मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 711, कुल 804 में से
संदर्भ में पढ़ें३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६५७ वृद्धों के व्यवहार से शब्दार्थ सम्बन्ध जानकर जाति या व्यक्ति की वाच्यता का निश्चय किया जा सकता है । लौकिक और वैदिक शब्द भिन्न हैं या अभिन्न हैं - इस संशय में पूर्वपक्षी का कहना है कि अभिन्न नहीं हो सकते हैं, क्योंकि लौकिक शब्दों का रूप भिन्न है और वैदिक शब्दों का रूप भिन्न है, जैसे, लोक में देव शब्द का रूप देवैः, ब्राह्मण शब्द का रूप ब्राह्मणाः, आत्मन् शब्द का रूप आत्मना होता है, किन्तु वेद में देवेभिः, ब्राह्मणासः, त्मना आदि रूप होता है । इसलिए लौकिक एवं वैदिक शब्दों का रूप भिन्न होने से वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते हैं । इसी प्रकार अर्थ में भी भेद है । जैसे वेद में कहा गया है—'उत्ताना वै देवगवा वहन्ति' अर्थात् देवलोक की गौएँ उत्तानवाही अर्थात् चित्त होकर चलती हैं। “हिरण्यपर्णी वै देव वनस्पतिः” अर्थात् देवलोक के वृक्ष हिरण्मय पत्र होते हैं । इसी प्रकार “एतद् वै दैव्यं मधु यद् घृतम्” यह घृत देवों का मधु है । इस प्रकार घृत को मधु कहा जाता है । पूर्वोक्त उद्धरणों से लौकिक पद और पदार्थ से वैदिक पद और पदार्थ की भिन्नता ही लक्षित होती है । इस पूर्वपक्ष के समाधान में सिद्धान्ती का कथन है कि लौकिक और वैदिक शब्द और अर्थ की एकता अर्थात् अभिन्नता ही है । इसीलिए भाष्यकार ने कहा है— “य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्त एव एषामर्थाः” जो लौकिक शब्द है, वही वैदिक शब्द है और जो इनका लोकसिद्ध अर्थ है वही वैदिक अर्थ है । क्योंकि, 'प्रयोग-चोदना- भावात्' इसीलिए प्रयोग चोदना अर्थात् कर्मविधि सम्भव होती है या वेदवाक्य का उच्चारण सफल होता है । यदि वैदिक शब्दार्थ भिन्न होता तब उनका सङ्केतग्रह अर्थात् सम्बन्ध ज्ञान नहीं होने से वेद की कर्म विधि व्यर्थ होती और अर्थ के ज्ञान के लिए ही शब्द का उच्चारण किया जाता है, किन्तु वैदिक शब्द एवं अर्थ भिन्न होने पर वह अपूर्व अर्थात् प्रमाणों की सहायता से अज्ञेय होने से उसका अर्थबोध नहीं होता और अर्थ का बोध न होने पर वे अप्रमाण रहते, अतः लोक और वेद का शब्द और अर्थ अभिन्न है । इसीलिए कहा गया है— 'लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः' अर्थात् वृद्धों के व्यवहार से ही शब्द का सामर्थ्य अवगत होता है । लौकिक और वैदिक शब्दों की अभिन्नता के लिए ही कहा गया है -- 'अविभागात्' यतः प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यय का विभाग अर्थात् भेद नहीं है । आशय यह है कि लौकिक और वैदिक शब्द की अभिन्नता दृढ़तर प्रत्यभिज्ञा से सिद्ध है तब उसको परस्पर भिन्न कैसे कहा जा सकता है ? अबाधित प्रत्यभिज्ञा रहने पर जैसे वर्णों की अभिन्नता सिद्ध होती है वैसे ही लौकिक और वैदिक शब्दों में भी अबाधित प्रत्यभिज्ञा होने से उनमें भेद नहीं रह सकता है । अतः लौकिक गोशब्द से वैदिक गवादि शब्द भिन्न नहीं है । वेद में जो गउ को उत्तानपादी कहा गया है—वह भी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि, उन स्थलों में गोत्व आदि विधेय नहीं है, अपितु लोकप्रसिद्ध ४२