मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६५७ वृद्धों के व्यवहार से शब्दार्थ सम्बन्ध जानकर जाति या व्यक्ति की वाच्यता का निश्चय किया जा सकता है । लौकिक और वैदिक शब्द भिन्न हैं या अभिन्न हैं - इस संशय में पूर्वपक्षी का कहना है कि अभिन्न नहीं हो सकते हैं, क्योंकि लौकिक शब्दों का रूप भिन्न है और वैदिक शब्दों का रूप भिन्न है, जैसे, लोक में देव शब्द का रूप देवैः, ब्राह्मण शब्द का रूप ब्राह्मणाः, आत्मन् शब्द का रूप आत्मना होता है, किन्तु वेद में देवेभिः, ब्राह्मणासः, त्मना आदि रूप होता है । इसलिए लौकिक एवं वैदिक शब्दों का रूप भिन्न होने से वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते हैं । इसी प्रकार अर्थ में भी भेद है । जैसे वेद में कहा गया है—'उत्ताना वै देवगवा वहन्ति' अर्थात् देवलोक की गौएँ उत्तानवाही अर्थात् चित्त होकर चलती हैं। “हिरण्यपर्णी वै देव वनस्पतिः” अर्थात् देवलोक के वृक्ष हिरण्मय पत्र होते हैं । इसी प्रकार “एतद् वै दैव्यं मधु यद् घृतम्” यह घृत देवों का मधु है । इस प्रकार घृत को मधु कहा जाता है । पूर्वोक्त उद्धरणों से लौकिक पद और पदार्थ से वैदिक पद और पदार्थ की भिन्नता ही लक्षित होती है । इस पूर्वपक्ष के समाधान में सिद्धान्ती का कथन है कि लौकिक और वैदिक शब्द और अर्थ की एकता अर्थात् अभिन्नता ही है । इसीलिए भाष्यकार ने कहा है— “य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्त एव एषामर्थाः” जो लौकिक शब्द है, वही वैदिक शब्द है और जो इनका लोकसिद्ध अर्थ है वही वैदिक अर्थ है । क्योंकि, 'प्रयोग-चोदना- भावात्' इसीलिए प्रयोग चोदना अर्थात् कर्मविधि सम्भव होती है या वेदवाक्य का उच्चारण सफल होता है । यदि वैदिक शब्दार्थ भिन्न होता तब उनका सङ्केतग्रह अर्थात् सम्बन्ध ज्ञान नहीं होने से वेद की कर्म विधि व्यर्थ होती और अर्थ के ज्ञान के लिए ही शब्द का उच्चारण किया जाता है, किन्तु वैदिक शब्द एवं अर्थ भिन्न होने पर वह अपूर्व अर्थात् प्रमाणों की सहायता से अज्ञेय होने से उसका अर्थबोध नहीं होता और अर्थ का बोध न होने पर वे अप्रमाण रहते, अतः लोक और वेद का शब्द और अर्थ अभिन्न है । इसीलिए कहा गया है— 'लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः' अर्थात् वृद्धों के व्यवहार से ही शब्द का सामर्थ्य अवगत होता है । लौकिक और वैदिक शब्दों की अभिन्नता के लिए ही कहा गया है -- 'अविभागात्' यतः प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यय का विभाग अर्थात् भेद नहीं है । आशय यह है कि लौकिक और वैदिक शब्द की अभिन्नता दृढ़तर प्रत्यभिज्ञा से सिद्ध है तब उसको परस्पर भिन्न कैसे कहा जा सकता है ? अबाधित प्रत्यभिज्ञा रहने पर जैसे वर्णों की अभिन्नता सिद्ध होती है वैसे ही लौकिक और वैदिक शब्दों में भी अबाधित प्रत्यभिज्ञा होने से उनमें भेद नहीं रह सकता है । अतः लौकिक गोशब्द से वैदिक गवादि शब्द भिन्न नहीं है । वेद में जो गउ को उत्तानपादी कहा गया है—वह भी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि, उन स्थलों में गोत्व आदि विधेय नहीं है, अपितु लोकप्रसिद्ध ४२
६५८ मीमांसादर्शनम् [ सू० गोत्व आदि का उत्तानवाहित्व ही विहित है। मर्त्यलोक में गउ नाम से जो प्राणी प्रसिद्ध है, वह देवलोक में उत्तानवादी ही है। इसी प्रकार लोक प्रसिद्ध वृक्ष के विषय में स्वर्ण- मय पत्रत्व विहित है। इस कथन का यह कारण है कि मेरु पर्वत पर यदि वनस्पति हिरण्मयपर्णत्व हो सकता है, तो इसको अर्थान्तरवाची मानने की क्या आवश्यकता है ? हम लोगों के लिए जो घृत है वह रस, बल के परिणाम से देवों के लिए उसको मधु मानने में कोई आपत्ति नहीं है। किसी गुणवाद से पृथिवी गोलोक त्रैलोक्य भ्रमणादि से, पुराण के कथन से दर्शन की तरह तथा हम लोग दिव् को ऊपर देखते हैं, इसी प्रकार दिव्लोक के ऊपर होने से उत्तान वहन दृष्टि विरुद्ध नहीं है। सभी के लिए प्रसिद्ध न होने पर जिसके लिए असिद्ध है, उनके लिए असिद्ध होने से अन्यत्व की आशङ्का नहीं है। एवं हिरण्यपत्रत्वं मेरौ यदि वनस्पतेः । देवलोके ततः शब्दः किमर्थान्तरवाच्ययम् ॥ यच्चैतद्घृतमस्माकं देवानां मध्विदं यदि । रसवीर्यादिभिस्तत्र न शब्दार्थोऽन्यथा भवेत् ॥ न च सर्वाप्रसिद्धत्वे गम्यैकोऽपि कश्चन । तेनासिद्धैरसिद्धानां नास्त्यन्यत्वनिरूपणम् ॥ (त० वा० १३८-१४०) वृद्धव्यवहारसिद्ध घृत की आनन्दजनकता के सादृश्य से घृत में मधुत्व आरोपित है। देवेभिः, ब्राह्मणासः, आदि रूप के भेद से शब्द का भेद स्थिर करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही व्यक्ति को विभिन्न काल में विभिन्न परिधान के आधार पर भी भेद मानना पड़ेगा, किन्तु उस स्थल में रूप का भेद होने पर भी व्यक्ति स्वरूप का भेद नहीं होता है। क्योंकि स एवायम् (यह वही है) यह अभेद प्रत्यभिज्ञा रहती है। इसी प्रकार वैदिक शब्दों मे भी कहीं किसी प्रकार का भेद रहने पर भी अभेद प्रत्यभिज्ञा होने से वे भिन्न नहीं है—यह मानना पड़ेगा। शब्दैकत्वम् की जगह पर अर्थैकत्वम् -- इस कथन का आशय व्यक्त करते हुए कहा कहा है कि अर्थैकत्व कहने से ही शब्दैकत्व अर्थतः सिद्ध हो जाता है, इसलिए लाघवपक्ष का अवलम्बन कर सूत्रकार ने ऐसा प्रयोग किया है। वार्तिककार ने 'अविभागात्' इस हेतु का पांच हेतु विकल्प प्रदर्शित किया है—(१) प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यय के अविभाग के कारण। (२) ज्ञायमान वैदिक और लौकिक दोनों प्रमेयों के रूपगत अविभाग के कारण। (३) वाक्य और वाक्य राशि के हेतुस्वरूप पद और वर्ण के विषयत्व व्यवहार के अविभाग के कारण। (४) उच्चारण करने वाले के स्थान एवं इन्द्रिय के प्रयत्न के अविभाग के कारण। (५) बहुतर प्रमेय के अनुगमनविषयक अविभाग के कारण, वैदिक और लौकिक शब्द और उसके अर्थ की अभिन्नता से ।
