भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 804 में से

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५७८ मीमांसादर्शनम् [ सू०

प्रतीति ही शब्द के उच्चारण का प्रधान उद्देश्य है। यह अर्थप्रतीति यदि शब्दोच्चारण के द्वारा सम्पन्न न हो तो शब्द का उच्चारण निरर्थक हो जायगा । अतः प्रधानीभूत अर्थ की प्रतीति में जिससे बाधा न हो इस प्रकार के धर्म की कल्पना ही युक्ति सङ्गत है। नित्यता और अनित्यता शब्द का धर्म है। शब्द यदि अनित्य रहेगा तो अर्थ की प्रतीति सम्भव नहीं है। क्योंकि, सम्बन्ध के ज्ञान के बिना केवल शब्द के श्रवणमात्र से अर्थ का बोध नहीं हो सकता है। क्षणिक वस्तु के सम्बन्ध से ही बोध नहीं हो सकता है। क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से ही सम्बन्ध की प्रतीति होती है। दो-तीन बार ज्ञान के बिना अन्वय व्यतिरेक सम्भव नहीं है। क्षणिक वस्तु का एक बार से अधिक ग्रहण सम्भव ही नहीं है। विभिन्न शब्दों के ग्रहण से अर्थप्रतीति से सम्बन्ध की प्रतीति हो ही नहीं सकती है। क्योंकि प्रत्येक शब्द भिन्न है, अतः एक के ज्ञान से अन्य का सम्बन्ध ज्ञान कैसे हो सकता है-? क्योंकि ऐसा मानने पर गो शब्द से अश्व का बोध भी होने लगेगा। सादृश्यनिबन्धन सम्बन्ध के बोध की सम्भावना नहीं है, अनेक अवयवों की एक रूपता को ही सादृश्य कहा जाता है। वर्ण निरवयव हैं, अतः उनका सादृश्य सम्भव नहीं है। यदि किसी एक शब्द का सम्बन्ध गृहीत होता तो सादृश्यनिबन्धन अर्थबोध हो सकता था, किन्तु सभी शब्द क्षणिक हैं अर्थात् एक क्षण से अधिक काल तक स्थायी नहीं हैं, ऐसी स्थिति में कोई भी अर्थ किसी को कभी भी ज्ञानगोचर नहीं हो सकता है। जिसका अर्थ किसी भी समय ज्ञान का विषय नहीं होता है उस शब्द को अर्थयुक्त भी नहीं कहा जा सकता है। अतः शब्द को क्षणिक मानने पर सभी शब्द अर्थहीन रहेंगे, ऐसी स्थिति में किसी से भी सादृश्य निबन्धन अर्थप्रतीति होती है-यह मानने पर एक ही शब्द का अर्थवत्त्व और निरर्थकत्व, मुख्यत्व, गौणत्व इस प्रकार विरुद्ध भाव की स्थिति माननी पड़ेगी। शब्द को क्षणिक मानकर सादृश्यनिबन्धन अर्थप्रतीति मानने पर शब्दज्ञान अर्थात् शब्द से अर्थ की प्रतीति होती है-इसको भ्रम ही मानना होगा ! क्योंकि शाला शब्द का श्रवण कर उसका अर्थ गृह न समझकर सादृश्य निबन्धन यदि माला समझा जाय तो वाष्प को धूम समझने के समान यह भी भ्रम ही होगा ! यदि यह कहा जाय कि शाला और माला शब्द में भेद होने से पूर्वोक्त अर्थबोध को भ्रम ही मानना पड़ेगा, ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि अभेद में सादृश्य नहीं होता है। सादृश्य स्थल में किसी प्रकार का भेद अवश्य ही रहता है। यदि ऐसा न हो तो पूर्व शब्द और पूर्व उच्चारित शब्द के अभिन्न होने पर शब्द नित्य ही रहेगा, यदि यह कहा जाय कि गावी आदि अपभ्रंश शब्द से सादृश्यवश जो अर्थ की प्रतीति होती है, उसको भ्रम नहीं कहा जाता है, अतः अन्य स्थल में भी यही होगा। उस स्थल में गो शब्द के उच्चारण की ही इच्छा रहती है, किन्तु प्रथम वक्ता की अशक्ति के कारण विकृति होने से ऐसा उच्चारण होता है, अतः उन स्थलों में भी गो शब्द ही अर्थ का बोधक है। वस्तुतः ऐसे स्थलों में

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