भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२५ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५७९ बाधक ज्ञान के रहने पर भी शब्द की यथार्थवाचकता भ्रान्त रहती है। किन्तु ऐसा होने से सभी शब्दों की भ्रान्तवाचकता नहीं मानी जा सकती है। जहाँ बाधक ज्ञान रहता है, वहीं वाच्य ज्ञान को भ्रम माना जाता है। यथायथ उच्चारित शब्द की वाचकता में बाधक किसी के न रहने एवं सभी व्यक्तियों के सम्मुख एक रूप होने से उसको भ्रम नहीं कहा जा सकता है, एक ही समय शब्द का उच्चारण, ज्ञान एवं अर्थबोध नहीं हो सकता है, क्योंकि यह परम्परा कथन, युक्ति और अनुभव से सिद्ध है— इसलिए भी शब्द क्षणिक नहीं है। यदि यह कहा जाय कि शब्द कुछ समय रहकर विनष्ट हो जाता है, अतः सम्बन्धज्ञानपूर्वक अर्थबोध हो सकता है, किन्तु ऐसी स्थिति में शब्द यदि कुछ देर तक रहता है, तब सदा क्यों नहीं रहेगा ? जिसके विनाश का कारण रहता है, उसकी उत्पत्ति होती है या नहीं—इसका परिज्ञान भले ही न हो किन्तु विनाश तो मानना ही पड़ेगा। जैसे—प्रागभाव उत्पत्तिरहित होने पर भी नाशक कारण होने से उसका ध्वंस प्राप्त होता है। किन्तु शब्द का नाशक कोई कारण नहीं है, अतः शब्द का नाश नहीं माना जाता है, या जिन पदार्थों की उत्पत्ति कारण सापेक्ष होती है, अर्थात् समवायी, असमवायी कारणों के रहने के कारण होती है वहाँ समवायी या असमवायी कारण के विनाश से उसका विनाश भी होता है। जैसे—तन्तु वस्त्र का समवायी कारण है, अतः तन्तु का नाश एवं तन्तुसंयोग के नाश से अर्थात् समवायी कारण वस्त्र का ध्वंस होता है, किन्तु शब्द का समवायी या असमवायी कारण नहीं है— इसीलिए शब्द निरवयव है। अस्तु, शब्द की अनित्यत्वरूप धर्म की कल्पना करने पर प्रधानीभूत अर्थप्रतीतिरूप फल की बाधा होने से वैसे धर्म की कल्पना अनुचित है, कारण वैसा धर्म ही कल्पनीय है; जो प्रधान में बाधा उत्पन्न नहीं करता है। शब्द के नित्यत्व और विनाशित्व इन दो धर्मों में उसी धर्म को मानना उचित है, जिससे प्रधानभुत अर्थप्रतीतिरूप फल में बाधा न हो। अङ्ग के अङ्गत्व की रक्षा के लिए प्रधानीभूत फल में बाधा करना उचित नहीं है। शब्द अर्थबोध का अङ्ग या साधन है, नित्यता और अनित्यता शब्द का अङ्ग है। शब्द को विनाशी अर्थात् अनित्य कहा जाय तो प्रधान फल का बाध ही होगा। अतः शब्द के नित्य न होने पर प्रधान फल अर्थप्रतीति की अन्यथा उपपत्ति नहीं हो सकती है, अतः शब्द को नित्य ही मानना होगा। अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा शब्द भी नित्यता सिद्ध होती है। श्लोकवार्तिक में शब्द की नित्यता का विस्तृत विश्लेषण उपलब्ध है, जिसका विवरण भूमिका के द्वारा प्राप्त करें। यह आशङ्का की गई है कि गो शब्द के समान गावी, गोणी, आदि शब्द भी अनादि वाचक है, यह मानना पड़ेगा, अन्यथा व्यवहार की उपपत्ति नहीं हो सकती है। इस प्रसङ्ग में यह कहा जा सकता है कि व्यवहार की उपपत्ति अन्यथा भी हो सकती है। शब्द का उचित रूप में सुष्ठु उच्चारण के लिए विशेष प्रयत्न आवश्यक