३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६५९ लोकव्यवहार एवं वेदव्यवहार में शब्द और अर्थ अभिन्न हैं—यह अबाधित होने पर जाति में शब्द की शक्ति है या व्यक्ति में शब्द की शक्ति है—यह विषय विचारणीय होता है। पूर्वपक्षियों का कहना है कि व्यक्ति को ही वाच्य मानना उचित है, अन्यथा सभी वेदविधियां निरर्थक हो जायेंगी—इसी को व्यक्त करते हुए कहा है—"प्रयोग- चोदनाभावात्"। जाति को शब्द का वाच्य मानने पर क्रिया एवं गुण के साथ उसका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। क्योंकि गाय चर रही है, गौश्चरति", गौ सफेद है 'गौः शुक्लः' इत्यादि व्यवहार उत्पन्न नहीं होगा। जाति अतीत, वर्तमान एवं भविष्य सभी गो व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होने से उसमें चरणक्रिया सम्भव नहीं है। जाति अमूर्त होने से वह अनाश्रय है, अतः शुक्लत्व आदि गुणों का आश्रय नहीं हो सकती है न और न उससे वह उपरक्त हो सकती है। पूर्वोक्त कारणों से 'ब्रीहीन् प्रोक्षति' 'ब्रीहि का प्रोक्षण करें', कपिञ्जलान् आलभेत' कपिञ्जल अर्थात् तित्तिर जातीय पक्षिविशेष का यज्ञविशेष में वध करें आदि विधियां अनर्थक हो जायेंगी, क्योंकि जाति का वध तो सम्भव नहीं है, अतः जाति शब्द का अभिधेय नहीं हो सकती है। इसलिए, व्यक्ति को शब्द का अभिधेय मानना होगा, क्योंकि व्यक्ति में पूर्वोक्त क्रिया पूर्वोक्त गुण का होना सम्भव है। कोई गाय घूम रही है, कोई गाय बैठी है, कोई काली है, कोई सफेद है इत्यादि व्यक्ति के अभिधेय होने में ही सम्भव है। यदि यह कहा जाय कि जहां जाति के अभिधेय मानने में दोष है वहां व्यक्ति को ही वाच्य माना जायेगा, और जहां जाति को वाच्य मानने में किसी प्रकार दोष नहीं है, वहाँ जाति को वाच्य माना जायेगा। ऐसा मानने पर शब्द को अनेकार्थक मानना पड़ेगा। एक शब्द की अनेकार्थता उचित नहीं है। इसी आशय से सूत्रकार ने "अर्थै- कत्वम्" शब्द का एक ही अर्थ होना उचित है—यह कहा है। इस प्रसङ्ग में यह जिज्ञास्य है कि जाति की प्रतीति कैसे होगी ? इसके समाधान में “अविभागात्” यह कहा गया है। जाति व्यक्ति से अत्यन्त भिन्न नहीं है । इसलिए, दोनों में भेदाभेद सम्बन्ध होने से व्यक्ति की प्रतीति के समय जाति की भी प्रतीति होगी। नैयायिकों का कथन है कि व्यक्ति में शक्ति मानने पर अनन्त शक्ति की कल्पना माननी पड़ेगी, अतः, जाति विशिष्ट व्यक्ति में शक्ति है। "प्रयोगचोदनाभावात्" = प्रयोग चोदना का अर्थात् प्रोक्षण आदि उपदिष्ट कर्मों के अभाव से अर्थात् इन विधियों के असम्भव होने से व्यक्ति ही शब्द का वाच्य है। "अर्थैकत्वम्” = केवल व्यक्ति को ही वाच्य मानने पर सर्वत्र अभिधेय = वाच्य की एकता रहने से "अविभागात्"=व्यक्ति का जाति से भेद न होने से व्यक्ति की प्रतीति होने पर जाति की भी प्रतीति होगी। व्यक्ति ही शब्द का वाच्य हो सकती है। जाति शब्द का वाच्य नहीं हो सकती है, क्योंकि, जाति को वाच्य मानने पर विधि-विहित प्रोक्षण आदि कर्म असम्भव हो जायेंगे। व्यक्ति को वाच्य मानने पर सभी स्थलों में अर्थ की
६६० मीमांसादर्शनम् [ सू० एकता भी रहेगी, जाति व्यक्ति से अभिन्न है, अतः व्यक्ति की प्रतीति होने पर जाति की भी प्रतीति अनायास ही होगी अथवा "प्रयोगचोदनाभावात्" = विधिवाक्य का वाच्य की चोदना अर्थात् उच्चारण जन्य अर्थ प्रतीति का अभाव अर्थात् अप्रामाण्य होने से "अर्थकत्वम्" = लौकिक एवं वैदिक अर्थ की एकता होने से अर्थात् अभिन्नता ही है, "अविभागात्" = विभाग अर्थात् वैलक्षण्य नहीं है। लौकिक और वैदिक शब्द एवं उनका अर्थ अभिन्न है, क्योंकि, लौकिक एवं वैदिक शब्द की अभिन्नता है, यदि अभिन्नता न मानी जाय तो विधि वाक्य का या वेदवाक्य के उच्चारण का अप्रामाण्य मानना होगा ॥ ३० ॥ अद्रव्यशब्दत्वात् ॥ ३१ ॥ शा० भा०-द्रव्याश्रयस्य शब्दो द्रव्यशब्दः, न तत्र द्रव्याश्रयवचनः शब्दो 'भवेत्, यद्याकृतिः शब्दार्थो भवेत्। षड¹ देया द्वादश देयाश्चतुर्विशतिर्देया इति । न ह्याकृतिः षडादिभिः संख्याभिर्युज्यते । तस्मान्नाऽऽकृतिवचनः ॥ ३१ ॥ अन्यदर्शनाच्च ॥ ३२ ॥ शा० भा०—'यदि पशुरुपाकृतः पलायेत, अन्यं तद्वर्णं यद्वयसमालभेत' इति । यद्याकृतिवचनः शब्दो भवेत्, अन्यस्याऽऽलम्भो नोपपद्येत । अन्यस्यापि पशुद्रव्यस्य सैवाऽऽकृतिः । तस्माद् व्यक्तिवचन³ इति ॥ ३२ ॥ पूर्वपक्षः । भा० वि०—व्यक्तेश्शब्दार्थत्वे हेत्वन्तरमाह - अद्रव्यशब्दत्वादिति । सूत्रं व्याचष्टे—द्रव्याश्रयस्येति, अद्रव्यशब्द इति। अद्रव्यः शब्द इतिच्छेदः, अनेन सौत्रं पदमनूदितम् तच्च गुणशब्द इति व्याख्यातं द्रव्याश्रयस्य शब्द इति, न च जातेरपि द्रव्याश्रयत्वात् कथं द्रव्याश्रयस्य शब्दो गुणशब्द एवेति वाच्यम्; द्रव्यत्वे नञा पर्युदस्ते तदन्यापेक्षायां द्रव्यमात्राश्रयत्वात् नेति; गुण एव द्रव्याश्रयस्य शब्द इत्याशयः, एवं पदार्थमुक्त्वा नञध्याहारेण वाक्यार्थमाह—न तत्रेति । गवादि शब्दानामाकृत्यर्थत्वे तत्समानाधिकरणषडादिसङ्ख्यागुणवचनशब्दो न भवेदित्यर्थः, कुत इत्यत आह—न हीति । द्रव्यस्यैव गुणवत्त्वनियमादिति भावः । उक्तहेतुफलमाह—तस्मादिति । ततश्चाकृतिविशिष्टा वा; केवला वा व्यक्तिश्शब्दार्थ इति भावः ॥ ३१ ॥ भा० वि०—इतश्च व्यक्तिश्शब्दार्थ इत्याह—अन्यदर्शनाच्चेति । सूत्रं व्याख्यातुं विषयमाह—यदीति । अन्यस्य प्रतिनिधेः विधानदर्शनाद्व्यक्तिश्शब्दार्थ १ ब. षड्देया । २ ब. संख्यादिभि । ३ ब. सेवतस्मा ।
