिति निश्चयः ॥” वेदोक्त अहिंसा आदि और बुद्धोपदिष्ट अहिंसा आदि समान नहीं है, क्योंकि उनके मत में हिंसात्व अवच्छेद में हिंसा वर्जित होने से ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ में भी हिंसा परित्याज्य होगी, किन्तु, इस पक्ष में वेद विधि रूप में विहित हिंसा में पाप नहीं है, अपि तु वेदविधि के अविषयत्व एवं वेद निषिद्धत्व रूप में हिंसा पाप है। ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ में हिंसा वेदविहित होने से वह अवश्य अनुष्ठेय है, किन्तु उनकी स्मृति के अनुसार अहिंसा अवलम्बनीय होने से ज्योतिष्टोमादि यज्ञ के स्थल में भी हिंसा का परित्याग करना होगा। सन्देह नहीं कि आज बौद्ध धर्मों में अतिशय अनुराग होने से विहित स्थल में भी हिंसा के वर्णन का विपुल प्रयास चल रहा है साथ ही अमेध्य मांस भक्षण की प्रवृत्ति भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। धन्य है धर्म और अन्धानुराग-परम्परा एक ओर हिंसा का विरोध और दूसरी ओर हिंसाजन्य उपलब्ध मांस भक्षण की अतिशय प्रवृत्ति । इसीलिए वार्त्तिककार ने कहा है— शोभासोक्त्यं-हेतूक्तिकलिकालवशेन वा । यज्ञोक्तपशुहिंसादित्यागभ्रान्तिमवाप्नुयुः ॥ वेदादिशास्त्रों में ब्राह्मण से भिन्न को विधिपूर्वक सम्प्रदान निषिद्ध है, किन्तु बौद्धादिस्मृतियों में इसे ही प्रशंसनीय विषय के रूप में स्वीकार किया गया है। शम, दम आदि के सम्बन्ध में भी यही रीति अपनानी चाहिए। अतः वेद बहिर्भूत बौद्धादि- स्मृति प्रमाण नहीं है। “अपि वा कारणाग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन्” इस सूत्र की व्याख्या में वार्त्तिककार ने शिष्टाचार का प्रामाण्य प्रतिष्ठापित किया है। होलाक (होली का उत्सव) आदि कर्म जो प्रत्यक्ष श्रुति से विहित नहीं हैं एवं स्मृतिकारों ने उन्हें निबद्ध नहीं किया है, किन्तु शिष्ट = वेदप्रामाण्यवादियों ने इनका अनुष्ठान किया है। अतः यह विचारणीय है कि ये शिष्टाचार प्रमाण है या नहीं ? इस सन्देह में यदि यह कहा जाय कि (पूर्वपक्ष के रूप में) शिष्टाचार संख्याबद्ध एवं व्यवस्थित प्रमाण नहीं है, साथ ही अनेक शिष्टों ने भी बहुत
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०३ से अकर्म किये हैं, अतः, शिष्टाचार प्रमाण नहीं है। इस प्रसङ्ग में कहा है— "कारणाग्रहणे" शिष्टाचार के मूल में यदि काम, क्रोध आदि कारण न रहें तो "प्रयुक्तानि" अर्थात् स्मृति रूप में निबद्ध न रहने पर भी वे कर्म शिष्टों के द्वारा आचार के रूप में सम्पादित हो रहे हैं, वे "प्रतीयेरन्" धर्म के रूप में प्रतीत होंगे। "तेषु अदर्शनात् विरोधस्य" अर्थात् उन कर्मों के विरुद्ध वचन शास्त्र में नहीं देखे गये हैं। अतः शिष्ट धर्म की बुद्धि से जो अनुष्ठान कर रहे हैं, वे भी धर्म में प्रमाण है और और वे ग्राह्य हैं। ये शिष्टाचार देश के भेद से, कुल के भेद से अनेक होने से, ग्रन्थ के विस्तार के भय से स्मृतिकार ने उन्हें उपनिबद्ध नहीं किया है। इसीलिए उन्होंने शिष्टाचार को प्रमाण कहा है। यथा— वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ मनु० २/६ समग्र वेद धर्म में प्रमाण है एवं वेदवेत्ताओं की स्मृतियां और शास्त्र शिष्टों का आचार एवं आत्मतुष्टि धर्म में प्रमाण है। याज्ञवल्क्यस्मृति में कहा गया है— श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । सम्यक् सङ्कल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ (याज्ञव० स्मृ०) श्रुति, स्मृति, सदाचार, अपना प्रिय अर्थात् आत्मतुष्टि एवं सम्यक् सङ्कल्पमूलक कामना ये धर्म में प्रमाण है। अतः स्मृति के समान ही शिष्टाचार भी प्रमाण है। शिष्टा- चार प्रमाण भी अनुमान के द्वारा ही प्रतिपादित है— होलाक प्रभृति आचार प्रमाण हैं (प्रतिज्ञा) यतः वे धर्मबुद्धि से शिष्टों से (वैदिकों) अनुष्ठित हैं (हेतु) जैसे अष्टका आदि का अनुष्ठान (उदाहरण) शिष्टाचार को प्रमाण मानने पर स्थल विशेष में शिष्टों का अकर्म भी प्रमाण होगा, यह आपत्ति ठीक नहीं है, क्योंकि वे आचरण धर्म बुद्धि से उनके द्वारा सम्पादित नहीं है। अतः अविगीत (अनिन्दित) शिष्टाचार को ही प्रमाण माना गया है ॥ ७ ॥ अथ चतुर्थयववराधिकरणम् [४] तेष्वदर्शनाद्विरोधस्य समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ॥८॥ पू० शा० भा०—'यवमयश्चरुः, वाराही उपानहौ, वैतसे कटे प्राजापत्यान् संचिनोति' इति यववराहवेतसशब्दान् समामनन्ति। तत्र केचिद्दीर्घशूकेषु यवशब्धं प्रयुञ्जते, केचित् प्रियङ्गुषु। वराहशब्दं केचित्सूकरे, केचित्कृष्ण- शकुनौ। वेतसशब्दं केचिद्वञ्जुलके, केचिज्जम्बवाम्। तत्रोभयथा पदार्थाव- गमाद्विकल्पः ॥ ८ ॥
भा० वि०—एवं तावत्स्मृत्याचारयोः उत्सर्गतः प्रामाण्यम् श्रुतिविरोधे तद- पवादम्, क्वचिदपवादादपवादं चोक्तेदानीमाचारयोरेव मिथो विरोधे किं बलीय इति विचारयति इति । तत्र शब्दानामर्थविषये प्रयोगरूप आचारविशेषे विप्रति- पत्त्या संशयं दर्शयितुं शब्दानुदाहरति—यवमय इत्यादिना । एतद्वाक्यगतानां यव-वराह-वेतसशब्दानां लौकिकप्रयोगेषु विप्रतिपत्तिमाह—तत्र केचिदिति । अत्र प्रयुञ्जत इति प्रियङ्गवादिष्वनुषज्यमानवर्तमानोपदेशसामर्थ्याद्यव-वराह- वेतसशब्दानां प्रियङ्गु-वायस-जम्बूष्वार्यप्रयोगाभावेऽपि, म्लेच्छप्रयोगे भाष्यकारे- णोपलब्ध इति गम्यते, अतो नोदा^१हरणत्वानुपपत्तिरित्यवसेयम् अनेन च विप्रति- पत्तिप्रदर्शनेन किं द्वावप्यर्थावृतैक एवेति तुल्यबलत्वातुल्यबलत्वाभ्यां संशयस्सू- चितः, न चानवधृतप्रामाण्यस्य म्लेच्छाचारस्य बलाबलचिन्तैवानुपपन्नेति वाच्यम्, उत्तराधिकरणन्यायेन प्रामाण्यावधारणमाश्रित्य बलाबलचिन्तोपपत्तेरित्यवसेयम् । प्रयोजनं तु विचारस्य चर्वादौ दीर्घशूकादेः प्रियङ्गवादिना सह विकल्पप्राप्तिः तेष्वित्यादिसूत्रं योजयन् पूर्वपक्षमाह—तत्रेति । अयमर्थः यदि म्लेच्छप्रसिद्धेरार्यप्रसिद्धिर्बलीयसी, ततस्तत्सिद्ध एवार्थो ग्राह्यः । नत्वेवं धर्मविषये शास्त्रानुसारिण्यास्तस्या बलवत्त्वेऽपि, वृद्धव्यवहाराव- गम्यपदार्थेषु शिष्टम्लेच्छप्रसिद्धयोर्विशेषादर्शनेनोभयथा शिष्टानां स्वस्वप्रसिद्धा म्लेच्छप्रसिद्धा च म्लेच्छानामपि स्वप्रसिद्ध शिष्टप्रसिद्धा च शब्दार्थावगमसंभवे सति द्वयोरपि पदार्थप्रतिपत्त्योः मूलप्रमाणाविशेषेण तुल्यबलत्वाद्व्वावप्यर्थाविति विकल्पेन पदार्थप्रयोगः प्राप्नोतीति । अनेन च तेषु पदर्थेषु शिष्टम्लेच्छप्रसिद्धयोः विरोधस्य वैलक्षण्यस्य विशेषस्यादर्शनात्, समा-समबलैव स्यात् विप्रतिपत्ति- रिति सूत्रार्थो दर्शितः ॥ ८ ॥ त० वा—तेष्वदर्शनाद्विरोधस्येत्येवमुपक्रमं वा सूत्रम् । शब्दार्थविषयप्रयोग- शिष्टारविप्रतिपत्तौ सन्देहः । एकशब्दमनेकार्थ शिष्टैराचर्यते यदा । विगानेन तदा तत्र कोऽर्थः स्यात्पारमार्थिकः ॥ ३९९ यव-वराह-वेतसशब्दाः प्रियङ्गुवायसजम्बूष्वपि किल क्वापि देशान्तरे प्रयु- ज्यन्ते । तेन तद्द्वचनत्वे हि सन्देह उपजायते । अनिरूपिततत्त्वानां यावद् दृष्टानुसारिणामम् ॥ ४०० तत्राऽऽह नैव सन्देहः कर्तव्योऽत्र मनागपि । प्रयोगं प्रति तुल्यत्वात्सर्वलोकप्रयोगिणाम् ॥ ४०१ १. अत्र वार्तिककृता भाष्यमते समुद्भाविते दोषं निरस्यतीति बोध्यम् ।
