भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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६५६ मीमांसादर्शनम् [ सू० प्रत्ययमाधातुमिति तद्भूताधिकरणभाष्येण तुल्यन्यायत्वादुक्तं भवतीत्याह -- तदुक्तमिति । नन्वालम्भादिचोदनासु व्यक्तेर्वाच्यत्वं श्येनचितादिचोदनासु त्वाकृतेरेव क्रियार्थत्वाल्लक्षिता- याश्चाशाब्दत्वेन धूमगम्याग्निवच्छाब्दक्रियान्वयायोगात्तस्या एव वाच्यताऽङ्गीकार्य्येत्या- शङ्क्याह--यस्य त्विति । शङ्कानिराकरणार्थस्तुशब्दः । गौणलाक्षणिकत्वयोः शब्दस्य शक्त्यभावेऽपि तात्पर्यात्सद्भावाच्छ्वशुराल्लज्जते स्नुषेत्यादौ च पुत्रविशिष्टभार्यादिवाचिनः स्नुषादिशब्दस्य विशेषणभूतपुत्राद्यनभिधाने विशेष्यभूतभार्याभिधानांशक्तेः स्नुषादिशब्दा- भिहितस्यापि पुत्रादेर्लज्जादिक्रियान्वयादर्शनेन तात्पर्य्यवृत्तेरेव पदार्थान्वयकारणत्वावसा- याल्लाक्षणिकाऽप्याकृतिः क्रियात्वं प्रतिपत्तुं शक्तेत्याशयः । तस्य पदस्य तत्रस्थस्य तत्रैवार्ये वर्त्तमानस्येत्यर्थः । नन्वेवं सति व्यक्तेरपि लाक्षणिक्याः क्रियान्वयोपपत्तेर्जातिवाचितैव कस्मान्नेष्टेत्या- शङ्क्याह--इत्यपि चेति । इति करणोऽयमेवशब्दार्थे । एवमपीत्युक्तं भवति । यद्यप्युमय- थापि क्रियान्वयो युज्यते, तथाप्याकृतेर्व्यक्तिविशेषनिश्चायकत्वाभावाद्यक्तेश्चाकृतिविशेष- निश्चायकत्वसद्भावादाकृतेरेव लाक्षणिकत्वं युक्तम्, न व्यक्तेरित्यर्थः । उपसंहरति-- तस्मादिति । ननु विकल्पादिपक्षान्तरसम्भवान्नायमुपसंहारो युक्त इत्याशङ्क्याह-- न चेति ॥ ३० ॥ भा० प्र०--साधु शब्द के प्रयोग के लिए सूत्र का निर्देश किया गया है, अर्थात् साधु शब्द का प्रयोग ही उचित है और साधुता के ज्ञान के लिए एक मात्र आधार व्याकरण शास्त्र है, व्याकरण के द्वारा ही शब्दों का साधुत्वानुशासन किया जाता है। अब विचार- णीय है कि वाचक शब्द का वाच्य क्या है ? कारण, शब्द के वाच्य के ज्ञान के बिना पद की साधुता या असाधुता का निर्णय नहीं हो सकता है, इसलिए आचार्य कुमारिल- भट्ट ने स्पष्ट शब्दों से निर्दिष्ट किया है--"न हि वाच्यमविज्ञाय साधुत्वमवधार्यते" यह भी सत्य है कि शब्द के वाच्य के विषय में आचार्यों का एकमत नहीं है। वैयाकरण ने व्यक्ति को शब्द वाच्य माना है, मीमांसक एवं वेदान्तियों ने स्वीकार किया है कि जाति ही शब्द का वाच्य है और नैयायिकों ने जातिविशिष्ट व्यक्ति को वाच्य माना है । इस प्रकार मतभेद रहने से प्रसङ्गक्रम में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि वैदिक शब्द का वाच्य क्या है ? इस विषय की विवेचना से पूर्व यह भी अवगत करना होगा कि वैदिक शब्द एवं उसका अर्थ भिन्न है या अभिन्न है ? क्योंकि, वैदिक शब्द और उसका अर्थ लौकिक शब्द और अर्थ से भिन्न है तब वाच्य-वाचकता के निरूपण अधिकरण की योजना नहीं हो सकती है, कारण, वैदिक शब्दों का अर्थ अपूर्व है अर्थात् अन्य प्रमाणों से जानने के योग्य नहीं है, तब वैदिक शब्द का वाच्य जाति है अथवा वैदिक शब्दों का अभिधेय व्यक्ति है--इसके निर्णय का कोई साधन नहीं है, यदि लौकिक और वैदिक शब्दों का अर्थ अभिन्न है, तभी इस अधिकरण की योजना सम्भव हो सकती है। क्योंकि