३१-३२ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६६१ इति सूत्रार्थं व्यतिरेकमुखेन दर्शयति - यद्याकृतिरित्यादिना । अन्यत्वासंभवमुप- लक्षणं तद्वर्णत्वादेरसंभवस्यापि यस्मादाकृत्यर्थत्वे प्रतिनिध्यानुष्ठानासम्भवः, तस्माद् व्यक्तिवचन इत्याह - तस्मादिति । इति शब्दः पूर्वपक्षसमाप्त्यर्थः ॥ ३२ ॥ त० वा०—गोशब्दादीनामाकृतिवचनत्वे गोः शुक्लः, 'अरुणया पिङ्गाक्ष्येक- हायन्या गवा सोमं क्रीणाति' इति 'षड् गावो देयाः' 'एकां गां दक्षिणां दद्यात्, इत्येवमादिषु प्रयोगेषु सर्वेषां जातिगुणमात्रवचनत्वात्सामानाधिकरण्यं न प्राप्नोति । गोत्वस्य न हि सम्बन्धः शुक्लत्वारुणिमादिभिः । येन षष्ठ्यापि तावत्स्यात्कुतस्त्वेकार्थवृत्तिता ॥ ९९५ न हि गोत्वाकृतिः शुक्ला नारुणा नापि षड्गुणा । व्यक्तिस्त्वेवंगुणा तस्माद्व्यक्तेरेवाभिधेयता ॥ ९९६ मम हि व्यक्तिशब्दत्वात्सिद्ध्यत्येकार्थवृत्तिता । तव त्वद्रव्यशब्दत्वाद्वैविद्द्वेदो गवाश्ववत् ॥ ९९७ जातिगुणविशिष्टव्यक्तिवचनत्वेन, शुद्धव्यक्तिवचनत्वेन वा प्रत्यक्षे भवति सामानाधिकरण्यम्, तच्च तत्र द्रव्यम् । एवंविधमपि समानद्रव्यशब्दत्वं स्वत्पक्षे न स्यादिति, नञा तदभावप्रसङ्गं दर्शयति । यत्तु भाष्यकारो विपरीतार्थेन द्रव्यशब्देनैव तदाश्रयगुणलक्षणया नञश्चासमर्थ- समासमङ्गीकृत्य न द्रव्याश्रयवचनः शब्दो भवेत् आकृतिवादिन इत्याह । तदतिक्लिष्टम्, व्यधिकरणनिर्दिष्टगुणप्रयोगाहं चेत्युपेक्षितव्यम् । तत्रापि चैव- मक्षरार्थमात्रसम्भवयोजना । द्रव्याश्रयस्य गुणस्य यः शब्दोऽद्रव्यशब्दः । स आकृतेर्निर्गुणत्वादेकवाक्यसम्बन्धं गोत्वं शुक्लमियादिवन्न प्रतिपद्यते । सामाना- धिकरण्यचोद्यं तु स्वपक्षेऽप्यविशेषात्तदानीमप्यनुपपन्नमेवेति पूर्वैव व्याख्या कर्तव्या ॥ ३१-३२ ॥ न्या० सु०—अद्रव्यशब्दत्वादितिसूत्रं स्वयं तावद्व्याचष्टे - अपि चेति । पूर्वस्मिन्नेव पक्षेऽयमपि हेतुरित्यपि च शब्दस्यार्थः । जातिपक्षे द्रव्यशब्दत्वाभावापत्तेर्व्यक्तेरेव वाच्य- तेत्युक्ते, तदापत्तौ को दोष इत्यपेक्षायाम् - सामानाधिकरण्यं हीत्युक्तम् । ततश्चेत्यर्थे हिशब्दः । श्लोकं व्याचष्टे - गोशब्दादीनामिति । एतदेवोपपादयति - गोत्वस्येति । ननु गोत्वस्य शुक्लादिगुणैः सहैकार्थसमवायलक्षणः सम्बन्धोऽस्तीत्याशङ्क्याह - न हीति । व्यक्तिद्वारस्यैकार्थसमवायस्य व्यक्त्यनभिधाने रूपरसादिशब्दवत्सामानाधिकरण्यानापाद- कत्वात् साक्षात्सम्बन्धेन भाव्यं चासावस्तीति भावः । ननु व्यक्तिपक्षे गोशब्देन जाति-
विशिष्टायाः, तदुपलक्षिताया वा व्यक्तेरभिधानाच्छुक्लशब्देन च गुणविशिष्टायास्तदुपल- क्षिताया वाऽभिधानात्तयोश्चैकत्वे प्रमाणाभावात्कथं सामानाधिकरण्यमित्याशङ्कयाह - मम हीति । व्यक्तिपक्षे सर्वव्यक्त्यभिधानाद् गोशब्दस्य शुक्लायामपि गोव्यक्ती वृत्तेः, शुक्लशब्दस्य च गोजातीयायामपि शुक्लव्यक्तौ वृत्तेरेकार्थसिद्धिः । जातिपक्षे तु व्यक्तेः शब्देनानुक्तत्वाल्लक्ष्यमाणायाश्चैकत्वे प्रमाणाभावाद् गवाश्वशब्दयोरिव भिन्नार्थतेति भावः । (मम हि व्यक्तीति व्यक्तिशब्दः । न तव त्वद्रव्येति द्रव्यशब्दः । उत्तरार्धं पूर्वार्धस्य विपर्ययेणाव्यक्तिशब्दत्वादिति वक्तव्ये द्रव्यशब्दव्यतिकरेण मिश्रणेन गुणशब्दस्य गुणवचनशब्दस्य शुक्लादिशब्दस्य गुणवचनशब्दस्य गुणोपलक्षितद्रव्यवाचित्वमेव न तु गुणवाचित्वमिति व्यक्त्यभिधानपक्षे पूर्वपक्षमते सूचितमित्यन्वयः । व्यक्तिद्रव्यशब्द- व्यतिकरेण इति सूचितमित्यन्वयः । मम हि व्यक्तीति व्यक्तिशब्दः न तव त्वद्रव्यशब्देति च द्रव्यशब्दः तयोः झटित्यन्वयव्यतिरेकयोरेकविषयत्वोपस्थित्यै व्यक्तिशब्दस्य, द्रव्यशब्दस्यैव वा उभयत्र प्रयोज्यत्वौचित्येऽपि तयोः व्यतिकरः भिन्नरूपयोः प्रयोगः । तेन गुणशब्दस्य गुणवचनसंज्ञकशब्दस्य गुणव्यक्तिवाचित्वशङ्काया व्यक्तिवाचित्वपक्षे प्रसक्ता सा१) गुणशब्दस्य गुणोपलक्षितद्रव्यवाचित्वं न तु गुणव्यक्तिवाचित्वं जातिपक्षोक्तदोषसाम्या- दिति सूचितम् । श्लोकं व्याचष्टे-जातीति । ननु गोशब्देन कृष्णादिव्यक्तीनामप्यभिधानाच्छुक्ल- शब्देन चाश्वादिव्यक्तीनामप्यभिधानात्कथं सामानाधिकरण्यमित्याशङ्कया - तच्चेत्युक्तम् । द्रव्यान्तराभिधानेऽपि तस्यापि तावदभिधानात्सा (मानाधिकरण्यसिद्धिरित्यपिशब्दार्थं च शब्दः । नन्वाकृतिपक्षेऽपि तर्हि जातिगुणाभ्यां लक्षितस्य द्रव्यस्यैकत्वमपि सम्भवतोति पाक्षिकं सा२) मानाधिकरण्यं स्यादित्याशङ्क्य - एवंविधमपीत्युक्तम् । व्यक्तिपक्षे भिन्नव्यक्तिवाचित्वेऽप्येकव्यक्तिवाचित्वं नित्यमस्ति । जातिपक्षे तु भिन्नार्थत्वदसङ्कीर्णमध्ये- कद्रव्यशब्दत्वाभावप्रसङ्गादित्येवं साक्षात्सामानाधिकरण्याभावप्रसङ्गाभिधानपरत्वेन व्याख्यानान्तरमाह-इतीति । ननु द्रव्याश्रयस्येति भाष्येण द्रव्यशब्दस्य लक्षणया गुण- परत्वमुक्त्वा, न भवेदिति नञो भवतिनान्वयः कृतः । तत्कमित्यन्यथा भवता व्याख्यात- मित्याशङ्कयाह - यस्त्विति । कथं द्रव्यशब्देन गुणलक्षणेत्यपेक्षायां-तत् द्रव्यमाप्योऽस्ये- त्युक्तम् । भेदाधिष्ठानत्वाच्चाश्रयाश्रयिभावस्य यत्र पदस्य युक्त इति व्यधिकरणत्वेन निर्दिष्टस्य गुणस्य प्रयोगः तदहंत्वमप्यनेनैवोपपादितम् । अतिक्लिष्टत्वोपपादनाथमप्रधान- भूतगुणविपरीतार्थेन प्रधानभूतार्थेन द्रव्यशब्देन लक्षणा । नञश्च भवत्यर्थसापेक्षस्य द्रव्यो- १. अयं पा० २ पु० ना० । २. अयं पा० २ पु० ना० ।