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०५ यत्र देशे हि यः शब्दो यस्मिन्नर्थे प्रयुज्यते । शक्तिस्तद्गोचरा तस्य वाचिकाख्या प्रमीयते ॥ ४०२ तस्याश्च सर्वगामित्वं तन्न्यायत्वात्प्रमीयते । नैकेषामेव सा ह्यस्ति केषांचिद्वा न विद्यते ॥ ४०३ ज्ञाताज्ञातविभागस्तु ज्ञातृभेदेऽवकल्पते । तस्माच्चैरपि न ज्ञाता यच्छब्दार्थस्य वाच्यता ॥ ४०४ तैरप्यभ्युपगन्तव्या स्वप्रसिद्धिसमा हि सा ॥ ४०५ न चाल्पत्वबहुत्वाभ्यां प्रयोक्तॄणां विशिष्यते । वाच्यवाचकभावोऽयमक्षपादादिशब्दवत् ॥ ४०६ बिभीतकेऽक्षशब्दो हि यद्यप्यल्पैः प्रयुज्यते । तथाऽपि वाचकस्तस्य ज्ञायते शकटाक्षवत् ॥ ४०७ तथा चोक्तं शवतिर्गतिकर्मा कम्बोजेष्वेव दृष्टः । विकारापन्नमार्याः प्रयुञ्जते, शवमिति मृतशरीराभिधानादित्यादि । बहव एव हि धातवो नामशब्दाश्च प्रति- देशमर्थभेदेषु व्यवस्थिता दृश्यन्ते तस्मात्समयेमभिधाने विप्रतिपत्तिः स्यात् । एवं च विकृतिषु केषांचिदर्थानां साधारणशब्दवाच्यत्वात्प्रकृताविवाविकृतप्रयोगादार्षं चोदकोऽनुग्रहीष्यते । 'तेष्वदर्शनाद्विरोधस्य' इत्यत्रैव चैतद् व्याख्येयम् । इतरत्र विप्रतिपत्त्यविरोधयोरघटमानत्वात् । तस्मादाचारविप्रतिपत्तेः समत्वाद्विकल्प इति प्राप्ते ॥ ८ ॥ न्या० सु० -- शिष्टाकोपाधिकरणे पूर्वपक्षोक्तं विरोधमभ्युपेत्य प्रमेयवलाबलीस्त्वमात्रेण सिद्धान्ते विरोधादर्शनस्यावक्तव्यत्वात्तेष्वदर्शनादिति सूत्रावयवस्य पूर्वशेषत्वानुपपत्तेरुत्तर- सूत्रशेषत्वं तस्मिन्पक्षेऽङ्गीकार्यमित्याह— तेष्विति । अत्र भाष्यकृता सौत्रविप्रतिपत्ति- शब्दव्याख्यार्थं यवमयश्चरत्यादिवाक्यगतान्येव वराहवेसशब्दानुदाहृत्य वाच्यविषयप्रयोगे विप्रतिपत्तिरुक्ता तत्रास्य विप्रतिपत्त्यभिधानस्य किं प्रयोजनम्, का च विचारसङ्गति- रित्यपेक्षिते साधितप्रामाण्यशिष्टाचारबलाबलविचारात्मकत्वेन सङ्गतिं सूचयन्विचार- विषयप्रदर्शनप्रयोजनमाह—शब्देति । शब्दस्यार्थविषयः प्रयोगः स चासौ शिष्टाचारश्च तस्मिन् विप्रतिपत्ताविति विग्रहः । भाष्यकृद्व्याख्यानेऽपि स्मृत्यधिकरण एवाचारप्रामाण्य- स्यापि व्युत्पादितत्वाद्विरोधाधिकरणे तस्यापि स्मृतिवद्वेदविरोधविषये प्रामाण्येऽपोदिते शिष्टाकोपाधिकरणे च क्रत्वङ्गपदार्थविषयाचाराणां क्रमाद्यविरोधाद्विरोधेऽपि वा प्रमेय- बलीयस्त्वादनपवादेऽभिहिते सम्प्रत्याचारयोरेव परस्परविरोधे किं बलाबलविरोधोऽस्तु, न वेति चिन्ता सङ्गतेवेत्याचारशब्देन सूचितम् । व्युत्पादितप्रामाण्यस्य शिष्टाचारस्यैव बलाबलचिन्ता युक्ता, नाव्युत्पादितप्रामाण्यस्य म्लेच्छाचारस्येति मत्वोद्भाष्यमपि शिष्टा- चारविषयत्वं चिन्तायाः शिष्टशब्देन सूचितम् ।
४०६ मीमांसादर्शनम् [ सू० कीदृशः सन्देह इत्यपेक्षायामाह—एकशब्दमिति । एकः शब्दोऽस्मिन्ननेकार्थोऽस्मिन्निति द्वावपि बहुव्रीही । आचयंत इति भावेोत्पन्नलकारान्तेनाचरणं क्रियत इत्युक्तम् । आचरणमन्यपदार्थः । अक्षादिशब्दवैलक्षण्यप्रतिपादनार्थंविप्रतिपत्तिशब्दव्याख्यानार्थम्— विगानेनेत्युक्तम् । कोऽर्थं इति, किं द्वावप्युतैक एवेत्यर्थः । ननु शास्त्रानुसारिशिष्ट- व्यवहारावगतस्यैव वाच्यत्वनिर्णयात्सन्देहो न युक्त इत्याशङ्क्याह—यवेति । अविद्यमान- प्रयोगारोपसूचनार्थः किलशब्दः वाच्यवाचकसम्बन्धे शास्त्रस्याव्यापारसूचनाय—अनिरू- पितेत्याद्युक्तम्—समेति पूर्वपक्षप्रतिपादनाथंसूत्रावयवव्याख्यानार्थं तत्रेति भाष्यं व्याचष्टे— तत्राहैति । भाष्ये च विकल्पशब्देन प्रतिज्ञानार्थत्वमुभयथेत्यनेनास्यैवावृत्त्या हेत्वर्थत्वं व्याख्यातमिति सूचयितुम्—तुल्यत्वादियुक्तम् । सर्वलोकस्थानां प्रयोगिणामित्यर्थः । तुल्य- त्वमेवोपपादयति—यत्रेति । नन्वेवमपि देशव्यवस्थया वाच्यव्यवस्थोपपत्तेः समविकल्पो न युक्त इत्याशङ्कयाह— तस्याश्चेति । तस्मिन्सर्वंगामित्वे न्यायो युक्तिर्यस्याः शक्तेरस्ति, सा तन्न्याया तद्भावस्त- न्न्यायत्वम् । कीदृशो न्याय इत्यपेक्षायामाह—नैकेषामिति । एकस्यैव वस्तुनः सदसत्त्व- विरोधादित्याशयः । एवं तर्हि सर्वान्प्रत्यसत्त्वमेवास्त्वित्याशङ्क्य, सत्त्वे कस्यचिद्दर्शनानु- पपत्तेन्निराकरोति—केषांचिद्वेति । सर्वेषामपि पुंसां पाचकशक्तिनं विद्यत इत्येतदपि नास्तीत्यर्थः । ननु सदसत्त्ववदेकस्य ज्ञाताज्ञातत्वविरोधोऽपि स्यादित्याशङ्क्य, ज्ञानव्याप्य- त्वाव्याप्यत्वोपाधिकत्वादज्ञाताज्ञातत्वयोर्ज्ञानस्य च पुरुषाश्रितत्वेन तद्भेदे सदसत्त्वाविरो- धान्निराकरोति—ज्ञातेति । शक्तेः सर्वगामित्वमुपपादितमुपसंहरति—तस्मादिति । नन्वष्ट- दोषविकल्पापादकमनेकक्तिकल्पनमन्याय्यमेवागृह्यमाणविशेषत्वेनागत्या क्वचिदङ्गीक्रियते, इह तु प्रयोक्तुरल्पत्वबहुत्वविशेषग्रहणान्नानेकक्तिकल्पनं युक्तमित्याशङ्क्याह—न चेति । दृष्टान्तं व्याचष्टे—विभीतक इति । एकदेशप्रयुक्तानामपिशब्दानां सर्वगामित्वं निरुक्त- कृद्वचनेन द्रढयति—तथा चेति । प्रकृतय एवैकेषु जनपदेषु प्रयुज्यन्ते, विकृतय एवैकेष्वि- त्युपक्रम्य निरुक्तकृता शवतिर्गतिकर्मा कम्बोजेष्वेव भाष्यते विकारमस्यार्या भाषन्ते शव- ति-२-२-८ इति युक्तम् । तदर्थतः पठितम् । कम्बोजेष्वेव जनपदविशेषेषु शवतिर्धातुर्गति- वाची दृष्टः । गच्छतीत्यस्मिन्नर्थे शवतीति प्रयोगात् । आर्यास्तु जनपदविशेषाः ऋदोर- बित्यप्रत्ययान्तत्वेन विकारापन्नं शवतिधातुं न गतौ युञ्जते । शवशब्देन मृतस्याभिधाना- दित्यर्थः । महाभाष्यकृता तु विकारापन्नमार्या भाषन्तइति पाठान्तरमुदाहृतम् । तत्र मृता- वस्था विकारशब्देनोक्ता । न केवलं शवतिरेव देशविशेषे व्यवस्थितः । किं त्वन्येऽपि बहवो धातवो नामशब्दाश्च व्यवस्थिता एव प्रयुज्यन्ते—इत्यादीति । प्राच्येषु हि जनपदेषु दातिर्धातुर्लवनार्थो दातीत्यस्मिन्नर्थे चतीति प्रयोगात् तमेव दात्रमिति ष्ट्रन्प्रत्ययान्तत्वेन विकारापन्नमुदीच्याः प्रयुञ्जते । प्राच्येषु गच्छतीत्यर्थे मध्यमेषु वरं हृति । हन्ततिश्च सुराष्ट्रेषु गमिस्त्वार्येषु भाष्यते ।।
