मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६५९ लोकव्यवहार एवं वेदव्यवहार में शब्द और अर्थ अभिन्न हैं—यह अबाधित होने पर जाति में शब्द की शक्ति है या व्यक्ति में शब्द की शक्ति है—यह विषय विचारणीय होता है। पूर्वपक्षियों का कहना है कि व्यक्ति को ही वाच्य मानना उचित है, अन्यथा सभी वेदविधियां निरर्थक हो जायेंगी—इसी को व्यक्त करते हुए कहा है—"प्रयोग- चोदनाभावात्"। जाति को शब्द का वाच्य मानने पर क्रिया एवं गुण के साथ उसका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। क्योंकि गाय चर रही है, गौश्चरति", गौ सफेद है 'गौः शुक्लः' इत्यादि व्यवहार उत्पन्न नहीं होगा। जाति अतीत, वर्तमान एवं भविष्य सभी गो व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होने से उसमें चरणक्रिया सम्भव नहीं है। जाति अमूर्त होने से वह अनाश्रय है, अतः शुक्लत्व आदि गुणों का आश्रय नहीं हो सकती है न और न उससे वह उपरक्त हो सकती है। पूर्वोक्त कारणों से 'ब्रीहीन् प्रोक्षति' 'ब्रीहि का प्रोक्षण करें', कपिञ्जलान् आलभेत' कपिञ्जल अर्थात् तित्तिर जातीय पक्षिविशेष का यज्ञविशेष में वध करें आदि विधियां अनर्थक हो जायेंगी, क्योंकि जाति का वध तो सम्भव नहीं है, अतः जाति शब्द का अभिधेय नहीं हो सकती है। इसलिए, व्यक्ति को शब्द का अभिधेय मानना होगा, क्योंकि व्यक्ति में पूर्वोक्त क्रिया पूर्वोक्त गुण का होना सम्भव है। कोई गाय घूम रही है, कोई गाय बैठी है, कोई काली है, कोई सफेद है इत्यादि व्यक्ति के अभिधेय होने में ही सम्भव है। यदि यह कहा जाय कि जहां जाति के अभिधेय मानने में दोष है वहां व्यक्ति को ही वाच्य माना जायेगा, और जहां जाति को वाच्य मानने में किसी प्रकार दोष नहीं है, वहाँ जाति को वाच्य माना जायेगा। ऐसा मानने पर शब्द को अनेकार्थक मानना पड़ेगा। एक शब्द की अनेकार्थता उचित नहीं है। इसी आशय से सूत्रकार ने "अर्थै- कत्वम्" शब्द का एक ही अर्थ होना उचित है—यह कहा है। इस प्रसङ्ग में यह जिज्ञास्य है कि जाति की प्रतीति कैसे होगी ? इसके समाधान में “अविभागात्” यह कहा गया है। जाति व्यक्ति से अत्यन्त भिन्न नहीं है । इसलिए, दोनों में भेदाभेद सम्बन्ध होने से व्यक्ति की प्रतीति के समय जाति की भी प्रतीति होगी। नैयायिकों का कथन है कि व्यक्ति में शक्ति मानने पर अनन्त शक्ति की कल्पना माननी पड़ेगी, अतः, जाति विशिष्ट व्यक्ति में शक्ति है। "प्रयोगचोदनाभावात्" = प्रयोग चोदना का अर्थात् प्रोक्षण आदि उपदिष्ट कर्मों के अभाव से अर्थात् इन विधियों के असम्भव होने से व्यक्ति ही शब्द का वाच्य है। "अर्थैकत्वम्” = केवल व्यक्ति को ही वाच्य मानने पर सर्वत्र अभिधेय = वाच्य की एकता रहने से "अविभागात्"=व्यक्ति का जाति से भेद न होने से व्यक्ति की प्रतीति होने पर जाति की भी प्रतीति होगी। व्यक्ति ही शब्द का वाच्य हो सकती है। जाति शब्द का वाच्य नहीं हो सकती है, क्योंकि, जाति को वाच्य मानने पर विधि-विहित प्रोक्षण आदि कर्म असम्भव हो जायेंगे। व्यक्ति को वाच्य मानने पर सभी स्थलों में अर्थ की