३१-३२ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६६३ पसर्जनत्वेनासार्मथ्यस्य द्रव्यशब्देन—समासाङ्गीकरणमुक्तम् । यद्यपि क्रिया न स्यादिति चेदर्थान्तरे विधानं द्रव्यमिति चेदित्यनुभाषणसूत्रगतो द्रव्यशब्दः षडादिशब्दस्य द्रव्यवाचित्वाभावादगत्या गुणलक्षणार्थो व्याख्यायते, तथापीह द्रव्यशब्देनैव गुणस्य वक्तुं शक्यत्वात्तल्लक्षणाश्रयणं युक्तमित्याशयः । किमेवं सत्ययुक्तमिदं भाष्यमित्याशङ्क्याह— तत्रापि चेति । नात्र द्रव्यशब्देन समस्तस्य नञो भवत्यन्वयो विवक्षितः । किं त्वकार- प्रश्लेषेण गुणशब्देनाद्रव्यशब्द एव सौत्रे व्याख्यानायोक्तः । जातिशब्दस्याप्यद्रव्यशब्दत्वो- पपत्तेः कथं गुणशब्दस्यैवाद्रव्यशब्दतेत्याशङ्कानिराकरणार्थं द्रव्यत्वेन न पर्युदस्ते तदन्या- पेक्षायां द्रव्यैकाश्रयत्वाद् गुण एव शीघ्रमुपतिष्ठते । जातिस्त्वनेकद्रव्यगुणकर्माश्रय- त्वान्न शीघ्रमुपतिष्ठत इत्यद्रव्यशब्देन गुणाभिधानाद् गुणशब्द एवाद्व्रव्यशब्द इति— द्रव्याश्रयस्येत्युक्तम् । नन्वेवं सति नकारान्तराभावान्न द्रव्याश्रयवचन इति भाष्यं कथमित्याशङ्क्याध्या- हारेण योजयितुम् — स आकृतेरित्युक्तम् । स्वरूपेण शब्दस्य निषेधुमशक्यत्वाच्चस्याकृतिः शब्दार्थ इति चानन्तरमभिधानादाकृतिवाचिशब्दसम्बन्धिनश्चेदित्यर्थलाभं मत्वा — एकवाक्यसम्बन्धमित्युक्तम् । नन्वेवं सत्यन्याय्यलक्षणसमर्थंसमासदोषपरिहारादक्षरार्थ- मात्रस्य सम्भवेनैषा योजनेति किमित्युक्तमित्याशङ्क्याह—सामानाधिकरण्येति । षड् गावो देया इति समानाधिकरणनिर्दिष्टगुणशब्दोदाहरणाद् गोशब्दस्याकृतिवाचित्वे तत्सामानाधि- करण्यं षडादिशब्दानां न युज्येतेति पूर्वपक्षिणः सिद्धान्तबोधं प्रतीयते । तच्च भेदाधिष्ठा- नाश्रयाश्रयिभावोक्तेर्निष्कृष्टगुणवचनस्याद्रव्यशब्दत्वावसायात्तस्य च व्यक्तिपक्षेऽपि गुण- व्यक्तिपर्यवसायित्वेन द्रव्यव्यक्तिपरत्वाभावाविशेषात्तदानीमपि क्लेशेनाक्षरार्थयोजनाया- मप्यनुपपन्नमेवेत्यर्थः । का तर्हि सूत्रस्य गतिरित्याशङ्क्याह —इतीति । यास्माभिर्व्यक्तिद्रव्यशब्दव्यतिकरेण व्यक्तिपक्षे गुणोपलक्षितद्रव्यव्यक्तिवाचित्वं गुणशब्दानां सूचयित्वा जातिपक्षे द्रव्यशब्दत्वा- भावात्सामानाधिकरण्यं न सम्भवतीति व्याख्या कृता । सैव युक्ता न तु या भाष्यकृता गुणशब्दस्य व्यक्तिपक्षे गुणव्यक्तिवाचित्वमभिप्रेत्य कृता । तस्मिन्व्याख्याने सामानाधि- करण्याभावप्रसङ्गस्योभयवादिसाम्येनाचोद्यत्वापत्तिरित्यर्थं ॥ ३१-३२ ॥ मा० प्र०—जाति को अभिधेय मानने पर गुणवाचक शुक्ल एवं संख्यावाचक षट् आदि शब्दों का अन्वय नहीं होगा। क्योंकि, जाति, गुण आदि का आश्रय नहीं है। व्यक्ति ही गुण, लिङ्ग, संख्या आदि का आश्रय है। अतः “अरुणया पिङ्गक्ष्यैकहायन्या गवा सोमं क्रीणाति” अर्थात् अरुणवर्ण, पीलीनेत्र एक वर्ष की गौ के द्वारा सोम का क्रयण करना चाहिए, इन स्थलों में अरुण आदि वर्ण, एका देया षड् देया द्वादश
६६४ मीमांसादर्शनम् [ सू० देयाश्चतुर्विंशति देया एक गो छ गाये दें (कात्या० श्रौ० सू० ४।१०।१२, मा० प्र० श्रौ० सू० ५।२।०।१) इत्यादि स्थलों की संख्या का, पशुना यजेत इत्यादि स्थलों में पशुगत पुंस्त्व का अन्वय नहीं हो सकता है, अतः जाति वाच्य नहीं है । “अद्रव्यशब्दत्वात्” = द्रव्यशब्द अर्थात् द्रव्याश्रित गुण आदि शब्दों का अन्वय न होने से जाति अभिधेय नहीं है ॥ ३१ ॥ भा० प्र० — जाति वाच्य नहीं हो सकता है, इस प्रसङ्ग में हेतु का प्रदर्शन करते हुए पूर्वपक्षी ने कहा है कि “यदि पशुरुपाकृतः पलायेत, अन्यं तद्वर्णं तद्वयसमालभेत” (कात्या० श्रौ० सू० २५।९।१) यदि मन्त्र उच्चारण के साथ कुशा से स्पर्श किया गया पशु भाग जाय तो उसी वर्ण के उसी अवस्था वाले अन्य पशु का आलम्भन यज्ञ में करें । इस वेदवाक्य में अन्य शब्द का स्पष्ट निर्देश मिलता है, जाति को वाच्य मानने पर जाति एक होने से अन्य पशु द्रव्य सम्भव नहीं है, अतः व्यक्ति शब्द का अभिधेय है,—यही युक्तिसङ्गत है । “अन्यदर्शनात्” = अन्य शब्द का प्रयोग देखा गया है ‘च’ = और यह पूर्वपक्ष है ॥ ३२ ॥ आकृतिस्तु क्रियार्थत्वात् ॥ ३३ ॥ सि० शा० भा०—तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । आकृतिः शब्दार्थः । कुतः ? क्रियार्थत्वात् । श्येनचितं१ चिन्वीत इति वचनमाकृतौ सम्भवति यद्याकृत्यर्थः श्येनशब्दः । व्यक्तिवचने तु न चयनेन श्येनव्यक्तिरुत्पादयितुं२ शक्यत इति, अशक्यार्थवचनादनर्थकः । तस्मादाकृतिवचनः । ननु श्येनव्यक्तिभिश्चयनमनुष्ठास्यते ? न साधकतमः श्येनशब्दार्थः, ईप्सित- तमो ह्यसौ श्येनशब्देन निर्दिश्यते । अतश्चयनेन श्येनो निर्वर्तयितव्यः ।३ स आकृतिवचनत्वेऽवकल्प्यते । ननूभयत्र४ क्रियाया असम्भव एव व्यपदिश्यते । नाऽऽकृतिः शब्दार्थः । कुपः ? क्रिया न सम्भवेदाकृतौ शब्दार्थे, व्रीहीन् प्रोक्षति इति । तथा न व्यक्तिः शब्दार्थः, क्रियैव न सम्भवेद् व्यक्तेः५ शब्दार्थत्वे, श्येनचितं चिन्वीत इति । १. तै० सं० ( -४-११) । २ ब. व्यक्तिरूपमादातुं । ३. अत्र च, इष्टकाभिश्चीयमानं श्येनसदृशं चयनेन सम्पादनेदित्येवं विध्यर्थो भाष्यकाराणा- मभिप्रेतः । ग तु यथाश्रुतः श्येनाकृतिव्यक्त्योश्चयनेनोत्पादयितुमशक्येति । ४ ग. उभयत्र । ५ ब. व्यक्तौ शब्दार्थे ।
३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६६५ यद्युच्येत 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इति व्यक्तिलक्षणार्थाऽऽकृतिरिति, शक्यमन्यत्रापि श्येनचितं चिन्वीत इति वदितुमाकृतिलक्षणार्था व्यक्तिरिति । किं पुनरत्र ज्यायः ? आकृतिः शब्दार्थ इति । यदि व्यक्तिः शब्दार्थो¹ भवेद्, व्यक्त्यन्तरे न प्रयुज्येत । अथ व्यक्त्यन्तरे प्रयुज्यते, न तर्हि व्यक्तिः शब्दार्थः । सर्वसामान्यविशेषविनिर्मुक्ता हि व्यक्तिरित्युच्यते । नैष दोषः । सर्वसामान्यविशेषविनिर्मुक्त एव² वर्तिष्यते । यदि व्यक्त्यन्तरे सर्वसामान्य- विशेषवियुक्ते³ प्रवर्तिष्यते, सामान्यमेव तर्हि तत् ? नेत्युच्यते । यो ह्यर्थः सामान्यस्य, विशेषाणां चाऽऽश्रयः सा व्यक्तिः, व्यक्तिवचनश्च शब्दो न सामान्ये, न विशेषे वर्तते, तेषां त्वाश्रयमेवाभिदधाति⁴ । तेन व्यक्त्यन्तरे वृत्तिरदोषः । न हि तत्सामान्यम् । यदि व्यक्त्यन्तरेष्वपि भवति, सर्वसामान्यविशेषवियुक्तायामश्वव्यक्तौ गोशब्दः किमिति न वर्तते । आह—येष्वेव प्रयोगो दृष्टः तेषु वर्तिष्यते, न सर्वत्र । न चाश्वव्यक्तौ गोशब्दस्य प्रयोगो दृष्टः । तस्मात्तत्र⁵ न वर्तिष्यते । यदि यत्र प्रयोगो दृष्टः तत्र वृत्तिः, अद्य जातायां गवि प्रथमप्रयोगो न प्राप्नोति, तत्रा- दृष्टत्वात् । सामान्यप्रत्ययश्च न प्राप्नोति, इयमपि गौरिति, इयमपि गौरिति । इयं