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०७ महाभाष्यकृतैस्तेऽन्ये प्रतिदेशं व्यवस्थिताः । उदाहृता धात्वतोऽतो त्रादिशब्दस्तदाशयः ॥ पूर्वपक्षमुपसंहरति—तस्मादिति । तेष्वदर्शनादित्युपक्रमसूचनं समेत्यस्य प्रतिज्ञामात्रार्थत्वादुभयशव्दार्थावगम इत्यनेन तेष्विति सूत्रावयवो हेत्वर्थेन योजितः । तद्व्याचष्टे—एवं चेति । प्रकृतिवदिति हि चोद- केनार्षं समाम्नायावगतमेव मन्त्ररूपमतिदिश्यते, कार्यप्राधान्यात् तदसम्भवे व्रीह्यादिशब्द- स्थाने नीवारादिशब्दोहेनानन्यथात्वं कल्प्येत । साधारणशब्दे च न तत्कल्पनापत्तिरित्यर्थः । किमिति विकृतिविषयत्वेनायं सूत्रावयवो व्याख्यात इत्यपेक्षिते प्रकृतौ विप्रतिपत्तिदर्शनेना- विरोधाद्योगादिति कारणमाह—तेष्विति । एतदुपक्रमत्वस्यानभिमतत्वद्योतनार्थं पूर्वोप- क्रमाभिप्रायेण समेत्यस्यैवावृत्त्या हेत्वर्थत्वं दर्शयन्नुपसंहरति--तस्मादिति । शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वादिति सिद्धान्तसूत्रं स्वयं तावदवतारणपूर्वकं व्याचष्टे— इतीति । वाशब्देन साम्यं निराकृत्य पूर्वसूत्रगतस्याच्छब्दानुषङ्गेण शास्त्रस्था स्यादित्युक्ते, तस्या एव बलीयस्त्वमर्यादुक्तं भवतीति मत्वा—बलीयसीत्युक्तम् । शास्त्रानुसारवगत- शब्दार्थंगतगुणयोगनिमित्तत्वेनाप्यर्थान्तरप्रतीत्युपपत्तेर्नोभयत्र शक्तिः कल्प्येत्येवमर्थत्वेन तन्निमित्तत्वादिति सूत्रावयवं व्याख्यातुम्—लौकिकोत्युक्तम् । एतदेव विवृणोति—नानेति । भाष्यकृता त्वेकस्यापि वाच्यत्वे तत्सादृश्येनेतरप्रतीत्युपपत्तेर्नोभयोः, साम्यं कल्प्यमिति वाशब्दं व्याख्याय, कः पुनरित्यादिना 'शास्त्रस्थेति' विष्ठत्यावृत्त्या शिष्टापरत्वेन शास्त्रस्थ- शब्दो व्याख्यातः । तन्निमित्तत्वादिति च तेषां शिष्टानां श्रुतिधारणवच्छन्दार्थस्मृतिधारणवच्छब्दार्थस्मृति- धारणनिमित्तत्वादित्येवं तेषामित्यादिना व्याख्याय शास्त्रनिमित्तत्वाच्छिष्टगतायाः प्रतिपत्ते- रिति, तस्यैवावृत्त्या ते चैवमित्यादिना व्याख्यानानन्तरं तत्र शास्त्रस्थशब्दव्याख्यानार्थं तावद्भाष्यं व्याचष्टे—शास्त्रस्था इति । तेषामित्यादिभाष्यं व्याचष्टे—सप्रत्ययेति । सप्र- त्ययतरत्वं तेषामुपपादयति —शास्त्रार्थेष्विति । शिष्टानां प्रत्ययिततरत्वोपपादनस्य प्रकृतो- पयोगमाह—तस्मादिति । ननु शिष्टप्रतिपत्तेर्बलीयस्त्वेऽप्यविरोधादर्थान्तरस्यापि वाच्यत्वे भविष्यतीत्याशङ्का- निराकरणार्थत्वं द्योतयितुं यवशब्द इत्यादि वाशब्दव्याख्या । भाष्याभिप्रायमिदानीं व्याचष्टे—अनवस्थितेति । ते चैवमित्यादिभाष्यं व्याचष्टे — अविप्लुतश्चेति । ननु वाक्य- शेषकृतस्य निर्णयस्य यवमयश्चरुरित्यादिषु वाक्यशेषरहितेष्वसम्भवात्प्रस्तुतोदाहरणगत- शब्दार्थनिर्णयो न सम्भवतीत्याशङ्क्य, अभिधेयनिर्णयस्यैकत्र कृतस्याविशेषात्सर्वत्र निर्णय- कत्वं वक्ष्यमाणमभिप्रेत्य परिहरति—तत्रेति । भाष्यकारोयस्य करम्मविधिधेषत्वाभिधा- नस्य विध्यन्तरशेषत्वव्यावृत्त्यर्थत्वशङ्कानिराकरणार्थं विध्यन्तरं दर्शयति—यवमतीभि- रिति । दीर्घशूकानिति भाष्यमुपपादयति—फाल्गुन इति । तस्माद्वराहमित्यादिवराह-
४०८ मीमांसादर्शनम् [ सू० वेतसशब्दार्थनिर्णयार्थं वाक्यशेषान्तरोपन्यासभाष्यं व्याचष्टे-एवमिति । त्रिवृदादिशब्दा- भिप्रायं बहुवचनम् । व्युत्पादितप्रामाण्यस्य शिष्टाचारस्यैव परस्परविरोधे साम्यवैषम्यचिन्ता युक्ता । नाव्युत्पादितप्रामाण्यस्य म्लेच्छाचारस्य । न क्वचित् शिष्टदेशे यवादिशब्दः प्रियङ्गवा- दिषु प्रयुज्यत इति मत्वोदाहरणानि दूषयति-नन्वेतानीति । नन्वेतदुदाहरणसम्भवेऽप्यु- दाहरणान्तरेषु न्यायस्य फलवत्त्वोपपत्तेरुदाहरणदूषणमयुक्तमित्याशङ्कयाह-अध्यारोष्येति । उदाहरणान्तरसम्भवे तदेवोदाहार्यं, न त्वसद्ध्यारोपो युक्त इत्याशयः । न चोदाहरणान्त- रेऽप्ययं न्यायो व्युत्पाद्य, अन्यत्र व्युत्पादयिष्यमाणत्वादित्याह-सन्दिग्धेषु चेति । न केवलं यवाद्युदाहरणानि न कार्याणि, तु विचारणापि न कार्येत्यपिशब्दो योज्यः । यद्वो- दाहरणाभावात्तावन्न कार्या पौनरुक्त्यादपीति । ननु तत्रोपादाननिर्णयाद्वाक्यशेषवलाच्चैकत्वं धूतोपादाननिर्णयेऽन्यत्र वाक्यशेषा- भावेऽपि तदेवोपादेयमिति नियमाभावादिह त्वभिधेयनिर्णयादेकत्र चाभिधेयत्वेन निर्णीत- स्यान्यत्रापि तद्रूपत्यागायोगात्सर्वत्राभिधेयत्वनिर्णयः इत्यपौनरुक्त्यमाशङ्क्य न्यायफल- वैषम्येऽपि विधिस्तुत्योरेकविषयत्वनियमात्स्तुत्यस्यैव विधेयत्वमिति व्युत्पाद्यन्यायस्वरूपै- क्यादपरिहार्यं पौनरुक्त्यमित्याह-यद्यपीति । ननु नात्र दीर्घशूकादीनां यवादिशब्दवाच्यत्वसन्देहो निराक्रियते, किं तु दीर्घशूका- दिवत्प्रियङ्गवादीनामपि प्रतीतिप्रयोगाभ्यानुपपत्त्या प्रसक्तावाच्यता गौणत्वेनापि प्रतीति- प्रयोगोपपादनेन निराक्रियते । नासावन्यत्र निराकृतेत्याशङ्कयाह-तत्सिद्धिसूत्रे चेति । गौणत्वसम्भवेऽपि प्रतीतिप्रयोगमात्रेण प्रसिद्धार्थत्यागेनाप्रसिद्धार्थकल्पने जहत्स्वार्थाभिधायि- त्वं स्यात्, तस्य च तत्सिद्धिसूत्रे निराकरिष्यमाणत्वात्तेन सह पौनरुक्त्यं स्यादित्याशयः एवं शिष्टाचारयोरेव परस्परविरोधे वाक्यशेषानुसारिणः शब्दार्थविषयप्रयोगरूपस्य शिष्टा- चारस्य प्रामाण्यम्, इतरस्य गौणत्वेनाप्युपपत्तेरप्रामाण्यमिति भाष्यार्थं मत्वोदाहरणा- भावात्पौनरुक्त्यापत्तेश्च दूषयित्वेदानीमार्यम्लेच्छाचारयोरिह साम्यवैषम्यचिन्ता वाक्यशेष- निरपेक्ष्येण च निर्णय इत्यभिप्रेत्य समाधत्ते-तस्मादिति । वाक्यशेषनैरपेक्ष्यद्योतनार्थमन्यग्रहणं न तु यवादिशब्दोदाहरणनिराकरणार्थम् । अनन्तदेशाग्रहणेन सर्वदेशप्रयोगाभावस्य केनापि निश्चेतुमशक्यत्वाद्द्वाभ्यङ्गीकरणाच्चार्यदेश- प्रयोगाभावेऽपि म्लेच्छदेशे क्वापि प्रयोगोऽस्तीति निश्चयोपपत्तेः । पूर्वं वा व्युत्पादित- प्रामाण्यस्यापि म्लेच्छाचारस्यानन्तराधिकरणे शब्दार्थविषये व्युत्पादयिष्यमाणप्रामाण्यस्य वक्ष्यमाणालोचनेन विचारोपपत्तेर्भाष्यकृतापि शास्त्रस्थशब्दं शिष्टाभिप्रायं व्याचक्षाणेनार्य- म्लेच्छप्रयोगयोरेवात्र साम्यवैषम्यचिन्तेति, सूचितमित्यविरोधः । वाक्यशेषोपन्यासस्त्वति- शयार्थः । तत्सिद्धिसूत्रस्य च गौणवृत्तिलक्षणमात्रपरत्वान्न तेनापि पौनरुक्त्याशङ्केत्यनवद्यम् । ननु म्लेच्छाचारस्य प्रामाण्याभावान्न साम्येन पूर्वपक्षः सम्भवतीत्याशङ्क्यादृष्टार्थव्यवहा- र्यार्यम्लेच्छयोर्विशेषाभावान्निराकुर्वन्पूर्वपक्षयति-समेति । एतदेव विवृणोति-आर्यास्ता-
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४०९ वदिति । आर्यम्लेच्छानां प्रयोगिणामिति विग्रहः । तुल्यत्वोपपादनायोत्तराधिकरणसिद्धं शब्दार्थविषये म्लेच्छाचारस्यापि प्रामाण्यं दर्शयति - सर्वो हीति । आर्यप्रयुक्तवत् म्लेच्छ- प्रयुक्तस्यापि शब्दस्यार्थप्रत्ययाङ्गत्वप्रदर्शनाथंः सर्वशब्दः । ननु गव्यादिशब्दस्यावाचकस्याप्यर्थप्रत्ययायत्वदर्शनान्न तन्मात्रेण म्लेच्छप्रसिद्धे- रर्थान्तरे यवादिशब्दां वाचकत्वशक्तिः कल्पयितुं शक्येत्याशङ्क्याह - तत्रेति । शक्तेः कारणाश्रितत्वादर्थप्रत्ययकारणस्य च गव्यादिशब्दस्यादिमत्त्वेनानादिशक्त्याश्रयत्वायोगाद- वाचकत्वं युक्तम्, यवादिशब्दस्य तु यादृशस्यार्यैः प्रयोगः तादृशस्यैव'म्लेच्छैरित्यविशिष्टत्वेना- नादित्वावधारणेनानादिशक्त्याश्रयत्वोपपत्तेर्नाविद्यमानशक्त्यारोपकल्पनाक्लेशो युक्त इत्य- विशिष्टशब्देन सूचितम्, नन्वनादित्वेऽपि यवादिपदार्थसम्बन्धानवस्थितत्वादिवोषापत्तेरेकस्थाने- ऽनेककृतिकल्पनायोगान्न म्लेच्छप्रसिद्धेऽर्थेऽनादिसामथ्यं कल्पनमित्याशङ्कयाह - यथैव हीति । अगृह्यमाणविशेषत्वादक्षादिशब्दवद्गत्यात्राप्यनेकक्तिकल्पनं युक्तमित्याशयः । अविशिष्ट- त्वमेवोपपादयति-नेति । ततश्च प्रयोगाव्यदर्शनादायंम्लेच्छप्रसिद्धार्थविषययोः शब्दशक्तचो- रनादित्वात्कथं विशेषोऽवगम्यतामित्यर्थः । न च म्लेच्छसम्बन्धमात्रं शक्त्यभावे कारणमिति