मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 630, कुल 804 में से
संदर्भ में पढ़ें५७६ मीमांसादर्शनम् [ सू० पूर्वं प्रत्ययादिति पूर्वपक्षभाष्येणार्थापत्तिः सर्वेषां वाचकत्वे प्रमाणमुक्तेत्यभिप्रेत्य, अन्यथाप्युपपत्तिलक्षणदूषणाभिधानार्थत्वेनैतत्सूत्रं व्याख्यातम् । इदानीमनुमानोपन्यासार्थं तद्भाष्यमित्यभिप्रेत्यानैकान्तिकत्वलक्षणहेतुदूषणप्रतिपादनार्थत्वेनैतत्सूत्रं व्याचष्टे—किं चेति । अनेन च देवदत्तादिशब्दे बालैः प्रयुक्तेऽप्यपटुकारणत्वेन प्रयत्ननिष्पत्तेस्सत्तादिरूपेण नाशात् कठोरबुद्धिभिरपि बालप्रयुक्तशब्दानुकरणप्रयत्ननिष्पत्तेस्सत्तादिरूपेण नाशादपराध- भागित्वं दृष्टम् । ततश्च प्रत्ययादितिभाष्योक्तस्य शब्दश्रवणानन्तरभाष्यर्थप्रत्ययलक्षणस्य वाचकत्वहेतोः, तदुपलक्षितस्य चार्थविषयशब्दप्रयोगलक्षणस्यानैकान्तिकतेति सूत्रं योजितम् । श्लोकं व्याचष्टे—तत्तेति । गाव्यादिशब्दैरप्यनैकान्तिकाविमौ हेतू इत्याह— अपभ्रंशाश्चेति । ननु तेषामपि पक्षत्वान्न विपक्षतेत्याशङ्कयाह—कतिषुचिदेवेति । एवमपराधभागिन्यवाचकेऽपि शब्दे हेतोर्दर्शनादनैकान्तिकत्वभूतमपशब्दापराधप्रतिपाद- नार्थमेव तत्—सूत्रमित्युक्तम् । हेतोरेव चानेकान्तिकत्वलक्षणपराधभागित्वम् अनेन सूत्रेणो- च्यत इत्याह—ततश्चेति । एवमपि सूत्रयोजना सम्भवतीत्यपिशब्दार्थः । यद्वा यथा शब्दे अन्ययोच्चारणादपभ्रंशलक्षणापराधभागित्वम्, तथा हेतोरनैकान्ति- कत्वाद्धेत्वाभासत्वलक्षणापराधभागित्वमित्येवमनैकान्तिकत्वप्रतिपादनार्थंयैतत्सूत्रं योज्य- मित्याह—अन्यथेति । एवमपि सूत्रयोजना सम्भवतीति चशब्दार्थः । सन्देहापादनार्थत्वं सूत्रस्योक्तमुपसंहरति—तस्मादिति । नन्वत्र सर्वेषां वा शब्दानां वाचकत्वमेकस्यैव चेति एवं द्वावेव पक्षौ । तत्र सर्ववाचकत्वपक्षे सन्देहापादनेन निरस्ते, पारिशेष्यादेकस्यैव वाचकतेति निर्णयसिद्धेरन्येन निर्णयाभिधानमयुक्तमित्याशङ्कयाह--संशयेति । किन्तदुत्तर- सूत्रमित्यपेक्षायाम् ॥२५॥ भा० प्र०—पूर्वपक्षियों ने कहा कि गो शब्द के समान ही गावी, गोणी आदि शब्द भी अनादिवाचक है, ऐसा स्वीकार किये बिना व्यवहार की उपपत्ति नहीं हो सकती है । इसके समाधान में यह कहा गया है कि शब्दों का सर्वथा साधु रूप से उच्चारण करने के लिए विशेष प्रयत्न आवश्यक है, क्योंकि नाभि प्रदेश से उत्थित, वक्षः स्थल में विस्तार प्राप्त नाद (शब्द) का कण्ठ आदि स्थलों के संस्पर्श से विशेष- विशेष आकार में अभिव्यक्त करने के लिए अतिशय प्रयत्न आवश्यक है, उसमें कुछ भी त्रुटि होने पर शब्द दुष्ट हो जाता है अर्थात् जिस रूप में उच्चारण करने की इच्छा रहती है, उसन भिन्न प्रकार में उच्चारण होता है । एक ही शब्द अनादि काल से चला आ रहा है । विशेष वक्ता के उच्चारण के दोष से उसमें विकृति हो जाती है और भिन्न रूप में उसका उच्चारण होता है, उस शब्द को जिसने उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त किया है, उसका एवं उस सम्प्रदाय के अन्य लोगों के द्वारा भी उस विकृत रूप में ही प्रयोग चलने लगता है । इस प्रकार की उपपत्ति दृष्टविरुद्ध न होने से अर्थापत्ति प्रमाण के आधार पर सभी शब्दों को साधु मानना यह सङ्गत नहीं है । क्योंकि, अन्यथा उपपत्ति होने पर अर्थापत्ति नहीं मानी जाती है । इसलिए गो, गावी, गोता आदि