वा गौरिति, इयं वा⁶ गौरिति स्यात् । भवति तु सामान्यप्रत्ययोऽदृष्ट- पूर्वायामपि गोव्यक्तौ । तस्मान्न प्रयोगापेक्षो गोशब्दो व्यक्तिवचन इति शक्यत आश्रयितुम् । एवं तर्हि⁷ शक्तेः स्वभाव एषः, यत् कस्यांचिद् व्यक्तौ वर्तते, कस्यांचिन्न । यथा—अग्निरुष्णः, उदकं शीतम्, एवमेतद् भविष्यतीति । नैवं सिध्यति । न ह्येतद् गम्यते कस्यांचिद्⁸ व्यक्तौ वर्तते, कस्यांचिन्नेति । सत्यमेतत् । गोत्वं लक्षणं भविष्यतीति । यत्र गोत्वम्, तस्यां व्यक्ताविति । एवं तर्हि विशिष्टा व्यक्तिः प्रतीयेत । यदि च विशिष्टा, पूर्वतरं विशेषणमव- गम्येत⁹ । न ह्यप्रतीते विशेषणे विशिष्टं केचन प्रत्येतुमर्हन्तीति । १ ब. शब्दार्थो व्यक्त्यन्तरे । २ ब. एव वर्तिष्यते । ३ ब. विशेषविनिर्मुक्त एव वर्तिष्यते । यदि सामान्यविशेषवियुक्तं (इत्यधिकम्) । ४ ब. मेवाभिवदति । ५ ब. तस्मान्न तत्र । ६ ब. इयंवेति स्यात् । ७ ब. तर्हि स्वेभाव एव यत्तु । ८ ब. कस्यां व्यक्तावतंते कस्यां नैति । यत्र गोत्वम् । ९ ब. विशेषोवगम्यते । न हांप्रतीतविशेषे ।
६६६ मीमांसादर्शनम् [ सू० अस्तु विशेषणत्वेनाऽऽकृतिं वक्ष्यति, विशेष्यत्वेन व्यक्तिम् । न ह्याकृति- पदार्थकस्य१ व्यक्तिर्न पदार्थः, व्यक्तिपदार्थकस्य२ वा नाऽऽकृतिः । उभयमुभयस्य३ पदार्थः । कस्यचित् प्राधान्येन विवक्षितं भवति, तेनात्राऽऽकृतिर्गुणभावेन, व्यक्तिः प्रधानभावेन विवक्ष्यत४ इति । नैतदेवम् । उभयोरुच्यमानयोर्गुणप्रधानभावः स्यात् । यदि चात्राऽऽकृतिः प्रतीयते शब्देन, तदा५ व्यक्तिरपि पदार्थ इति६ न शक्यते वदितुम् । कुतः ? आकृतिर्हि व्यक्त्या नित्यसम्बद्धा, सम्बन्धिन्यां च तस्यामवगतायां सम्बन्ध्यन्तर- मवगम्यते । तदेतदात्मप्रत्यक्षम्७, यच्छब्द उच्चारिते८ व्यक्तिः प्रतीयत इति । किं शब्दात्, उताऽऽकृतेरिति विभागो न प्रत्यक्षः । सोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यामव- गम्यते । अन्तरेणापि शब्दं य आकृतिमवबुध्येत, अवबुध्येतैवासौ व्यक्तिम् । यस्तूच्चरितेऽपि९ शब्दे मानसादपचारात् कदाचिदाकृतिं१० नोपलभेत, न जातु- चिदसाविमां११ व्यक्तिमवगच्छेत् । ननु व्यक्तिविशिष्टायामाकृतौ वर्तते । व्यक्ति- विशिष्टायां चेद् वर्तेत, व्यक्त्यन्तरविशिष्टा न प्रतीयेत । तस्माच्छब्द आकृति- प्रत्ययस्य निमित्तम् । आकृतिप्रत्ययो व्यक्तिप्रत्ययस्येति । ननु गुणभूता प्रतीयेत इत्युक्तम् । न गुणाभावोऽस्मत्पक्षस्य१२ बाधकः । सर्वथा तावत् प्रतीयते । अर्थाद् गुणभावः, प्रधानभावो वा । स्वार्थं चेदुच्चार्यते, प्रधान- भूता । अथ न स्वार्थम्, परार्थमेव, ततो गुणभूता । न तत्र शब्दव्यापारोऽस्ति । ननु च दण्डीति, न तावद् दण्डिशब्देन दण्डोऽभिधीयते, अथ च दण्ड- विशिष्टोऽवगम्यते । एवमिहापि न तावदाकृतिरभिधीयते, अथ चाऽऽकृतिविशिष्टा व्यक्तिर्गम्येतेति । नैतत्साधु उच्यते । सत्यं दण्डिशब्देन दण्डो नाभिधीयते, न त्वप्रतीते दण्डे दण्डिप्रत्ययोऽस्ति । अस्ति तु दण्डिशब्दैकदेशभूतो१३ दण्डशब्दः, येन दण्डः प्रत्यायितः । तस्मात् साध्वेतद्यत्१४ प्रतीते विशेषणे१५ विशिष्टः प्रतीयते इति । न१६ तु१७ गोशब्दावयवः कश्चिदाकृतेः प्रत्यायकः, अन्यो व्यक्तेः यत उच्येत, १ ब. पदार्थस्य । २ ब. व्यक्तिपदार्थस्य । ३ ब. उभय उभयस्य । ४ ब. भावेनवक्ष्यत । ५ ब. न तदा । ६ ब. इति शक्यं वक्तुं । ७ ब. तदेतत्प्रत्यक्षम् । ८ ब. उच्चारिते । ९ ब. यस्तूच्चारिते । १० ब. कदाचिन्नाकृतिमुप । ११ ब. दसौ व्यक्ति । १२ ब. प्रत्यक्षस्य । १३ ब. दण्डिशब्दे एकदेशभुतो । १४ ब. साध्येतत् प्रतीयते । १५ ब. विशेषणविशिष्टं । १६ ब. न गोशब्दावयवः । १७ क. ननु ।
पादनात् कथं तेनैव तेषामेवाकृत्यर्थत्वसाधनमित्याशङ्क्य विषयान्तरे तावत्सूत्रं
३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६६७ तत आकृतिरवगता, न गोशब्द आकृतिवचन इति । न च यथा दण्डिशब्दो न दण्डे प्रयुक्तः, एवं गोशब्दो नाऽऽकृतौ । तर्थमेव निदर्शितं केवलाकृत्यभिधानः श्येनशब्द इति । तदेवमन्वयव्यतिरेकाभ्यामसति श्येनव्यक्तिसम्बन्धे श्येनशब्दो- च्चारणादाकृतिवचन इति गम्यते । न तु व्रीह्याकृतिसम्बन्धमन्तरेण व्रीहिव्यक्तौ शब्दस्य प्रयोगो दृष्टः । तस्मादाकृतिवचनः शब्दः इत्येतज्ज्यायः ॥३३॥ सिद्धान्तः । भा० वि०—सिद्धान्तमाह—इति । तदक्षराणि व्याचष्टे—तुशब्द इत्या- दिना । ननु क्रियार्थत्वे नालम्भनप्रोक्षणादिवाक्यं पश्वादिपदानां व्यक्त्यर्थत्वोप- पादनात् कथं तेनैव तेषामेवाकृत्यर्थत्वसाधनमित्याशङ्क्य विषयान्तरे तावत्सूत्रं योजयति—श्येनचितमिति । यद्ययमांकृतिवचनः श्येनशब्दः स्यात्, तर्ह्येव श्येन- चितं चिन्वीतेति विहितं चयनमाकृतौ जात्युपाधौ संभवतीत्युपस्कृत्यान्वयः । अत्र हि मुख्यश्येनाकृतिव्यक्त्योरिष्टकाभिश्चेतुमशक्यत्वादिटकासाध्यं श्येनसदृशम् अग्न्याख्यं फलं श्येनशब्दार्थः । तत्र च नियतैकव्यक्तिसादृश्यस्य सम्पादयितुम- शक्यत्वात्, यया कया च व्यक्त्या सादृश्यमुपादेयम्, तस्य चाकृतिमात्रप्रयुक्तत्वा- दाकृतिवचन एव श्येनशब्द इत्याशयः । नियतैकव्यक्तिसादृश्यं कस्मादशक्य- सम्पादकमत आह—व्यक्तिवचने त्विति । श्येनव्यक्तिरिति तत्सादृश्यं लक्ष्यते । चिन्वीतेति विहितस्येष्टकाचयनस्य नियतैकव्यक्तिसादृश्यसम्पादनाक्षमत्वादिति भावः । ननु व्यक्तिसादृश्यस्यासम्पाद्यत्वेऽपि व्यक्तिवचनता शब्दस्य कस्मान्न भवेदत आह—अशक्यार्थेति । यस्मादानर्थक्यं व्यक्तिवचनत्वे स्यात्, तस्मादित्युपसंह- रति--तस्मादिति । ननु मुख्यश्येनव्यक्तेश्चयनोत्पाद्यत्वाभावेऽपि तदुत्पादकत्वेन विधेयत्वात् श्येने- श्चितं श्येनचितमिति व्युत्पत्तिसम्भवात् न सादृश्यार्थतयाकृतिवचनता श्येनशब्द- स्याश्रयणीयेति चोदयति—ननु चेति । चयनस्यैकव्यक्तिसाध्यत्वाभावात् बहुवचनं श्येनशब्दार्थस्येप्सिततमत्वावगमान्न साधनत्वेन विधिसंभवतीत्याह—न साध- कतम इति । हि शब्दः स्मृतिप्रसिद्धिमवद्योतयति कर्मणि हन् इत्यस्मात् कर्मणी- त्यधिकृत्य “कर्मण्यग्न्याख्यायाम्” इति सूत्रेण कर्मण्युपपदे कर्मणि च वाच्ये चिनोतेः धातोः क्विप्प्रत्ययस्मरणेन क्विबन्तचिनोत्युपपदस्य श्येनशब्दस्य कर्म- वाचित्वात् कर्मणश्चेप्सिततमत्वान्न तदर्थस्य श्येनशब्दस्य साधकतमार्थता युक्ते- त्याशयः, यत ईप्सिततमः श्येनः, न साधकतमः । अतः चयनेन श्येनो निर्वर्त- यितव्यः, न श्येनेश्चयनमित्याह—अत इति । एवं च श्येन इव चीयत इति