दृष्टान्तेनोपपादयति - यथैवेति । म्लेच्छैः स्वार्थे प्रयोगात्तस्मिन्नप्यर्थे शब्दो वाचकः परीक्षकाणामिष्ट इति योज्यम् । मुख्यत्वेनैव प्रयोगाद्गौणत्वशङ्कानिवृत्त्यर्थः स्वशब्दः । पूर्वपक्षमुपसंहरति - तस्मादिति । वाक्यशेषनैरपेक्ष्यप्रदर्शनार्थमुदाहरणान्तरम् । ननु यवाद्युदाहरणार्थव्यावृत्त्यर्थमित्युपपादितमेव । उत्तरसूत्रेण सिद्धान्तमाह-इतीति । शास्त्रस्थाः पुरुषायावेति भाष्यानुसारिव्याख्याभिप्रायः पूर्ववच्छब्दः । वाक्यशेषस्त्वतिशयार्थं भाष्यकृतोक्तो न निर्णायकत्वेनेत्यविरोधः शब्दापभ्रंशवच्चार्थापभ्रंशस्याप्युपपत्तेनं प्रतीति- प्रयोगमात्रेणैकान्ततः सर्वेषामर्थानामेकस्माच्छब्दात्प्रतीयमानां वाच्यत्वनिर्णयः सम्भवतीति, कल्पनालाघवादेकस्यैव वाच्यत्वे निर्णीते कस्यैकस्येत्यपेक्षायां शास्त्रस्थानामभिधेयाभियोगा- विशेषात्तत्प्रयोगवशेन वाच्यत्वावधारणमिति व्याख्यान्तरमाह-किं चेति । यथा गव्यादिषूत्तमवृद्धेन प्रमादेनाशक्त्या वोच्चारितेषु साध्वनुरूपत्वात्तदनुमानेन साधुवाच्यमर्थं मध्यमवृद्धस्य प्रतिपादयत्सुव्युत्पित्सोर्वाचकत्वभ्रान्तिर्जायते तथा म्लेच्छैर्गौण्य ोवृत्त्या भ्रान्त्या वा हस्त्याद्यर्थे पील्वादिशब्देन प्रतिपादिते व्युत्पित्सोर्वाच्यत्वाभ्रान्तिर्जायत इत्यर्थः । एतदेव विवृणोति - शब्देति । उपसंहरति - अत इति । अस्यां च व्याख्यायामार्य- प्रयोगयोरपि परस्परविरोघेऽभियुक्ततरबलीयस्त्वं शिद्ध्यतीत्यादि-एतेनेति । इदानीं भाष्यमनपेक्ष्य स्मृत्याचारयोर्विरोधे किं द्वयोस्तुल्यत्वमाचारो वा बलीयान् स्मृतिर्नेति त्रेधा सन्दिह्य, साम्यपक्षे समा विप्रतिपत्तिः स्यादित्येतावत्सूत्रं योजयति - स्मृतीति । पक्षद्वयोद्देशार्थी वैषम्यशब्दः । तेष्वदर्शनादित्यूपक्रममाचारबलीयस्त्वे योजयति - यद्वेति । अयमाशयः । शिष्टपरिग्रह- दाढ्यॅनोमयोर्भ्रान्त्यादिमूलत्वासम्भ्रगन्मिथ्यात्वलक्षणस्तावद्बाधो न युज्यते, किं तु यथा प्रत्यक्षश्रुतिविरोधे यावदेकं श्रुतौ कर्मेत्यादिना स्मृतेरनुष्ठानाह्यफलापहारमात्रलक्षणा,
४१० मीमांसादर्शनम् बाधो मूलश्रुतिदर्शनं यावदुक्तः तथात्रापि वाच्यः। न चानुष्ठानात्मकस्याचारस्यासौ सम्भवतीति । नन्वाचारस्यापि स्मृतिवच्छ्रुत्यनुमानेनैव प्रामाण्यं न स्वातन्त्र्येण । न च स्मृत्याचारानुमितयोः श्रुत्योर्बलाबलविशेषोऽस्तीत्याशङ्कयाह — श्रुतिरिति । स्मृतेर्वाक्यात्मकत्वेनानेकरूपार्थप्रतिभाने प्रत्यक्षश्रुत्यविरुद्धार्थप्रतिपादनपरश्रुतिकल्पनेन यथाश्रुतार्थत्यागलक्षणो बाधो युक्तः, आचारस्य त्ववाक्यात्मकत्वेनान्यथात्वकल्पनायोगाद्य- थाशिष्टैरनुमीयते, तथैवानुष्ठेयमित्यनुष्ठानाख्यफलनिष्ठैव श्रुतिः कल्प्यत इत्याशयः । एतदेव विवृणोति — यावद्धीति । अस्मिन्पक्षे तेष्वाचारेषु स्मृतिमूलश्रुत्यनुमानात्प्राग्विरोधा- दर्शनात्प्रतिष्ठितेषु बाधासम्भवाद् बलीयस्त्वमेव तावद्युक्तम्, तदनङ्गीकरणे वरं साम्यमस्तु, न त्वाचारस्य दौर्बल्यमिति सूत्रं योज्यम् । द्विविधमपि पूर्वपक्षमुपसंहरति — तेनेति । शास्त्रस्था वेति सूत्रेण सिद्धान्तमाह — स्मृतीनां वेति । स्मृत्यभिप्रायः शास्त्रशब्द इत्याशयः । तन्निमित्तत्वादिति शास्त्रत्वसामान्येन प्रकृतत्वाद् वेदाख्यं शास्त्रं तच्छब्देन परामृश्य श्रुतिमूलत्वं हेतुरुच्यते । तच्चोभयोः स्मृत्यधिकरणे प्राप्तम्, विरोधे पुनरुच्यमान- माचाराणां श्रुतिमूलत्वपरिसंख्यार्थम् । तत्रोभयोः श्रुत्यनुमापकत्वाविशेषे विरोधेऽपि स्मृतेरेव श्रुतिमूलत्वम्, नाचारस्येति कथमवसीयत इत्यपेक्षायामाह — उभयोरिति । असाभ्यमुप- पादयति — सप्रत्ययेति । प्रत्ययशब्देन ज्ञानं विश्वासो वाऽभिधीयते । ऋषित्वान्च्च मन्वादेः साक्षात्कृतधर्माण ऋषय इति स्मृतेः, सकलधर्मतत्त्वज्ञानसम्पन्नतवावसायादाचार्यवचः प्रमाणमिति च श्रुतेर्धर्मप्रवक्तृत्वेनावधारिताचार्यत्वस्य मन्वादेः सत्यवादित्वावगमादप्रतार- कत्वेन विश्वास्यत्वात्तत्प्रणीतायाः स्मृतेर्वेदविरोधेऽपि श्रुतिमूलत्ववारणशक्यत्वस्योपपादि- तत्वादाचारविरोधे का कथेत्याशयः । अर्वाचीनानां तु सकलधर्मतत्त्वज्ञानाभावात्प्रमादादि- सम्भवाच्च तदाचारस्य श्रुतिमूलत्वकल्पने श्रुतिस्मृतिविरोधो विघ्नकारीत्यर्थादुक्तम्, लिङ्गवाक्यवच्च सन्निकर्षविप्रकर्षविशेषादपि स्मृत्याचारयोर्बलाबलविशेषोऽवसीयत इत्याह- आचारास्त्विति । चशब्दार्थे तुशब्दस्मृतेर्वा साक्षाच्छ्रुतिकल्पनत्वद्योतनार्थः । ननु स्मृतिवदाचारस्यापि साक्षाच्छ्रुतिमूलत्वोपपत्तेः किमन्तरा स्मृतिकल्पनयेत्या- शङ्कयाह — न हीति । अयमाशयः तदानीन्तनानां मन्वादिवत्सकलवेदार्थतत्त्वज्ञानमस्ति यतः तदाचारस्य साक्षाच्छ्रुतिमूलत्वं सम्भाव्यते, एवं सत्यपि यद्येकैव काचिच्छ्रुतिः सर्वाचाराणां मूलभूता स्यात्, ततस्तस्याः कथञ्चित्तात्पर्यावधारणसम्भवात्साक्षादिदानीन्त- नपुरुषाचारमूलत्वं सम्भाव्येत, न त्वसौ — सम्भवतीत्युक्तम् । यद्यपि सदाचारः प्रमाणमिति स्मृत्यनुरूपैका श्रुतिः कल्प्येत, तथापि तस्याः शिष्टाचरानुवादेन प्रामाण्यप्रतिपादनमात्र- परत्वेनाचारप्रवर्त्तकत्वाभावाम्मूलत्वं न सम्भवतीति दर्शयितुम् — प्रवर्त्तिकेत्युक्तम् । यत्तु यद्वा शिष्टात्मतुष्टीनामित्यादिनाशिष्टानुष्ठानमात्रेणाचारादीनां श्रेयःसाधनत्वान्न विधायक- श्रुत्यपेक्षेत्युक्तम्, त-च्छ्रुतिस्मृतिविहितो धर्मं । तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणमिति वशिष्ठ- वचनपर्यालोचनया, मानवीयस्यापि वेदोऽखिलो धर्ममूलमिति स्मृत्याचारादिष्वनुशक्तस्य धर्ममूलशब्दस्य ।
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४११ वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ म० २/१२ इति लक्षणशब्दस्य च प्रमाणपरत्वावसायात्प्रौढिमात्रमित्यवगम्यते । भिन्नानामप्याचार- मूलभूतानां श्रुतीनां मिलितानामेकत्र पाठे तात्पर्यावधारणं सम्भाव्यते, तासां तु नानाप्रक- रणस्थानां विध्यन्तरशेषत्वेन पठितानां पुरुषधर्माचारविधिपरत्वस्याल्पप्रज्ञैरिदानीन्तनेर्निर्णें- तुमशक्यत्वाच्छिष्टाचारपारम्पर्यस्मृत्यैव कस्यचिद् बहुवेदविदः प्रज्ञातिशयसम्पन्नस्याचारमूल- श्रुतितात्पर्यावधारणमासीदिति कल्पयित्वेदानीन्तनशिष्टप्रवृत्तिर्भवति स्मृत्या व्यवायः श्रुतिक- ल्पनेत्येति विप्रकीर्णत्वमुपपादयति—नेति । विध्यन्तरशेषत्वेन स्तुतिमात्रत्वेनावभास- मानस्यापि सिद्धवत्सङ्कीर्तनान्यथानुपपत्तिप्रापकविध्याक्षेपकत्वकल्पनाक्लेशः कथंचिच्छब्दे- नोक्तः । आचारमूलश्रुतीनां तात्पर्यावधारणक्लेशप्रदर्शनार्थैवोदाहरणानि दर्शयन्पात्र धारणपूर्वकभोजनाचारमूलभूतां तावच्छ्रुतिमुदाहरति—तद्यथेति । क्रत्वर्थत्वशङ्कासूचनार्थः प्रकरणोपन्यासः । स्तुतिमात्रशङ्कासूचनार्थं विध्यन्तरशेषत्वोपन्यासः । एकेन परिगृह्येत्त- रेणात्तीति श्रुत्यर्थः । कथं तर्ह्याचारपरविधिपरत्वनिर्णय इत्याशङ्क्य—सत्यपीत्याद्युक्तम् । नन्वन्नस्कन्दनशङ्कापरिहारार्थत्वेन पात्रधारणास्यार्थप्राप्तस्य नुवादोपपत्तेर्नात्र विधिः कल्पनीयः अत आह—न चैतदिति । सम्यक्पात्रप्रतिष्ठापनेनाप्यन्नस्कन्दनशङ्कापरिहारोप- पत्तेर्नियमार्थो विधिः सम्भवतीत्याशयः । स्वभावात्प्रयोजनवशाद्धाऽऽर्थिकी नियता प्राप्तिः स्यात् त्वेतदुभयमप्यत्रास्तीति दर्शयितुं वैषम्यदृष्टान्तद्वयम् । दक्षिणहस्तभोजनाचारमूलभूतां श्रुतिमुदाहरति—एवमिति । स्त्रीणां पूर्वं सव्याक्ष्यं जनाचारमूलमुदाहरति -- तथेति । शेषभूतविध्यन्तरोपन्यासस्य प्रयोजनमुक्तम् । स्त्रीणां पत्यन्तरवर्जनाचारस्य मूलमुदाहरति तथेति । रजस्वलाचारमुदाहरति—तथेति । विश्वरूपो वै त्वाष्ट्रः पुरोहितो देवानामासीदिति तै० सं० २।