मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७२ मीमांसादर्शनम् [ सू० संभवो नैवं नित्यावस्थितमाशकादिगोत्रचरणप्रवचननिमित्तसमाख्योपपत्तिः। माशकबोधायनापस्तम्बादिशब्दा ह्यादिमदेकद्रव्योपदेशिन इति, न तेभ्यः प्रकृति- भूतेभ्योऽनादिग्रन्थविषयसमाख्याव्युत्पादनसंभवः । अतश्च माशकादिसमाख्याऽप्यविद्यमानग्रन्थनियमनादेव प्रवृत्तेत्यपि हेत्वर्थ- योजना। वेदरूपनियमाविद्यमानत्वादिति वाऽत्र हेतुव्याख्या । कात्स्नं तु वेदाङ्ग- नीत्यनध्यायनियमाभावादिति वा योज्यम् । यत्तु भाष्यकारेण स्वराभावादित्यन्ताथं १ व्याख्यानं कृतम् । तन्मन्त्रेष्वप्यवेदत्वं कल्पाधीतेषु साधयेत् । तथा गृह्योपदिष्टेषु च्छान्दोग्यब्राह्मणेषु च ॥ ६०८ ब्राह्मणानि हि यान्यष्टौ सरहस्यान्यधीयते । छन्दोगास्तेषु सर्वेषु न कश्चिन्नियतस्वरः ॥ ६०९ तेन तेष्वप्यवेदत्वं स्वराभावात्प्रसज्यते । तस्मादुक्तस्वसंवेद्यरूपाभावोऽत्र कारणम् ॥ ६१० स्वरोऽपि त्वस्ति रूपांशे न त्वसावेव केवलः ॥ १२ ॥ न्या० सु०-एतत्सूत्रावतारणार्थमेत्यनुभाषणभाष्यं व्याचष्टे—यस्त्विति । आर्षेय- पञ्चार्षेयगोत्रव्यवस्थया शिखाकल्पव्यवस्थादर्शनाद् गोत्रविशेषवाच्युपपदानुमानेन कर्तृविशेष- विनियोगः स्यादित्येवं सूत्रव्याख्यानाथं गोत्रेति भाष्यं व्याचष्टे—तत्रेति । श्लोकं व्याचष्टे—यथैवेति । वसिष्ठादिगोत्रस्यान्यतो नाराशंसो । व्यतिरेकः तनूनपादित्युप- लक्षणतेत्यर्थः ॥ १२ ॥ भाव० प्र०- प्रस्तुत पूर्वपक्ष के उत्तर में कहा गया है कि कल्पसूत्र आदि अपौरुषेय नहीं है, क्योंकि, कात्यायन आदि महर्षियों ने इसकी रचना की है, इसीलिए कात्याय- नीय, शाट्यायनीय, आश्वलायनीय आदि संज्ञा सार्थक होती है। कात्यायन के द्वारा प्रणीत इस अर्थ में तद्धित 'छ' प्रत्यय के द्वारा ये पद सिद्ध होते हैं। 'आख्याप्रवचनात्' (जै० सू० १।१।३०) इस सूत्र में मीमांसकों ने जिस प्रकार काठक कालापक आदि संज्ञा को प्रवचन मूलक कहा है। उसी प्रकार यहाँ भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि, वेद के रचयिता पुरुष अस्मर्यमाण होने से काठक आदि स्थलों में प्रवचन ही संज्ञा का कारण है, किन्तु इस स्थल में कात्यायन, शाटघायन आदि महर्षियों के रचयिता होने से उसी रूप में शिष्य का स्मरण करते हैं, इसलिए वेद के समान प्रवचन समाख्या को = संज्ञा नहीं कहा जा सकता है, भाष्यकार ने कहा है वेद में स्वर पाठ लक्षित होता है, किन्तु कल्पसूत्र आदि में स्वर का नियम नहीं है, अतः वह अपौरुषेय नहीं है। वार्तिककार ने कहा है— १ क. दित्यानियमार्थम् ।