६६८ · मीमांसादर्शनम् [ सू० श्येनचित् तं चयनेन भावयेत् इति सादृश्यार्थत्वस्यावश्याश्रयणीयत्वात् आश्रय- णीयाकृतिवचनतेत्याह—स आकृतिवचनत्व इति । तच्छब्द कर्मभूतश्येनविषयः । एवं सूत्राक्षरार्थमुक्त्वेदानीं तात्पर्यार्थं दर्शयितुमाक्षिपति—तावदुभयत्रेति । असंभव इति च्छेदः । व्यपदेशं विशदयति—नाकृतिरिति । व्यक्तिवादिना आकृतौ शब्दार्थे व्रीहीन् प्रोक्षतीत्यत्र क्रियाया असंभवमात्रं व्यपदिश्यते । न तु श्येनचितं चिन्वीतेत्यत्र व्यक्तौ क्रियासंभवोऽपि, आकृतिवादिनापि चिन्वीतेत्यत्र व्यक्तौ क्रियाया असंभवमात्रम्, न तु प्रोक्षतीत्याकृतौ तत्संभवः, तेनोभयपक्षान्निर्णयः इत्यर्थः । सिद्धान्त्यभिमतं स्वपक्षे विशेषमनुवदति--यदप्युच्येत इति । सर्वत्रा- कृतिश्शब्दार्थः । व्रीहीन् प्रोक्षतीत्यत्र क्रियान्वययोग्यव्यक्तिलक्षणेति नाकृतिपक्षे काचिदनुपपत्तिरित्यर्थः, सर्वत्र व्यक्तिरेव शब्दार्थः, चयनवाक्ये तु कार्यान्वय- योग्याकृतिलक्षणेति पूर्वपक्षिणा शक्यं वदितुमित्याक्षेप्ता दूषयति-शक्यमत्रापीति । ननु तथाप्यन्यतरेणोपपत्तिमन्तरेण भाव्यमित्याशङ्कय व्यक्तिपक्ष एवोपपत्त्य- तिशयं सूचयितुमाह—किं पुनरिति । आलम्भनप्रोक्षणादिवाक्यानां बहुतवाच्चये- नवाक्यस्य चैकत्वात् बहुनुरोधेन चैकत्र लक्षणाश्रयणस्य न्याय्यत्वात् सङ्ख्या- कारकान्वयसंभवाच्च व्यक्तिपक्ष एव ज्यायानित्यर्थः । एवमुपपत्तिमत्तरत्वेनाक्षेप्तृपूर्वपक्षे पर्यवसायिते तुशब्दसूचितमाकृतिपक्षस्यै- वोपपत्तिमत्तरत्वमादर्शयन् सिद्धान्ती परिहरति—आकृतिरिति । ज्याय इत्य- नुषङ्गः गामानयेत्युक्ते प्रथमं सामान्याकारप्रत्ययोदयात् विचित्रव्यक्तिबुद्ध्य- नुदयाद् व्यक्तीनां यथारुचि परिग्रहात् संबन्धग्रहणासंभवाच्च सर्वव्यक्त्यर्थत्वा संभवादाकृतिरेव शब्दार्थ इति भावः । अस्तु तर्ह्यैका व्यक्तिरभिधेयेति तत्राह— यदीति । व्यक्त्यन्तरेऽभिधेयरूपस्याभावादिति भावः । ननु केनचित्सामान्येन व्यक्त्यन्तरे प्रयोगो भविष्यतीत्याशङ्कयाह—अथेत्या- दिना । कुत इत्यत आह—सर्वेति । सर्वसामान्यविशेषेभ्यो वियुक्ता विभक्ता व्यतिरिक्तेति यावत्, असाधारणरूपत्वाद् व्यक्तेरिति भावः । ननु यथैका व्यक्तिस्सर्वसामान्यविशेषाद् व्यतिरिक्ता, तथा अपरापि, तेन तत एव सादृश्याद् व्यक्त्यन्तरे वर्तिष्यत इति शङ्कते—नैष दोष इति । उत्तरम्— यदीति । यदि व्यक्त्यन्तरमपि सामान्यविशेषव्यतिरिक्तम् । तदा सामान्यमेवानु- वृत्तत्वात् सामान्याविशेषव्यतिरिक्तत्वं नामेति तस्यैवाभिधेयत्वप्रसङ्ग इत्यर्थः । शङ्कते—नेत्युच्यत इति । इतिरेवंशब्दपर्यायः । नैव व्यक्त्यन्तरे सामान्यविशेष- विनिर्मुक्तत्वं निमित्तीकृत्य शब्दः प्रवर्तते इति एवं मयोच्यत इत्यर्थः । कथं
३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६६९ तर्ह्युच्यत इत्यपेक्षायामाह—योऽर्थ इति । सामान्यविशेषाश्रय शब्देन सामान्य- विशेषव्यतिरिक्तं लक्ष्यते, तेन सामान्यविशेषव्यतिरिक्तत्वेनोपलक्षणेनोपलक्षितो योऽर्थः, तस्माद् व्यक्तिः, सैव चाभिधेयेति मयोच्यत इत्यर्थः । ननु व्यक्तेः सामान्यविशेषाश्रयत्वे तयोस्तदन्तर्गतत्वात् कथं सेवाभिधेयेति, तत्राह—व्यक्तिविषयश्चेति । सत्यप्याश्रयाश्रयिभावे निष्कृष्याश्रयमेवाभिवद- तीत्याह—तेषान्विति । शङ्कामुपसंहरति—तेनेति । सामान्यशब्दो विशेषस्या- प्युपलक्षणार्थः । सामान्यविशेषव्यतिरिक्तत्वाद् व्यक्त्यन्तरस्यापीत्यर्थः । परिहरति- यदीत्यादिना । सामान्यविशेषव्यतिरिक्तस्योपलक्षणस्य गोव्यक्त्यन्तरवदश्वव्यक्ता- वपि भावात्तत्रापि वर्त्तेतैवेत्यर्थः अतिप्रसङ्गं परिहरन्नाशङ्कते—आहेति । केवल- स्योपलक्षणस्याश्वा दिव्यक्तावभावान्नातिप्रसक्तिरित्यर्थः । तर्हि यत्र प्रयोगो न दृष्टः, तस्यां गोव्यक्तौ न वर्त्तेत । इतरथाश्वव्यक्तावपि वर्त्तेतेति दूषयति—यदीत्यादिना । किंचानुगतैकनिमित्ताभावे गौर्न पदा ऽस्प्रष्टव्या इत्यादिप्रयोगमात्रेण गोव्यक्तिष्वनु- गतैकाकारप्रत्ययो न स्यात् । अक्षशब्दप्रयोगमात्रेण विदेवनादिष्वदर्शनात् । किंतु अनियतैकव्यक्तिविषयत्वात् सन्देह एव स्यादिति, अत्राह—सामान्यप्रत्यय- श्चेति । अपूर्वगोदर्शनेऽपि नेयं पदा स्प्रष्टव्येति प्रत्ययदर्शनान्नेदमिष्टापादक- मित्याह—अवांत त्विति । प्रयोगस्यानियामकत्वे फलितमाह—तस्मादिति । अस्तु तर्हि शक्तेः नियामकत्वमिति चोदयति—एवं तर्हीति । यस्यां व्यक्तौ शब्दस्य शक्तिः तत्र वर्तते, नेतरत्रेति तस्य स्वभाव इत्यर्थः । शक्तेर्वा कथं प्रतिनियमः इत्याशङ्कायां औष्ठ्यादिवत्तदनुभवादित्याह—यथेति । नैवमपि प्रयोगप्रवृत्ति- व्यवस्था सिद्ध्यतीति परिहरति—नैवमिति । कुत इत्याशङ्क्यौष्ठ्यादिप्रति- नियमवत् शक्तिप्रतिनियमस्याप्रत्यक्षतया प्रयोगप्रवृत्त्यनुमेयत्वेन प्राक् प्रयोगादे- रविज्ञेयस्य प्रयोगव्यवस्थापकत्वानुपपत्तेरित्याह—न ह्येतदिति । अस्तु तर्हि जातिनिबन्धना प्रयोगव्यवस्थेति चोदयति-सांख्यमेतदिति१। अवगन्तुमिति विपरिगतस्यानुषङ्गः । कथमित्याह—गोत्वमिति । यंत्र गोत्वमुपलक्षणम्, तत्र गोशब्दो वर्तिष्यते, यत्र तन्नास्ति । न तत्राश्वादिव्यक्ताविति शक्यमवगन्तु- मित्यर्थः । अपसिद्धान्तापत्त्या दूषयति—एवं तर्हीति । व्यक्तिमात्रप्रतीतौ गोत्वो- पलक्षितत्वाप्रतीतेरिति भावः । ततः किमत आह—यदि चेति । कुत इत्यत आह—नहीति । ततश्च पूर्वतरमवगताया आकृतेरेव शब्दार्थत्वापात इति भावः । एवं केवलव्यक्त्यभिधानपक्षे निरस्ते पूर्ववादी द्वितीयं प्रकृतिविशिष्टव्यक्त्य- भिधानपक्षमुपन्यस्यति—अस्त्विति । आकृत्यभिधानमात्रमङ्गीकरोति कथमुभया- १. सत्यमेतदिति मु. भा. यु. पा. ।