५।१ । प्रकृत्य तस्य वज्रमादाय शीर्षाण्यच्छिनदितीन्द्रस्य त्वाष्ट्रवधनिमित्तब्रह्म- हत्याप्राप्तिमुक्त्वा, स पृथिवीमुपासीददस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीयं प्रत्यगृह्णानेत्यादिपृथिव्यादीनां ब्रह्महत्याविभागमुपक्रम्य स स्त्रीसंसदमुपासीददस्यै ब्राह्महत्यायै तृतीयं प्रतिगृह्णातीन्द्र- प्रार्थितानां स्त्रीणां तृतीयं ब्रह्महत्यायै प्रत्यगृह्णन्निति ब्रह्महत्यायास्तृतीयस्य विभागस्य प्रति- ग्रहम्, तन्निमित्तं च मलवद्वासस्त्वमुक्त्वा न मलवद्वाससा सह संवदेन्नास्या अन्नमद्यादिति, तदुपगमनं निषिध्य, यां मलवद्वाससमभिसम्भवति यतस्ततो जायते सोऽभिशस्तो यामरण्ये तस्यै तस्यै स्तेनो यां पराचीम्, तस्यै हीतस्य मुख्यप्रगल्भा इत्युपगमननिषेध-
- शेषभूतां निन्दामुक्त्वा तत्प्रस्तावेनागतानां रजस्वलाव्रतानां या स्नाति, तस्या अप्सुमारुका याभ्यङ्क्ते, तस्यै दुश्चर्मायाप्रलिखते, तस्यै खलति रपमारी याऽङ्क्ते तस्यै काणो पादतो धावते वस्यै श्यावदन्ता, या नखानि निकृन्तते, तस्यै कुनखी या कृणत्ति, तस्यै क्लीबो या, रज्जुं सृजति, तस्या उद्बन्धको, या खर्वेण पिबति, तस्यै खर्वस्तिस्रो रात्रीर्व्रतं चरेदिति- स्नानादिनिन्दाद्वारेणोक्तानामग्निषोमीयपुरोडाशयागविधिशेषत्वेन प्रतीयमानानां प्रकरणा-
४१० मीमांसादर्शनम् बाधो मूलश्रुतिदर्शनं यावदुक्तः तथात्रापि वाच्यः । न चानुष्ठानात्मकस्याचारस्यासौ सम्भवतीति । नन्वाचारस्यापि स्मृतिवच्छ्रुत्यनुमानेनैव प्रामाण्यं न स्वातन्त्र्येण । न च स्मृत्याचारानुमितयोः श्रुत्योर्बंलाबलविशेषोऽस्तीत्याशङ्कयाह — श्रुतिरिति । स्मृतेर्वाक्यात्मकत्वेनानेकरूपार्थप्रतिमाने प्रत्यक्षश्रुत्यविरुद्धार्थप्रतिपादनपरश्रुतिकल्पनेन यथाश्रुतार्थत्यागलक्षणो बाधो युक्तः, आचारस्य त्ववाक्यात्मकत्वेनान्यथात्वकल्पनायोगाद्य- थाशिष्टैरनुमीयते, तथैवानुष्ठेयमित्यनुष्ठानाख्यफलनिष्ठैव श्रुतिः कल्प्यत इत्याशयः । एतदेव विवृणोति — यावद्धीति । अस्मिन्पक्षे तेष्वाचारेषु स्मृतिमूलश्रुत्यनुमानात्प्राग्विरोधा- दर्शनात्प्रतिष्ठितेषु बाधासम्भवाद् बलीयस्त्वमेव तावद्युक्तम्, तदनङ्गीकरणे वरं साम्यमस्तु, न त्वाचारस्य दौर्बल्यमिति सूत्रं योज्यम् । द्विविधमपि पूर्वपक्षमुपसंहरति — तेनेति । शास्त्रस्था वेति सूत्रेण सिद्धान्तमाह — स्मृतीनां वेति । स्मृत्यभिप्रायः शास्त्रशब्द इत्याशयः । तन्निमित्तत्वादिति शास्त्रत्वसामान्येन प्रकृतत्वाद्देवाख्यं शास्त्रं तच्छब्देन परामृश्य श्रुतिमूलत्वं हेतुरुच्यते । तच्चोभयोः स्मृत्यधिकरणे प्राप्तम्, विरोधे पुनरुच्यमान- माचाराणां श्रुतिमूलत्वपरिसंख्यार्थम् । तत्रोभयोः श्रुत्यनुमापकत्वाविशेषे विरोधेऽपि स्मृतेरेव श्रुतिमूलत्वम्, नाचारस्येति कथमवसीयेत इत्यपेक्षायामाह — उभयोरिति । असाम्यमुप- पादयति — सप्रत्ययेति । प्रत्ययशब्देन ज्ञानं विश्वासो वाऽभिधीयते । ऋषित्वाच्च मन्वादेः साक्षात्कृतधर्माण ऋषय इति स्मृतेः, सकलधर्मतत्त्वज्ञानसम्पन्नत्वावसायादाचार्यवचः प्रमाणमिति च श्रुतेर्धर्मप्रवक्तृत्वेनावधारिताचार्यत्वस्य मन्वादेः सत्यवादित्वावगमादप्रतार- कत्वेन विश्वास्यत्वात्तत्प्रणीतायाः स्मृतेर्वेदविरोधेऽपि श्रुतिमूलत्ववारणशक्यत्वस्योपपादि- तत्वादाचारविरोधे का कथेत्याशयः । अर्वाचीनानां तु सकलधर्मतत्त्वज्ञानाभावात्प्रमादादि- सम्भवाच्च तदाचारस्य श्रुतिमूलत्वकल्पने श्रुतिस्मृतिविरोधो विघ्नकारीत्यर्थादुक्तम्, लिङ्गवाक्यवच्च सन्निकर्षविप्रकर्षविशेषादपि स्मृत्याचारयोर्बंलाबलविशेषोऽवसीयत इत्याह- आचारात्स्विति । चशब्दार्थे तुशब्दस्मृतेर्वा साक्षाच्छ्रुतिकल्पनत्वद्योतनार्थः । ननु स्मृतिवदाचारस्यापि साक्षाच्छ्रुतिमूलत्वोपपत्तेः किमन्तरा स्मृतिकल्पनयेत्या- शङ्कयाह — न हीति । अयमाशयः तदानीन्तनानां मन्वादिवत्सकलवेदार्थतत्त्वज्ञानमस्ति यतः तदाचारस्य साक्षाच्छ्रुतिमूलत्वं सम्भाव्यते, एवं सत्यपि यद्येकैव काचिच्छ्रुतिः सर्वाचाराणां मूलभूता स्यात्, ततस्तस्याः कथञ्चित्तात्पर्यविधारणसम्भवात्साक्षादिदानीन्त- नपुंरुषाचारमूलत्वं सम्भाव्येत, न त्वसौ — सम्भवतीत्युक्तम् । यद्यपि सदाचारः प्रमाणमिति स्मृत्यनुरूपैका श्रुतिः कल्प्येत, तथापि तस्याः शिष्टाचारानुवादेन प्रामाण्यप्रतिपादनमात्र- परत्वेनाचारप्रवर्त्तकत्वाभावान्मूलत्वं न सम्भवतीति दर्शयितुम् — प्रवर्त्तिकेत्युक्तम् । यत्तु यद्वा शिष्टात्मतुष्टीनामित्यादिनाशिष्टानुष्ठानमात्रेणाचारादीनां श्रेयःसाधनत्वान्न विधायक- श्रुत्यपेक्षेत्युक्तम्, तच्छ्रुतिस्मृतिविहितो धर्मं। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणमिति वशिष्ठ- वचनपर्यालोचनया, मानवीयस्यापि वेदोऽखिलो धर्ममूलमिति स्मृत्याचारादिष्वनुशक्तस्य धर्ममूलशब्दस्य ।
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४११ वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ म० २/१२ इति लक्षणशब्दस्य च प्रमाणपरत्वावसायात्प्रौढिमात्रमित्यवगम्यते । भिन्नानामप्याचार- मूलभूतानां श्रुतीनां मिलितानामेकत्र पाठे तात्पर्यावधारणं सम्भाव्यते, तासां तु नानाप्रक- रणस्थानां विध्यन्तरशेषत्वेन पठितानां पुरुषधर्मचारविधिपरत्वस्याल्पप्रज्ञैरिदानीन्तनेर्निर्ण- तुमशक्यत्वाच्छिष्टाचारपारम्पर्यस्मृत्यैव कस्यचिद् बहुवेदविदः प्रज्ञातिशयसम्पन्नस्याचारमूल- श्रुतितात्पर्यावधारणमासीदिति कल्पयित्वेदानीन्तनेशिष्टप्रवृत्तिर्भवति स्मृत्या व्यवायः श्रुतिक- ल्पनस्येति विप्रकीर्णत्वमुपपादयति—नेति । विध्यन्तरशेषत्वेन स्तुतिमात्रत्वेनावभास- मानस्यापि सिद्धवत्सङ्कीर्तनान्यथानुपपत्तिप्रापकविध्याक्षेपकत्वकल्पनाक्लेशः कथंचिच्छब्दे- नोक्तः । आचारमूलश्रुतीनां तात्पर्यावधारणक्लेशप्रदर्शनार्थैवोदाहरणानि दर्शयन्पात्र धारणपूर्वकभोजनाचारमूलभूतां तावच्छ्रुतिमुदाहरति—तद्यथेति । क्रत्वर्थत्वशङ्कासूचनार्थः प्रकरणोपन्यासः । स्तुतिमात्रशङ्कासूचनार्थं विध्यन्तरशेषत्वोपन्यासः । एकेन परिगृह्येत- रेणानत्तीति श्रुत्यर्थः । कथं तर्ह्याचारपरविधिपरत्वनिर्णय इत्याशङ्क्य—सत्यपीत्याद्युक्तम् । नन्वन्नस्कन्दनशङ्कापरिहारार्थत्वेन पात्रधारणास्यार्थप्राप्तस्यानुवादोपपत्तेर्नात्र विधिः कल्पनीयः अत आह—न चैतदिति । सम्यक्पात्रप्रतिष्ठापनेनाप्यन्नस्कन्दनशङ्कापरिहारोप- पत्तेर्नियमार्थो विधिः सम्भवतोत्याशयः । स्वभावात्प्रयोजनवशाद्वाऽऽर्थिकी नियता प्राप्तिः स्यात् त्वेतदुभयमप्यत्रास्तीति दर्शयितुं वैषम्यदृष्टान्तद्वयम् । दक्षिणहस्तभोजनाचारमूलभूतां श्रुतिमुदाहरति—एवमिति । स्त्रीणां पूर्वं सव्याक्ष्यं जनाचारमूलमुदाहरति—तथेति । शेषभूतविध्यन्तरोपन्यासस्य प्रयोजनमुक्तम् । स्त्रीणां पत्यन्तरवर्जनाचारस्य मूलमुदाहरति तथेति । रजस्वलाचारमुदाहरति—तथेति । विश्वरूपो वै त्वाष्ट्रः पुरोहितो देवानामासीदिति तै० सं० २।