मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५७० मीमांसादर्शनम् [ सू० स्याशास्त्रत्वे प्रयोगमाह—शास्त्रं नेति । संस्कृतव्याकरणत्वमित्यध्याहारः । साक्षाच्छास्त्र- त्वाभावेऽपि वेदमूलतया प्रमाणत्वात्तद्विहितस्य साधुभाषणस्याग्न्यादिवद्दृष्टार्थत्वं भविष्य- तीत्याशङ्क्य तदभावे प्रयोगमाह—वेदेति । वेदाङ्गत्वभावे प्रयोगमाह—शास्त्राङ्गमपीति । हेतुसिद्ध्यर्थमतादर्थ्ये प्रयोगमाह—अतादर्थ्यमिति । कथादिरेव दृष्टान्तः । वेदानङ्गत्वेऽपि शब्दप्रयोगाङ्गत्वात्प्रयोगोत्पत्तिशास्त्रत्वं भविष्यतीत्याशङ्क्य, तदभावे प्रयोगमाह— न चेति । एतदेव व्याचष्टे—यथा हीति । अशास्त्रत्वादिसाधनस्य पूर्वपक्षोपयोगमाह— तस्मादिति । यदाचारेणैषां प्रयोज्यत्वमवगतम्, न तच्छास्त्रस्थैर्वारितमित्यर्थः ॥२४॥ भा० प्र०—एक शब्द का अनेक अर्थ मानना उचित नहीं है। इसका विवरण पूर्व सूत्र में दिया गया है। प्रस्तुत प्रसङ्ग में यह विचारणीय है कि अनेक शब्द एक अर्थ के वाचक हो सकते हैं या नहीं ? इस प्रसङ्ग में व्याकरणशास्त्र की उपेक्षा नहीं की जा सकती है, अतः यह विचारणीय है कि व्याकरण स्मृति है या नहीं ? और यह व्याकरण प्रमाण है या नहीं—इसी का विचार इस सूत्र के द्वारा जैमिनि ने किया है। एक ही अर्थ को कहने वाला गो, गावी, गोणी, गोपोतालिका आदि शब्द हैं, इन शब्दों में सभी शब्द गल कम्बल आदि विशिष्ट प्राणिविशेष अर्थ के बोधन में प्रमाण है या इनमें एक अर्थात् गो शब्द ही कथित अर्थ में प्रमाण है ? इस विषय का निर्णय करने के लिए प्रथम यह स्थिर करना होगा कि गो, गावी आदि शब्दों में क्या गो शब्द ही अनादि रूप में पूर्वोक्त अर्थ का वाचक है और अतिरिक्त उस शब्द का अपभ्रंश है या सभी शब्द अनादि हैं। इस प्रकार सन्देह होने पर पूर्वपक्षियों ने कहा है कि देश भेद एवं शिक्षित और अशिक्षित व्यक्तियों के भेद से गो, गावी आदि सभी शब्दों से सास्नादि- विशिष्ट प्राणिविशेष रूप अर्थ का बोध होता है, सभी शब्द उस अर्थ के वाचक हैं। किस समय से शब्द अर्थ का बोध करा रहे हैं इसका निश्चय न होने से ये सभी शब्द अनादि हैं। क्योंकि, इस समय जिस प्रकार गावी और गोणी शब्द से अर्थ विशेष का बोध हो रहा है, उसी प्रकार अतीत काल में भी इन शब्दों से इस अर्थ का बोध होता था, इसको न मानने का कोई कारण नहीं है। अतः गो शब्द के समान ही गावी आदि शब्द भी हैं, साधु भी हैं, कोई शब्द भी किसी शब्द का अपभ्रंश नहीं है। साधु और असाधु का निरूपण किसी प्रमाण से नहीं हो सकता है, अतः साधु और असाधु का भेद भी समीचीन नहीं है। यदि यह कहा जाय कि व्याकरण के द्वारा साधु और असाधु अर्थात् शुद्ध और अप- भ्रंश का निर्णय होगा ? इस कथन के प्रसङ्ग में यह कहना है कि व्याकरण का प्रामाण्य श्रुति के द्वारा बोधित नहीं है तथा व्याकरण सम्प्रदाय में सूत्रकार, वार्तिककार और भाष्यकार के कथन में साम्य या ऐक्य भी नहीं है। क्योंकि सूत्रकार पाणिनि के मत में सुशब्द निष्पत्ति ही व्याकरण का प्रयोजन है, वार्तिककार कात्यायन के मत में व्याकरण