६७० मीमांसादर्शनम् [ सू० भिधाने व्यक्त्यभिधानपक्षः ? तत्राह—विशेषणत्वेनेति । व्यक्तेः प्राधान्या- दित्यर्थः । एतदेव विवृणोति—नहीति । उभयमुभयस्येति । एवं हि सत्युभय- प्रतीतिः चयनालम्भनादिक्रियोपपत्तिश्च भविष्यतीत्याशयः । कस्तर्हि विवाद- स्तत्राह—कस्यचित्त्विति । आकृतिवादिनः आकृत स्वरूपम्, व्यक्तिवादिनस्तु तदित्यर्थः । फलितमाह— तेनेति । विवक्ष्यत इति सम्बन्धः । न व्यक्त्यभिधान- पक्षक्षतिरिति शेषः । उभयोरुच्यमानत्वे गुणप्रधानभाव एव निष्प्रमाणक इति परिहरति—नैतदेवमिति । उभयाभिधानमपि न संभवतीत्याह— यदि चेति । विशेषणतयाकृतेः पूर्वमभिधेयत्वे, तत्रैवंशब्दस्योपक्षीणत्वादिति भावः । ननु जातिप्रतीतेर्विना व्यक्तिमपर्यवसानाद् व्यक्तेश्च कार्यानन्वयितया प्रत्येतव्य- त्वात् सापि शब्दार्थ एवेत्याक्षिपति—कुत इति । अनन्यलभ्यस्य शब्दार्थत्वात् व्यक्तेश्चाकृतिसम्बन्धादपि प्रत्येतुं नास्याः शब्दार्थतेति समाधत्ते—आकृति- रिति । आकृत्यवगतेः व्यक्त्यवगतिं विना पर्यवसानाभावाद् सैव व्यक्तेरवगतिः । न चैवं व्यक्तेरपि वाच्यत्वप्रसङ्गः अनिर्धारितरूपाया एव तस्या अवगमान्निर्धा- रितरूपाया अर्थप्रकरणादिलभ्यत्वादाकृतेस्तु निर्धारितरूपत्वात् सैव शब्दार्थ इति भावः । ननु शब्दाकृतिप्रत्ययसन्निधाने व्यक्तिप्रत्ययस्य आकृतिप्रत्यय एव हेतुः । न शब्द इति कथं निश्चय इति चोदयति—तदेतदित्यादिना । न प्रत्यक्षः न स्फुट इति यावत् । परिहरति—सोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यामिति । व्यक्तिप्रतीतेराकृति- प्रतीत्यन्वयव्यतिरेकानुविधायित्वाच्छब्दान्वयव्यतिरेकानुविधानाभावाच्च स विभागो लभ्यत इत्यर्थः । तत्राकृतिप्रत्ययान्वये व्यक्तिप्रत्ययान्वयमाह—अन्तरेणा- पीति । प्रत्यक्षादिप्रमाणान्तरेणापीति भावः । अनेनैव शब्दव्यतिरेके व्यतिरेका- भावोऽपि दर्शितः । आकृतिप्रत्ययव्यतिरेके व्यक्तिप्रत्ययव्यतिरेकमपि दर्शयति-- यस्त्विति । मानसव्यभिचारो अनेकाग्रतादिः । यथा हि कदाचिदाकृतिं स्वतन्त्रा- मवबुध्यते, शब्दात् नैवमाकृतिमबुद्ध्वा व्यक्तिं कदाचिदपीति भावः । भवत्वन्वयव्यतिरेकाभ्यामाकृतिप्रत्ययस्यैव व्यक्तिप्रत्ययनिमित्तत्वादाकृतिः शब्दार्थः तथापि व्यक्तिधर्मत्वेन तन्निरपेक्षायाः प्रतीत्ययोगात् व्यक्तिविशिष्टैवाकृतिः शब्दार्थो भविष्यतीति शङ्कते—ननु व्यक्तीति । यदि व्यक्तिविशिष्टा जातिरभिधी- येत । तदा व्यक्तिपक्षोक्तदोषो व्यक्त्यन्तरे प्रयोगासिध्यादिरूपः प्राप्नोतीति परिहरति—व्यक्तिविशिष्टायाश्चेदिति । व्यक्तिविशिष्टाना मपि व्यक्तिवदनेकत्वा-
३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६७१ दितिभावः । यस्मादनुगतस्यैव शब्दशक्तिप्रतियोगित्वं तस्मादाकृतिरेवानुगता शब्दार्थः । व्यक्तिप्रत्ययस्तु तदन्तर्भाविनेति निगमयति-तस्मादिति । यदुक्तम्-आकृतेरनुवृत्तत्वेऽपि विशेषणतया गुणभूतत्वादन्येन केनचित्प्रधान- भूतेन भवितव्यमिति प्रधानं व्यक्तिः शब्दार्थः इति, तदनुवदति-नन्विति । शब्दात्प्रतीयमानस्य शब्दार्थत्वादाकृतेश्च तथाभावात्सैव शब्दार्थ इति परिहरति- न गुणभाव इति । ननु शब्दात्प्रतीयमानोऽपि गुणभूतैवाकृतिः प्रतीयत इति कथं शब्दार्थोऽत आह-अर्थादिति । अर्थः-सामर्थ्यम् । एतदेव विवृणोति स्वार्थश्चेदिति । चयनवाक्ये श्येनशब्दस्याकृत्यर्थत्वादाकृतिः प्रधानभूता । प्रोक्षणवाक्ये तु व्रीहि- शब्दस्य व्यक्तिपरतया गुणभूता न गुणत्वप्रधानत्वयोः शब्दस्य व्यापार इत्यर्थः । एवं व्यक्त्यन्तरे प्रयोगानुपपत्त्या व्यक्त्यर्थत्वनिराकरणेनाकृत्यर्थत्वे समर्थिते परः स्वोक्तमाकृत्युपलक्षितत्वपक्षमुत्थापयति-नन्विति । दण्डीत्यत्र तावदिनि- प्रत्ययान्तेन दण्डिशब्देन न दण्डोऽभिधीयते । तथापि दण्डविशिष्टः प्रतीयते । एवमिहापि नाकृतिरुपलक्षणभूताभिधीयते । व्यक्तयस्तु तदुपलक्षिताः अभिधीयन्ते इति न व्यक्त्यन्तरे प्रयोगानुपपत्तिरित्यर्थः । आकृतिविशिष्टा आकृत्युपलक्षितेति- यावत् । न चाकृतेरुपलक्षणभूताया दण्डो विशेषणभूतः कथं दृष्टान्तस्स्यादिति वाच्यम्; व्यावर्तकत्वसाम्येन विशेषणोपलक्षणयोः दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभावोपपत्ते- रित्यवसेयम् । तदेतद् दूषयति-नैतदित्यादिना । दृष्टान्तेऽपि किमिति प्रत्ययेना- भिहितोऽपि दण्डो विशेषणमित्युच्यते किं वा अप्रतीतोऽपीति तत्राद्यमङ्गीकरोति- सत्यमिति । द्वितीयं प्रत्याह-न त्विति । केन तर्हि दण्डः प्रत्यायितस्तत्राह- अस्ति तत्रेति । द्वितीयपक्षनिरासफलमाह-तस्मादिति । इहापि तर्हि गोशब्दावयवो गोत्वप्रत्यायकोऽस्तु तत्राह-न त्विति । यतोऽवयवसद्भावाद् हेतोः ततोऽवय- वादाकृतिरवगता न गोशब्द आकृतिवचन इत्युच्येत, सोऽवयवो नास्तीति योजना, तेनास्याखण्डशब्दत्वेनावयवाभावादप्रतीतस्य चाविद्यमानकल्पत्वेनोपलक्षणत्वा- भावादनेनैव गोत्वप्रतीतिराश्रयणीयेति भावः । ननु यथा दण्डिशब्दस्य दण्डे प्रयोगाभावादेव विशिष्टवचनत्वमेवं गोशब्द- स्यापि कल्प्यताम्, अत आह - यथेति । नाकृतावप्रयुक्तः किं तु प्रयुक्त एवेत्यर्थः । कथमाकृतौ प्रयुक्तस्तत्राह-तदर्थमेवेति । सर्वत्राकृतौ प्रयोगप्रतिपादनाय हि श्येनशब्दस्याकृत्यर्थता दर्शितेत्यर्थः । केवलशब्दः प्राधान्याभिप्रायः । श्येनशब्द- प्रयोगस्याकृतिप्राधान्यमुक्तमुपजीव्य शब्दानामाकृत्यर्थत्वे हेत्वन्तरमाह-तदित्या-