५।१ । प्रकृत्य तस्य वज्रमादाय शीर्षाण्यच्छिनदितीन्द्रस्य त्वाष्ट्रवधनिमित्तब्रह्म- हत्याप्राप्तिमुक्त्वा, स पृथिवीमुपासीददस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीयं प्रत्यगृह्णानेत्यादिपृथिव्यादीनां ब्रह्महत्याविभागमुपक्रम्य स स्त्रीसंसदमूपासीददस्यै ब्राह्महत्यायै तृतीयं प्रतिगृह्णातीन्द्र- प्रार्थितानां स्त्रीणां तृतीयं ब्रह्महत्यायै प्रत्यगृह्णन्निति ब्रह्महत्यायास्तृतीयस्य विभागस्य प्रति- ग्रहम्, तन्निमित्तं च मलवद्वासस्त्वमुक्त्वा न मलवद्वाससा सह संवदेन्नास्या अन्नमद्यादिति, तदुपगमनं निषिध्य, यां मलवद्वाससमभिसम्भवति यतस्ततो जायते सोऽभिशस्तो यामरण्ये तस्यै तस्यै स्तेनो यां पराचीम्, तस्यै ह्रीतस्य मुख्यप्रगल्भा इत्युपगमननिषेध- शेषभूतां निन्दामुक्त्वा तत्प्रस्तावेनागतानां रजस्वलाव्रतानां या स्नाति, तस्या अप्सुमारुका याभ्यङ्क्ते, तस्यै दुश्चर्मायाप्रलिखते, तस्यै खलति रपमारी याऽङ्क्ते तस्यै काणो पादतो धावते तस्यै श्यावदन्ता, या नखानि निकृन्तते, तस्यै कुनखी या कृणति, तस्यै क्लीबो या, रज्जुं सृजति, तस्या उद्बन्धको, या खर्वेण पिबति, तस्यै खर्वंस्तिस्रो रात्रीर्व्रतं चरेदिति- स्नानादिनिन्दाद्वारेणोक्तानामग्निषोमीयपुरोडाशयागविधिशेषत्वेन प्रतीयमानानां प्रकरणा-
४१२ मीमांसादर्शनम् [ सू० विक्रमेण स्त्रीधर्मत्वावधारणमाचारपरम्परास्मृत्या विना न शक्यमित्याशयः । अतो नानाप्रकरणस्थत्वेन पुरुषधर्मविधिपरत्वकल्पनविक्षेपलक्षणाद्विप्रकीर्णत्वाच्छिष्टाचारपारम्पर्यं- स्मृत्या विनैकार्थे तात्पर्योपसंहारो न सम्भवतीत्युपसंहरति — एवं चेति । ततश्चाचार- प्रामाण्यस्य सिद्धान्तस्मृत्यन्तरितत्वमित्याह—तेनेति । सिद्धान्तमुपसंहरति त्रिवृदादिशब्दानां वाक्यशेषवशेनार्थनिर्णयः — तस्मादिति । लोकवेदगतयोर्वाशब्दार्थप्रसिद्धयोर्विरोधे साम्यवैषम्यविचारार्थं तेष्वदर्शनादित्यादिसूत्र- द्वयमिति वर्णकान्तरमाह—त्रिवृदिति । एकस्यापि वाच्यत्वे सादृश्येनेतरत्र प्रतीतेः प्रयोगो- पपत्तिशङ्कानिराकरणार्थम् — विलक्षण इत्युक्तम् । एकेति । लौकिक्येव वैदिक्येव वेति पक्षद्वयमुक्तम् । त्रिवृच्छब्दे विप्रतिपत्तिं दर्शयति — लोके तावदिति । स्तोत्रीयागतनवको विवक्षितः । कथं वेदे स्तोत्रीयानवकार्थत्वप्रसिद्धिरित्यपेक्षायामाह — त्रिवृदिति । ‘उपास्मै गायता नरो दिवि द्युतत्याः रुचा, पवमानस्य ते के च सा० सं० उ० १-१-२ इति तृचत्रयानु- क्रमणन्नवभिः स्तुवन्तीति स्तुत्यन्तरदर्शनात्स्तोत्रियां नवकविषयत्वं त्रिवृच्छब्दस्यावसीयतइ- त्यर्थः । चरुशब्दे विप्रतिपत्तिं दर्शयति—तथेति । याज्ञिकप्रसिद्धिं दर्शयति—अनवम्ला- वेतेति । मक्तव्यावृत्त्यर्थमनवम्लावितविशेषणम् । वैशद्यानपेक्षपाकमात्रनिमित्तत्वदर्शनाधर्मन्त- रूष्मपक्वग्रहणं वेदे प्रसिद्धिं दर्शयति—तथेति । आदित्यं चरुं विधायज्येस्त्यैनं चरुमभिपूर्य चतुराज्यभागान्यजति, पथ्यां स्वस्तिमिट्टाऽग्नीषोमौ यजति, अग्निषोमाविष्ठा सवितारं यजत्यदितिमोदनेनेति क्रमपरे वाक्ये सिद्धवदनुवादादोदनवाचिता चरुशब्दस्य ज्ञायते । आश्वलावशब्दे विप्रतिपत्तिं दर्शयति—एवमिति । वेदप्रसिद्धिं दर्शयति—एवं हीति । ऐक्षवीशब्देऽप्यादिशब्दोपात्तां विप्रतिपत्तिं दर्शयति—ऐक्षव्याविति । विषयं दर्शयित्वा साम्यपक्षे तावत्सूत्रं योजयति—एवमादिष्विति । आदिशब्दः स्तोमशब्दाभिप्रायः । भाष्यकृद्व्याख्याने कः पुनरत्र निश्चय इति सिद्धान्तवेलायां प्रश्नदर्श- नाद्विप्रतिपत्तिशब्दस्य सन्देहार्थत्वप्रतीतेस्तद्व्यावृत्त्यर्थं विपर्ययार्थत्वे विप्रतिपत्तिशब्दं व्याख्यातुम्—प्रतिपत्तिविपर्ययइत्युक्तम् । हिशब्दः पादपूरणार्थः । तेष्विति सूत्रावयव- व्याख्यातुमाशङ्कते—ननु चेति । सूत्रावयवेनाशङ्कां निराकरोति—नैतदिति । अनेन च तेषु पदार्थेषु वाक्यार्थवदतीन्द्रियत्वाभावेन लोकविषयत्वविरोधस्यादर्शनादिति सूत्रावयवो व्याख्यातः । साम्यपक्षमुपसंहरति—तस्मादिति । लौकिकप्रसिद्धिबलीयस्त्वपूर्वपक्षमध्येनेनैव सूत्रेणाह—यदि चेति । लौकिकप्रसिद्धि- बलीयस्त्वहेतुतया (तेष्विति) सूत्रावयवेनोक्तमनुपसञ्जातविरोधित्वं साधयितुम्—पूर्व- भावित्वादित्युक्तम् । पूर्वभावित्वमुपपादयति—वेदेति । नन्वेवं सति वेदस्य पदार्थविधा- रणोपायत्वाभावेन क्वचिदपि वैदिकप्रसिद्धयभावाद्ध्विचार एवायं नोपपद्येतेत्याशङ्क्याह— तत्रेति । अत्रैव सूत्रं योजयति—तेष्विति । तेष्वदर्शनाद्विरोधस्येति सूत्रावयवस्य तेष्वेवादर्श- नाद्विरोधस्येत्यभिप्राय इत्यन्वयः । उभयत्राविरोधसाम्यापत्तिशङ्कानिवृत्त्यर्थमवधारणम् ।
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४१३ किमस्मिन्वर्णके तच्छब्देन परामृष्टमित्यपेक्षिते तेष्विति व्याख्यातम् । पूर्वभावित्वं चावि- रोधकारणं पूर्वोक्तमभिप्रेतम्, अर्थवादानां चेत्यादिना कारणान्तरमुक्तम् । अर्थवादानां न पदार्थप्रतीत्यङ्गत्वमवसीयत इत्यन्वयः । हेत्वपेक्षायां संज्ञासंज्ञिसम्बन्धस्य कारणे व्युत्पादने च व्यापाराभावादित्युक्तम् । तद्धेतुत्वेनान्यपरत्वेऽभिहिते, किं परतेत्यपेक्षायां परोचनाशेष- त्वमुक्तम् । कथं परोचनेत्यपेक्षिते गुणेत्युक्तम् । वायुक्षेपिष्ठादौ श्रुतिप्रवृत्तिसम्भवात्प्रायग्रह- णम् । 'आदित्यो यूपो, यजमानः प्रस्तरः, स्वर्गं आहवनीयः, इति वचनत्रयं दृष्टान्तः । एवं तर्हि पदार्थं प्रत्यौदासीन्येन वाक्यशेषेष्वपि विरोधादर्शनादवधारणानर्थक्यमित्याशङ्क्य पदार्थप्रतिपादनपरत्वाश्रयणे विरोधापादनेनावधारणमुपपादयति—तदाश्रयणे चेति । विरोधस्यैवेत्यवधारणेन वा शास्त्रस्य प्रसिद्धचानुगुण्यमेवानेन सूत्रावयवेनोच्यत इत्याह— तथेति । रक्षारम्भकेषु तन्तुषु नवसंख्यासद्भावेऽप्युपवीतारम्भकायारक्षास्त्रैगुण्यविधानार्थं त्रिवृच्छब्दः । अस्मिन्पूर्वपक्षे समशब्दानुपपत्तिमाशङ्क्य काक्वा सिद्धान्तसूत्रं योजयति— तस्मादिति । सिद्धान्तः वैदिकप्रसिद्धिवलीयस्त्वे सिद्धान्तसूत्रं योजयति—इतोति । न केवलं श्रेयःसाधनात्मकं धर्मस्वरूपमेव शास्त्रंप्रमाणकम्, किं त्वङ्गमपि, फलं च स्वर्गादीति वक्तुम्—साधनेत्युक्तम् । यत्त्वर्थवादानामन्यपरत्वात्पदार्थप्रतीत्यनङ्गत्वमुक्तम्, तत्रान्यपरत्वेऽपि विधिस्तुत्योरेकविषय- त्वनियमात्स्तुतिविषयस्यार्थस्यान्यथानुपपत्त्या विधिविषयत्वप्रतीतेस्तस्य चोपसंहारगतस्यापि विध्युद्देशेनाऽग्रहणं निरालम्बनत्वेनार्थ वादानर्थक्यापत्तेरानर्थक्यप्रतिहतानां विपरीतं बला- वलमिति' न्यायाद् बलीयस्त्वमित्याह—अर्थवादेति । अपिशब्देन बहिष्पवमाने च तृच- त्रयानुक्रमणस्य स्तोत्रीया विधानांथंत्वान्नाथंवादतेत्यपि