मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५८ मीमांसादर्शनम् [ सू० गोत्व आदि का उत्तानवाहित्व ही विहित है। मर्त्यलोक में गउ नाम से जो प्राणी प्रसिद्ध है, वह देवलोक में उत्तानवादी ही है। इसी प्रकार लोक प्रसिद्ध वृक्ष के विषय में स्वर्ण- मय पत्रत्व विहित है। इस कथन का यह कारण है कि मेरु पर्वत पर यदि वनस्पति हिरण्मयपर्णत्व हो सकता है, तो इसको अर्थान्तरवाची मानने की क्या आवश्यकता है ? हम लोगों के लिए जो घृत है वह रस, बल के परिणाम से देवों के लिए उसको मधु मानने में कोई आपत्ति नहीं है। किसी गुणवाद से पृथिवी गोलोक त्रैलोक्य भ्रमणादि से, पुराण के कथन से दर्शन की तरह तथा हम लोग दिव् को ऊपर देखते हैं, इसी प्रकार दिव्लोक के ऊपर होने से उत्तान वहन दृष्टि विरुद्ध नहीं है। सभी के लिए प्रसिद्ध न होने पर जिसके लिए असिद्ध है, उनके लिए असिद्ध होने से अन्यत्व की आशङ्का नहीं है। एवं हिरण्यपत्रत्वं मेरौ यदि वनस्पतेः । देवलोके ततः शब्दः किमर्थान्तरवाच्ययम् ॥ यच्चैतद्घृतमस्माकं देवानां मध्विदं यदि । रसवीर्यादिभिस्तत्र न शब्दार्थोऽन्यथा भवेत् ॥ न च सर्वाप्रसिद्धत्वे गम्यैकोऽपि कश्चन । तेनासिद्धैरसिद्धानां नास्त्यन्यत्वनिरूपणम् ॥ (त० वा० १३८-१४०) वृद्धव्यवहारसिद्ध घृत की आनन्दजनकता के सादृश्य से घृत में मधुत्व आरोपित है। देवेभिः, ब्राह्मणासः, आदि रूप के भेद से शब्द का भेद स्थिर करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही व्यक्ति को विभिन्न काल में विभिन्न परिधान के आधार पर भी भेद मानना पड़ेगा, किन्तु उस स्थल में रूप का भेद होने पर भी व्यक्ति स्वरूप का भेद नहीं होता है। क्योंकि स एवायम् (यह वही है) यह अभेद प्रत्यभिज्ञा रहती है। इसी प्रकार वैदिक शब्दों मे भी कहीं किसी प्रकार का भेद रहने पर भी अभेद प्रत्यभिज्ञा होने से वे भिन्न नहीं है—यह मानना पड़ेगा। शब्दैकत्वम् की जगह पर अर्थैकत्वम् -- इस कथन का आशय व्यक्त करते हुए कहा कहा है कि अर्थैकत्व कहने से ही शब्दैकत्व अर्थतः सिद्ध हो जाता है, इसलिए लाघवपक्ष का अवलम्बन कर सूत्रकार ने ऐसा प्रयोग किया है। वार्तिककार ने 'अविभागात्' इस हेतु का पांच हेतु विकल्प प्रदर्शित किया है—(१) प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यय के अविभाग के कारण। (२) ज्ञायमान वैदिक और लौकिक दोनों प्रमेयों के रूपगत अविभाग के कारण। (३) वाक्य और वाक्य राशि के हेतुस्वरूप पद और वर्ण के विषयत्व व्यवहार के अविभाग के कारण। (४) उच्चारण करने वाले के स्थान एवं इन्द्रिय के प्रयत्न के अविभाग के कारण। (५) बहुतर प्रमेय के अनुगमनविषयक अविभाग के कारण, वैदिक और लौकिक शब्द और उसके अर्थ की अभिन्नता से ।