भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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४१६ मीमांसादर्शनम् [ सू० मा० प्र०—'तेषु'=यव आदिशब्दों में । "विप्रतिपत्तिः"=अर्थबोधकता, अर्थात् वि=विशिष्ट, प्रतिपत्ति अर्थात् ज्ञान अर्थात् शब्दज्ञान या अर्थबोध । "समा"=समान रूप, अर्थात् तुल्यबलयोः=समबल, "विरोधस्य"="अदर्शनात्"=यतः क्योंकि विरोध अर्थात् बलाबल नहीं देखा जाता है । आर्य और म्लेच्छो के मत में यव आदि की विभिन्न अर्थबोधकता है, वह समान है अर्थात् तुल्यबलशाली है, क्योंकि, इन स्थलों में विरोध अर्थात् प्राबल्य या दौर्बल्य का कोई कारण नहीं है । स्मृति का प्राबल्य और दौर्बल्य के निरूपण प्रसङ्ग में शब्दप्रयोग के विषय में आर्य एवं म्लेच्छ का अर्थात् अपभाषा प्रयोग करने वाले प्राकृत लोगों के वैषम्य का प्राबल्य और दौर्बल्य का विचार किया जा रहा है । यव, वराह, वेतस, पीलु आदि शब्दों का आर्यों ने यथा क्रम में दीर्घ शूक, शूकर, वञ्जुल (वेद) एवं वृक्षविशेष रूप अर्थ में प्रयोग किया है । एवं म्लेच्छ इन शब्दों का प्रियङ्गु, कृष्णपक्षी, जम्बुवृक्ष एवं हस्ती के अर्थ में व्यवहार करते हैं । आर्य म्लेच्छों का इस अर्थ-व्यवहार के विषय में स्मृतिगत विरोध है, इनमें एक को प्रबल और अन्य को दुर्बल कहने का कोई कारण नहीं है, क्योकि, अर्थबोध कराना ही शब्द का प्रयोजन है और यह दोनों के प्रयोग से सिद्ध होता है, अतः, ये दोनों स्मृतियाँ तुल्यबल हैं, अतः इन शब्दों से दोनों अर्थों की अवगति होनी चाहिए । यही पूर्व पक्ष है ॥ ८ ॥ शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात् ॥९॥ सि० शा० भा०—वाशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । यवशब्दो यदि दीर्घशूकेषु, सादृ- श्यात् प्रियङ्गुषु भविष्यति । यदि प्रियङ्गुषु, सादृश्याद् यवेषु । किं सादृश्यम् । पूर्वसस्येषे क्षीणे भवन्ति दीर्घशूकाः प्रियङ्गवश्च, एतत् तयोः सादृश्यम् । कः पुनरत्र निश्चयः ? यः शास्त्रस्थानाम्, स शब्दार्थः । के शास्त्रस्थाः ? शिष्टाः । तेषा- मविच्छिन्ना स्मृतिः शब्देषु, वेदेषु च । तेन शिष्टा निमित्तं श्रुतिस्मृतिधारणे । ते ह्येवं समामनन्ति यवमयेषु करम्भपात्रेषु विहितेषु वाक्यशेषं 'यत्रान्या ओषधयो म्लायन्ते, अथैते मोदमाना इवोत्तिष्ठन्तीति दीर्घशूकान् यवान् दर्श- यति वेदः' वेदे दर्शनादविच्छिन्नापारम्पर्यो दीर्घशूकेषु यवशब्द इति गम्यते । तस्मात् प्रियङ्गुषु गौणः । तस्माद् दीर्घशूकानां पुरोडाशः कर्तव्यः । तस्माद्वराहां गावोऽनुधावन्तीति सूकरे वराहशब्दं दर्शयति, अप्सुजो वेतस इति वञ्जुले वेतसशब्दम् । सूकरं हि गावोऽनुधावन्ति । वञ्जुलोऽप्सु जायते । जम्बूवृक्षः स्थले, गिरि नदीषु वा ॥ ९ ॥ इति यववराहाधिकरणम् ॥ ५ ॥