सूचितम् । नन्वर्थवादावगतस्यार्थस्य विध्युद्देशेन ग्रहणे त्रिवृदादिशब्दानां स्तोत्रीयानवकादिवाचित्वेन वृद्धव्यवहारादनवगते विधौ गौणत्वं स्यादित्याशङ्कयाह—गौणो वेति । प्रमाणाभावेनाऽन्यत्र विधौ गौणत्वं नाश्री- यते, इह तु वेदप्रमाणकत्वाद् गौणत्वमप्युदुष्टमित्याशयः । परमार्थतस्तु त्रिवृदादिशब्दानां स्तोत्रीयानवकादिष्वपि गुणयोगासम्भवान्मुख्यत्वमेवाभिमतम् । नन्वेवमपि तृचत्रयानुक्रमणेन नवभिः स्तुवन्तीति वचनेन बहिष्पवमाने स्तोत्रीयानवकप्राप्तेस्त्रिवृद्ग्रहणमनर्थकमित्याशङ्क्य तृचत्रयानुक्रमेण नवकवचनयोरभावेऽपि 'त्रिवृदग्निष्टोम' इत्यादौ नवकसिद्धिरस्य विचारस्य प्रयोजनमिति दर्शयितुमाह—त्रिवृच्छब्द इति । दशमिकाधिकरणार्थनिरूपणम् एतदेवास्य विचारस्य प्रयोजनं दशमे त्रिवृदग्निष्टोम इत्युदाहृत्य किमग्निष्टोम- साधनमात्रगतसंख्याविकारिकेयं त्रिवृत्संख्या, स्तोमगतसंख्याविकाविकारिका वेति सन्दिह्य, त्रिवृद्रज्जुरित्यादौ लोके त्रिवृच्छब्दस्य त्रैगुण्यमात्रवाचित्वदर्शनाद् बहिष्पवमानवच्च तृचत्रयानुक्रमणादेः स्तोत्रीयानवकावगतिकारणस्यात्राभावात् त्रिवृ- त्त्वस्य च संख्यात्वसामान्येन संख्यामात्रकार्ये विनियोगप्रतीतेः सर्वसंख्याविकारिका त्रिवृत्संख्येति त्रिवृत्संख्यासर्वसंख्याविकारः स्यादिति सूत्रेण पूर्वपक्षयित्वा, त्रिवृद्बहिष्प-
४१४ मीमांसादर्शनम् [ सू०
वमानमित्युक्त्वा स्तोत्रीयानवकाम्नानात्त्रयस्त्रिकपालाः, त्रिवृता स्तोमेन सम्मिता इति च । नवानां कपालानां त्रिवृत्ता, स्तोमेन समानवचनात्त्रिवृच्छब्दस्य स्तोत्रीयानवकवाचित्वप्रतीतेर- त्रोभयसम्भवेऽपि वैदिकत्वसामान्येन स्तोत्रीयानवकविषयत्वावधारणात्स्तोमगतैव पञ्चदश- त्वादिसंख्या त्रिवृत्संख्यया बाध्यत इति, ‘स्तोमस्य वा तल्लिङ्गत्वादि’तिसूत्रेण सिद्धान्तं वदतोपपादयिष्यते । प्रसङ्गादादिशब्दोपात्तस्य स्तोमशब्दस्य लोकप्रसिद्धसमुदायमात्र- वचनत्वातिक्रमेण स्तोत्रीयासमुदायवचनत्वं वेदयाज्ञिक-व्याकरणप्रसिद्धिवलेनाहैवमिति । तथाप्यवश्यमेव त्रिवृदादिषु द्रष्टव्य इत्यध्याहृत्य योज्यम् । लौकिक्याः समुदायमात्रवचनत्व- प्रसिद्धेः का गतिरित्यपेक्षायां—लोकेत्युक्तम् । ननु त्रिवृच्छब्दस्य स्तोत्रीयानवकवचनत्वे ‘विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृते, त्रिवृता ग्रन्थिनैकेनेति’ मनुवचनमयुक्तं स्यादित्याशङ्क्य पौरुषेय- वाक्येषु लोकवेदप्रसिद्धयोस्तुल्यवलत्वेन यथासम्भवं प्रसिद्धयनुसारोपपत्तेः, इह त्रैगुण्य- वाचित्वमाश्रित्य परिहरति—यत्त्विति । उपवीतारम्भिकाया वा रक्षा नवतन्तुकारभ्यत्वात्तस्या एव च ग्रन्ध्यारम्भकत्वाद्वैदिक- प्रसिद्धयनुसारेणैव मनुवचनं युज्यत इत्याह--यद्वेति । ननु वेदेऽपि त्रिवृद्भवतीति रशना- त्रैगुण्यप्रयोगदर्शनाल्लौकिकी प्रसिद्धिराश्रितेत्याशङ्क्य, तत्रापि प्रौढ्या याज्ञिकप्रसिद्धयनादरेण वैदिकप्रसिद्धयनुसारान्नवगुणत्वं भविष्यतीत्याह—तथेति । अयं तु पक्षः स्तोत्रीयाव्यतिरे- केणान्यत्र नवकसंख्यायां त्रिवृच्छब्दप्रयोगाभावादयुक्त इति, वेदप्रसिद्धस्तोत्रीयागतनवक- संख्यारूपार्थासम्भवाद्रशनादौ वेदविरोधाभावाल्लोकप्रसिद्धं त्रैगुण्यमेव ग्राह्यमित्याह— यद्वेति । ननु स्तोत्रीयागतनवकवाचित्वेन शोणादिवन्नवकत्वावान्तरजात्यभावादाकृत्यधिकरण- विरुद्धं विशिष्टवाचित्वं प्रसज्येतेत्याशङ्क्य—यथैवेत्युक्तम् । यत्र विशेषणमात्रे शक्तौ कलि- तायां तद्विनाभावाद्विशेष्ये प्रतीतिर्युज्यते, तदेवाकृत्यधिकरणस्य विषयः । अविनाभावा- भावे तु स्रुवादिशब्दानां पुत्राभार्याभावे यांचादिविशिष्टवाचित्वमिष्यत एव । वृद्धव्यवहारा- वसये चार्थे अन्वयव्यतिरेकाभ्यां निकृष्टे शक्तिः कल्प्येत, इह तु त्रिवृद्वहिष्पवमानमित्यु- क्त्वा स्तोत्रीयानवकानुक्रमणान्नवसंख्यायास्त्रिवृच्छब्दवाच्यत्वं कल्प्यमानं स्तोत्रीयागताया एव कल्पयितुं शक्यम्, न शुद्धायाः, प्रमाणाभावादित्याशयः । स्तोत्रीयाविशिष्टस्य नव- कत्वस्य वाच्यत्वात्तदेकदेशस्य नवकत्वस्य गौणत्वमभिप्रेतम् । आश्रयबलाबलानादरेण स्वरूपबलाबलवशात्पदार्थनिर्णयमभिप्रेत्य—उत्तरसूत्र इत्यु- क्तम् । चरुशब्दस्य त्वोदनसम्बन्धेनैव स्थास्यां प्रयोगोपपत्तेर्लोकप्रसिद्धेऽर्थे शक्तिर्नैव कल्प्ये- त्याह— तथेति । सौयं चरुं निर्वपेदित्यादौ वाक्यशेषाभावेऽप्योदनो वा प्रयुक्तत्वादित्यत्र १०-१-३० । चरुशब्दस्य वेदयाज्ञिकप्रसिद्धिभ्यामोदनमात्रवाचित्वावसायादोदनस्यैव ग्रहणमिति दशमे वक्ष्यमाणं चरुशब्दोऽपीत्यपिशब्देन सूचितम् । अन्यत्राप्योदनविषय एवेत्यर्थः । अस्मिंश्च वर्णके दाशमिकयोस्त्रिवृच्चर्वधिकरणयोः एतदधिकरणप्रयोजनप्रति- पादनाथंत्वात्र पौनरुक्त्यम् । याज्ञिकशब्दस्य पूर्वनिपातेन वेदप्रसिद्धिनिरपेक्षस्य याज्ञिक- वृद्धव्यवहारस्य वाच्यवाचकभावावगमे साक्षात्कारणत्वेनाभ्यर्हितत्वं सूचितम् ।
८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४१५ आश्ववालैक्षवीशब्दयोस्तु समुदायप्रसिद्धेर्बलीयस्त्वेनापि दुर्बललौकिकावयवप्रसिद्धि- बाधेन काशतन्मूलवाचित्वमेवासीयत इत्याह—आश्ववालेति । ननु दीर्घश्लक्ष्णपत्राणां काशानामश्वकेशैः सादृश्यादश्ववालशब्दस्य काशेषु गौणप्रयोगोपपत्तेर्न समुदायस्य शक्त्यन्तर- कल्पनं युक्तमित्यलब्धात्मिकायाः समुदायप्रसिद्धेः कथं बलीयस्त्वमित्याशङ्कयाभ्युपगम्यापि गौणत्वम्, वेदक्लृप्तत्वाद् बलीयस्त्वमाह—अथापीति । यथा श्येनेन यजेतेति विहिते यागे सामानाधिकरण्याच्छ्येननामत्वेन प्रसिद्धेरनेकक्तिकल्पनाभयाद्वाच्यवाचकभावानभ्युपगमेऽपि यथा वै श्येनो निपत्यादत्त एवमयं द्विषन्तं भ्रातृव्यं निपत्यादत्त इत्यर्थवादावगतनिपत्यादान- कत्वसादृश्येन श्येनपक्षिजात्योपमिते गौणत्वद्वारेणावासप्रसिद्धिः । श्येनशब्दः पुनरिषुयागे धर्मातिदेशाय समानमितरच्छ्येनेनेति प्रयुज्यमानो गौणोऽपि वेदक्लृप्तत्वाद्यागाविषयत्वेनै- वाश्रीयते, तथाऽश्ववालशब्दोऽप्याश्ववालः प्रस्तर इत्यज्ञ वाक्यशेषात्काशविषयत्वेन प्रतीय- मानोऽनेकक्तिकल्पनाभयात्तद्वाचकत्वानभ्युपगमेऽपि दीर्घश्लक्ष्णत्वादिसाम्याद् गौणत्वद्वारेण काशेष्वेवासप्रसिद्धिर्र्वाक्यशेषाभावेऽपि वेदक्लृप्तत्वात् काशविषयत्वेनैवाश्रीयत इत्यर्थः । नन्वश्ववालशब्दस्य गौणत्वाम्युपगमे गौणतायाः पदान्तरसामानाधिकरण्यसापेक्षत्वेनासामर्थ्या- पत्तेराश्ववाल इति तद्धितानुत्पत्तिप्रसङ्गान्नाश्ववालशब्दस्य गौणत्वं युक्तमित्याशङ्क्य, अभ्युपगमवादमात्रत्वमस्य प्रकटयितुमाह—अथापीति । यद्यपि गौणत्वं न च ते वालाः काशतां प्राप्ता इति काशरूपेणाश्वस्य बालानां परिणामाभिधानात्प्रकृतिविकारयोश्च सादृश्यसम्भवाच्छब्दावगतप्रकृतिविकारभावमात्रेणोत्प्रेक्षितम्, न वास्तवमिति शब्दग्रहणेन सूचितम् । वेदस्य सम्बन्धिदृष्टमगतं चेन्न केनापि वार्यते, स्वतन्त्रत्वेनापौरुषेयत्वेन वेदे दोपाशङ्कानुपपत्तेरित्यर्थः । ननु धर्मातिदेशादिव्यवहारसिद्धयर्थं केनचिद् गुणयोगेन श्येनशब्दस्य यागविशेषनाम- त्वाङ्गीकरणमर्थवत्पुरोडाशानलं कुर्वित्यादौ च लाघवार्थं पुरोडाशशब्देन धानादिक्षवि