भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६१७ 'तत्र' शब्द में । 'तत्त्वम्' = "तस्य भावः" अर्थात् उसका साधुमात्र = साधुत्व । "अभि- योगविशेषात् स्यात्" अभियोग विशेष निवन्धन ही होना चाहिए । कौन शब्द साधु है, इसका ज्ञान व्याकरणशास्त्र के अनुशीलन से उत्पन्न संस्कार-विशेष से ही उत्पन्न होता है । आशय यह है कि साधु और असाधु शब्दों में वस्तुतः कौन शब्द साधु है और कौन शब्द असाधु है-यह शिष्टों के उपदेश से ही अवगत किया जाता है । इस समय लक्षण सूत्र के आधार पर साधु शब्दों की अवगति सम्भव है । अतः, शिष्टगण ही साधु और असाधु के वस्तुतः निर्णायक हैं । जिसके आधार पर व्याकरण सूत्रों की रचना की गई है ॥ २७ ॥ भा० प्र०—गो शब्द के उच्चारण की इच्छा रहते हुए भी असामर्थ्य के कारण गावी शब्द का उच्चारण हो जाता है । यद्यपि इसके द्वारा सास्नादि गलकम्बलयुक्त अर्थ ही विवक्षित रहता है । आशय यह है कि शुद्ध शब्द का उच्चारण रहने पर भी सादृश्यवश से अर्थ की प्रतीति होती है । इसीलिए "अश्मकैः आगच्छतानि" इत्यादि वाक्यों के सुनने पर "अश्मकेभ्यः आगच्छामि" अर्थात् अश्मक देश से आया हूँ-यह अर्थ अवगत होता है । "अश्मकेभ्यः" इस पञ्चमी विभक्ति के बहुवचन के स्थान पर 'अश्मकैः' यह तृतीया विभक्ति के बहुवचन का प्रयोग किया गया है । इस स्थल में विभक्ति का व्यतिक्रम होने पर अर्थ का ज्ञान न होना चाहिए, किन्तु सादृश्य के कारण अर्थ का ज्ञान हो जाता है । अतः किसी समय गो शब्द के उच्चारण की इच्छा रहने पर भी असावधानी या असामर्थ्य से गावी शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु, अर्थ के ज्ञान में किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं होती है । अतः, गो शब्द साधु है और अन्य शब्द असाधु है । साधु शब्द का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि यज्ञादि में असाधु शब्द का प्रयोग करने पर प्रायश्चित्त का उपदेश दिया गया है । "एकदेशत्वात्" एकदेशता के कारण अर्थात् किसी प्रकार विकृत होने पर भी अन्य अविकृत अंश का ही एक देश होने से 'च' तथा और "विभक्तिव्यत्यये स्यात्" विभक्ति का व्यत्यय होने पर भी अर्थ का ज्ञान होता है ॥ २८ ॥ भा० प्र० गो शब्द के शुद्ध रूप में उच्चारण का सामर्थ्य न रहने से त्रुटि शब्द की विच्युति से गो शब्द विकृत होकर गावी, गोणी आदि के रूप में शब्द उच्चारित होता है । अतः गो शब्द के अनुरूप होने से चेष्टा आदि के द्वारा गलकम्बल आदि अर्थ का बोध होता है । क्योंकि किसी वृद्ध के कथन के अनुसार गामानय के उच्चारण की जगह पर गावीमानय यह उच्चारण होने पर भी सास्नादियुक्त गौ को लाते हुए देखकर गावी का अर्थ भी गौ ही है-अनुरूप होने से यह अवगत करता है । 'तदशक्तिः' = उसकी अर्थात् गो इस शब्द के उच्चारण की 'अशक्तिः' = असमर्थता, अक्षमता, 'च' = एवम् 'अनुरूपत्वात्' = अनुरूप अर्थात् गो शब्द के अनुरूप होने से गो अर्थ का ही बोधक है ॥ २९ ॥