पञ्चकलक्षणार्थं वेति इति तु मुख्येन काशशब्देनैव प्रस्तरविधिसिद्धेर्गौणलाक्षणिकाश्ववाल- शब्दानर्थक्यापत्तिः । मुख्यत्वे त्वाश्ववालः प्रस्तरः कार्यः, काशाश्चाश्ववालशब्देनोच्यन्ते इत्यनेकार्थपरत्वापत्तेर्वाक्यभेदः प्रसज्येतेत्याशङ्क्याह—गौणमिति । काशाश्ववालशब्दयोर्वाच्य- वाचकत्वाभावे निरालम्बनवाक्यशेषापत्तेरगत्या वाक्यभेदोऽपि वेदाङ्गीकृतत्वान्न दोषमावहति, परमार्थतस्तु विधिस्तुत्येकवाक्यत्वान्यथानुपपत्त्यैवात्र वाच्यवाचकत्वप्रतीतेर्न वाक्य- भेदोऽस्तीति वाशब्देन सूचितम् । ननु वाक्यशेषबलेन त्रिवृदादिशब्दार्थनिर्णये पूर्वोक्त- मेव पौनरुक्त्यं स्यादित्याशङ्क्याह—न चात्रेति । असन्दिग्धत्वमेव विवृणोति— लौकिकीति । एतद्वर्णकसिद्धान्तमुपसंहरति—बाधतइति । सुखग्रहणार्थं वर्णकत्रयसिद्धान्तं सङ्क्षपति—तस्मादिति । आद्ये वर्णके शास्त्रशब्देन शास्त्रानुसारित्वादार्या विवक्ष्यन्ते । द्वितीये स्मृतिः । तृतीये वेदः । मुक्तकानां नियमशून्यानां म्लेच्छानामाचारैरित्याद्य- वर्णकेऽर्थः । मुक्तकैरनिबद्धैरितीतरयोः, सदाचाराणां स्मृतिव्यवधानाद्धर्मंविप्रकर्षः—इतरेषां त्वसम्बन्धादेव ॥ ८ ॥
४१६ मीमांसादर्शनम् [ सू० मा० प्र०—'तेषु'=यव आदिशब्दों में । "विप्रतिपत्तिः"=अर्थबोधकता, अर्थात् वि=विशिष्ट, प्रतिपत्ति अर्थात् ज्ञान अर्थात् शब्दज्ञान या अर्थबोध । "समा"=समान रूप, अर्थात् तुल्यबलयोः=समबल, "विरोधस्य"="अदर्शनात्"=यतः क्योंकि विरोध अर्थात् बलाबल नहीं देखा जाता है । आर्य और म्लेच्छो के मत में यव आदि की विभिन्न अर्थबोधकता है, वह समान है अर्थात् तुल्यबलशाली है, क्योंकि, इन स्थलों में विरोध अर्थात् प्राबल्य या दौर्बल्य का कोई कारण नहीं है । स्मृति का प्राबल्य और दौर्बल्य के निरूपण प्रसङ्ग में शब्दप्रयोग के विषय में आर्य एवं म्लेच्छ का अर्थात् अपभाषा प्रयोग करने वाले प्राकृत लोगों के वैषम्य का प्राबल्य और दौर्बल्य का विचार किया जा रहा है । यव, वराह, वेतस, पीलु आदि शब्दों का आर्यों ने यथा क्रम में दीर्घ शूक, शूकर, वञ्जुल (वेद) एवं वृक्षविशेष रूप अर्थ में प्रयोग किया है । एवं म्लेच्छ इन शब्दों का प्रियङ्गु, कृष्णपक्षी, जम्बुवृक्ष एवं हस्ती के अर्थ में व्यवहार करते हैं । आर्य म्लेच्छों का इस अर्थ-व्यवहार के विषय में स्मृतिगत विरोध है, इनमें एक को प्रबल और अन्य को दुर्बल कहने का कोई कारण नहीं है, क्योकि, अर्थबोध कराना ही शब्द का प्रयोजन है और यह दोनों के प्रयोग से सिद्ध होता है, अतः, ये दोनों स्मृतियाँ तुल्यबल हैं, अतः इन शब्दों से दोनों अर्थों की अवगति होनी चाहिए । यही पूर्व पक्ष है ॥ ८ ॥ शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात् ॥९॥ सि० शा० भा०—वाशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । यवशब्दो यदि दीर्घशूकेषु, सादृ- श्यात् प्रियङ्गुषु भविष्यति । यदि प्रियङ्गुषु, सादृश्याद् यवेषु । किं सादृश्यम् । पूर्वसस्येषे क्षीणे भवन्ति दीर्घशूकाः प्रियङ्गवश्च, एतत् तयोः सादृश्यम् । कः पुनरत्र निश्चयः ? यः शास्त्रस्थानाम्, स शब्दार्थः । के शास्त्रस्थाः ? शिष्टाः । तेषा- मविच्छिन्ना स्मृतिः शब्देषु, वेदेषु च । तेन शिष्टा निमित्तं श्रुतिस्मृतिधारणे । ते ह्येवं समामनन्ति यवमयेषु करम्भपात्रेषु विहितेषु वाक्यशेषं 'यत्रान्या ओषधयो म्लायन्ते, अथैते मोदमाना इवोत्तिष्ठन्तीति दीर्घशूकान् यवान् दर्श- यति वेदः' वेदे दर्शनादविच्छिन्नापारम्पर्यो दीर्घशूकेषु यवशब्द इति गम्यते । तस्मात् प्रियङ्गुषु गौणः । तस्माद् दीर्घशूकानां पुरोडाशः कर्तव्यः । तस्माद्वराहां गावोऽनुधावन्तीति सूकरे वराहशब्दं दर्शयति, अप्सुजो वेतस इति वञ्जुले वेतसशब्दम् । सूकरं हि गावोऽनुधावन्ति । वञ्जुलोऽप्सु जायते । जम्बूवृक्षः स्थले, गिरि नदीषु वा ॥ ९ ॥ इति यववराहाधिकरणम् ॥ ५ ॥
९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४१७ भा० वि०—सिद्धान्तमाह—शास्त्रस्येति । एकस्य शब्दस्योभयार्थत्वं तावद- युक्तम्, अनेकशक्तिकल्पनागौरवात्, शब्दादर्थनवधारणप्रसङ्गात्, विकल्पप्रस- ङ्गाच्च । अतो न विप्रतिपत्त्योस्समबलतेति । वा शब्दं व्याचष्टे—वा शब्द इति । एकत्र मुख्यस्यान्यत्र गौणत्वोपपत्तेश्च नोभयार्थता युक्तेत्याह—यदिति । दीर्घ- शूकेषु मुख्य इति शेषः, यदि प्रियङ्गुषु मुख्यः सामान्यात् दीर्घशूकेषु भविष्य- तीत्यर्थः, किं तयोः सादृश्यमत आह—पूर्वसस्य इति । यद्यपि न प्रियङ्गवः शरत्पक्वा दीर्घशूकपाककालं फाल्गुनं यावदवतिष्ठमाना दृश्यन्ते । तथापि याभिरोषधीभिः - श्यामाकादिरूपाभिः सह वर्षासु मुमुदिरे । तासु प्रक्षीणास्वपि तेषामवस्थानदर्शनात् सादृश्याभिधानमित्यवसेयम् । एवं वा शब्दव्याख्यानेना- नेकार्थत्वानुपपत्त्या विप्रतिपत्त्योः समबलत्वं निरस्यावशिष्टं व्याख्यातुं प्रश्न- मुत्थापयति—कः पुनरितिः । कुत्र तर्हि मुख्यः ? कुत्र वा गौण इत्यर्थः, शास्त्रस्थ- पदं व्याकुर्वन्नुत्तरमाह—यच्छास्त्रस्थानमिति । प्रसिद्ध इति शेषः, शास्त्रस्थ- शब्देनाशास्त्रस्थार्थव्यावृत्तौ वैयर्थ्यं मन्वानः शङ्कते—के शास्त्रस्था इति । नायमार्यान् व्यावर्तयति, किन्तु म्लेच्छान् इति । परिहरति—शिष्टा इति । श्रौतस्मार्तकर्मस्वभियुक्ता इत्यर्थः । तदनेन प्रमाणमनुमानं स्यादित्यतोऽनुषक्त- प्रमाणपदान्वितं शास्त्रस्थपदं प्रमाणमित्येवं बलीयस्त्वफलवाचकमपि लक्षणया शास्त्रस्थप्रसिद्धिबलीयस्त्वपरं व्याख्यातम् । शिष्टप्रसिद्धेऽर्थे मुख्यत्वमुपपादयति— तेषामिति । शिष्टानां या स्मृतिः प्रतिपत्तिः शब्देषु-शब्दार्थसम्बन्धेषु सा लोके वेदे चाविच्छिन्ना अविप्लुता अबाधितेत्यर्थः, एतदुक्तं भवति शिष्टा एव हि धर्मा- धर्माविप्लुतिसिद्धये शब्दार्थतत्त्वं विविच्य पर्यालोचयन्तो दृश्यन्ते, म्लेच्छास्तु दृष्टार्थव्यवहारस्य यथा कथंचिदपि सिद्धेः नाविप्लुतिसिद्धये प्रयतन्ते, तेनार्याणा- मेव प्रसिद्धोऽर्थो मुख्यः तथा च तत्प्रसिद्धिरैव बलीयसीति । वेदेऽपि दीर्घशूकादौ यवादिशब्दप्रयोगात् प्रियङ्गवादौ चाप्रयोगादार्यप्रसिद्ध एव मुख्य इति वेदे चेत्यनेन सूचितम् । शिष्टप्रसिद्धेर्बलीयस्त्वफलमाह—तेनेति । निमित्तम्-प्रमाण- मित्यर्थः, श्रुतिस्मृत्यवधारणे-श्रुतिस्मृत्यनुकूलपदार्थावधारण इत्यर्थः । अत्र च तन्निमित्तत्वादिति सूत्रावयवोऽविप्लुतशास्त्रार्थानुष्ठाननिमित्तत्वात् तेषामित्येव योजनीयः । एवं यवमयादिवाक्येषु यवादिशब्दानामार्थप्रसिद्धिबलेन दीर्घशूकादि- विषयत्वनिर्णयमभिधाय वाक्यशेषेणापि तमाह—ते ह्येवमिति । ते शिष्टाः करम्भपात्रेषु-यवमयसक्तुपिण्डेषु पात्राकारविनिर्मितेषु वरुणप्रघासप्रकरणे प्रति- पूरुषं करम्भपात्राणि भवन्तीति विहितेष्वित्यर्थः, यत्र यस्मिन् फाल्गुने मासे, अथ तस्मिन् काल इत्यर्थः, एते-यवाः । वाक्यतात्पर्यमाह—दीर्घशूकानिति । ननु वाक्यशेषवशाद्यवशब्दस्य दीर्घशूकविषयत्वेऽपि कथं तत्रैव मुख्यत्वनिर्णय इत्यत आह—वेददर्शनादिति । अविच्छिन्नपारम्पर्यत्वं मुख्यत्वम् । दीर्घशूकेषु २७