६७२ मीमांसादर्शनम् [ सू० दिना । यथा सत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां चाकृतिवचन इति गम्यत इति सम्बन्धः । तत्र व्यक्त्यन्वयं विनैवाकृत्यन्वये प्रयोगान्वयमुदाहरति—असतीति । व्यक्त्यन्व- येऽप्याकृतिव्यतिरेके प्रयोगव्यतिरेकमाह—न त्विति । व्रीहिशब्दो भावप्रधानः, पूर्वं व्यक्तिप्रतीतेराकृतिप्रत्ययाधीनत्वेऽन्वयव्यतिरेकावुक्तौ । इदानीं चाकृतिप्रत्य- यस्य शब्दाधीनत्वम् इति भेदः । सूत्रतात्पर्यार्थमुपसंहरति---तस्मादिति ॥ ३३ ॥ त० वा०—किं च १ नैवेष्टकाभिराकृतिसम्पादनमभ्युपगतम्, यतः स्वभावा- त्स्नाय्वाद्यारब्धद्रव्यसमवायित्वेनोपालम्भः स्यात्, पिष्टपिण्डसिंहवत्साद्दश्यसंपत्तिः पक्षद्वयेऽपि चोदनार्थः । सा त्वाकृत्यन्तरविलक्षणश्येनाकृत्या स्यात्, न तु व्यक्त्यन्तर- विलक्षणश्येनविशेषेणाऽसाधारणेन वा । निर्विकल्पत्वात्सामान्यविशेषानपेक्षं व्यक्ति- मात्रसादृश्यमविधेयम्, सर्वद्रव्येषु तुल्यत्वात् । एकव्यक्तिपरिग्रहाच्च व्यक्त्यन्तरेण सादृश्यं न कार्यं स्यात् । तस्माच्छ्येनचित्क्रिया व्यक्तौ शब्दार्थे न सम्भवति । न साधकतम इति । न ह्येवं स्मृतिः श्येनेश्चीयत इति श्येनचित्, कर्मण्यन्त्या- ख्यायाम्' (पा. सू. ३।२।९२) इति हि सा । श्येनं चयनेन साधयेदितीप्सिततमत्वम् । तत्रापि मुख्यासम्भवात्सादृश्यपरिग्रहः असाधारणे २ शब्दप्रवृत्त्यसम्भवात्, अव्यपदेश्यत्वेन च सर्वत्राविशेषात्, सामान्याकारेण च निरूपणे विकल्पात्, व्यापकापेक्षया, व्याप्यसामान्यस्य नैव ३ विशेषव्याप्यापेक्षयेतरत्राऽऽकृतिः । तत्र विशेषपक्षे सम्बन्धनानन्वाख्यान-व्यभिचार-सामान्यबुद्ध्यभाव-प्रत्यर्थशक्तिकल्पनादयो दोषाः । न च यत्र संशयः तत्प्रत्याय्यः भवतीति निर्विषयता शब्दस्य । एतेन स्वतन्त्रोभयाभिधानमार्गः प्रत्युक्तः । व्यक्तिविशिष्टाकृतिमार्गोऽपि । 'नागृहीतविशेषणा' इति न्यायाद् व्यक्तेः प्रथमग्रहणप्रसङ्गात् । सम्बन्धसमुदाय- योरपि स्वरूपप्रत्ययाभावात्सर्वत्र चाविशेषादवश्यं सम्बन्धिसमुदायिविशेषणताऽ- भ्युपगन्तव्या भवति । तत्रापि शक्तित्रयकल्पना । व्यक्त्यंशे चोक्तदोषप्रसङ्गः । न च व्यक्त्याकृत्योर्भिन्नकार्ययोर्गुणप्रधानानावस्थयोः समुदायोपगमनं युक्तम्, अनत्यन्तभेदाच्च । भिन्नधर्मौ सम्बन्धसमुदायौ न युक्तौ । १. 'अन्यदर्शनाच्च' इति पूर्वपक्षसूत्रगतं भाष्यं स्पष्टत्वादुपेक्ष्य, 'आकृतिस्तु क्रियार्थत्वात्' इति सिद्धान्तसूत्रगतं 'श्येनचितं चिन्वीत' इति वचनमाकृतौ सम्भवतीति भाष्यं यथाश्रुतार्थमसङ्गतमिव मन्वानो दृष्टत्वेन बुद्धिस्थं दूषयितुमुपक्रमते-किंचेत्यादिना । २. असाधारणेत्यारभ्येतरत्राऽऽकृतिरित्यन्तो वार्तिकग्रन्थः यथा आकृतिः शब्दार्थः इत्या- रम्य-शक्यत आश्रयितुमित्यन्तमभाष्यग्रन्थव्याख्यानार्थस्तथा न्यायसुधायां विस्तारः । ३ क. नैवं ।
३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः . ६७३ आकृतिविशिष्टोऽपि व्यक्तिविशेषो नैव प्रतीयते । व्यक्तिविशेषबुद्ध्यभावाद् व्यक्तिमात्रमिति चेत् ? न तदानीं तस्याऽऽकृतितोऽन्यत्वेनानिरूपणात् । मात्रशब्दो हि सामान्यवाचीत्याकृतिरेवोच्यते । नानाकारेषु च वस्तुषु तद्भेदानुसारित्वाच्छ- क्तीनामन्वयव्यतिरेकाभ्यां गोत्वाकारनिबन्धनेव गोशब्दवाच्यत्वशक्तिर्गम्यते । तदेकाधारसामान्यान्तरादवगतिर्विशेषाकाङ्क्षा वेत्यर्थव्याप्यव्याप्तिभ्याम् । अनत्यन्तव्यतिरेकाच्चाऽऽकृतेरमूर्तत्वाच्चाश्रयदोषाप्रसङ्गः । सा हि निष्कृष्ट- रूपा, क्रियायोगिनी तु व्यक्त्युपेता भवतीवेति प्रोक्षणावेक्षणादि तु न कथंचिन्न सम्भवति । विशसनाद्यपि तु व्यक्त्यव्यतिरेकापेक्षया सम्भवत्येव । तथा हि-पश्वादिष्वपनीताङ्गेषु विशेषबुद्ध्यभावात्सामान्यरूपैव विशसनादिविशिष्टा बुद्धिर्दृष्टा । नन्वेवमनित्याऽऽकृतिः स्यात्, तेनांशेनेष्टैव । आश्रयान्तरविनाशात्तु सर्वैरप्य- विनाशोऽवश्यमेवेष्टव्यः । तेन यत्तावन्मात्रमेव तस्य विनाशः अनेकदेशस्य तु न कथंचिद्विनाशः स्यादित्युभयथा व्यवहारः । अत्यन्तव्यतिरेके तु नैष धर्मविधि- विषयो व्यवतिष्ठेत । न च पशुत्वममूर्तत्वात् । तदुपलक्षितं तु यद् द्रव्यम्, तद् द्रव्यत्वादृते न ताद्रूप्येण गम्यत इत्येकार्थसमवायाद्व्यापकत्वाच्च द्रव्यं गमयि- तव्यम्, तत्राप्यमूर्तत्वे दोषः । आश्रयोपलक्षणाच्च द्रव्यमात्रप्रसङ्गः । विशेषस्तु पशुत्वस्य वा द्रव्यत्वस्य वाऽव्यापकत्वादगम्यः । न वाऽप्रतीतं विधिना संबध्यते । न च यत्र संशयः तत्प्रतीतम् । न चान्यत्रोक्तो धर्मस्तत्रासंभवादन्यत्र कार्यः । तस्मान्न सामान्यकृतो विशेषेषु युक्तः, विशेषा अपि व्यपदेशात्सामान्यमेवेत्य- मूर्तता । असाधारणेन तु नैव व्यवहारस्तस्मादनिरूप्यो धर्मविधिविषयः । सामानाधिकरण्यादि च प्रसिद्धिविपरीतं लक्षणया कल्प्यम् । भाष्यकारेण तु व्यतिरेकाभ्युपगमेनाऽऽश्रयमात्रगतिरुक्ता । विशेषरूपा न कदाचिद् व्यक्तिः प्रतीयते । योऽप्याश्रयिभावः, सोऽप्यौपचारिकः । सामान्याच्च विशेषलक्षणं तत्र नाऽऽश्रयितव्यम् । आक्षेपमात्राभावात्, अथ वैतद्विषय एवायं प्रपञ्चः । किं शब्देनाऽऽकृत्या वेति । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां चाऽऽकृत्येति निर्णयः । यो हि धूमादग्निमत्त्वं प्रतिपद्यते, तस्य तैक्ष्ण्येऽप्याकाङ्क्षा सिद्धा । मानसादपचरा- दिति । यो हि जाड्यात्सामान्यवाचितां हित्वा, कंचिदेव विशेषं यत्र सम्बन्धानु- भवः तं वाच्यं मन्यते, तस्य सामान्याप्रतीतेर्न विशेषान्तरापेक्षा भवति । अथ वा यथा शब्दात्स्वतन्त्रामाकृतिं बुध्यते, नेवं कदाचिदाकृतिमबुद्ध्वा व्यक्तिमिति । केन तर्हि गोत्वगोशब्दयोर्विशेषः ? व्यतिरेकांशस्यैकत्र विवक्षा । ४३
पादीयमानत्वे संशयः, स संख्याधारविषयः । उद्दिश्यमानेषु निर्णय एव । गवादि-
६७४ मीमांसादर्शनम् [ सू० गोत्ववानिति तु स्फुटं प्रत्ययेन जातिमदभिधानम् । विभागोपपत्तेः । सामान्यस्य वोपलक्षणत्वान्न भेदपक्षदोषः । भेदानामेव चायं प्रत्येकं सर्वेषां वाचकः । यस्तू- पादीयमानत्वे संशयः, स संख्याधारविषयः । उद्दिश्यमानेषु निर्णय एव । गवादि- शब्दग्रहणं सर्वनामाख्यातशब्दानामन्तर्भावार्थम् । प्रयोजनं सामान्यविशेषशब्द- योरेकविषयत्वात्सामान्यशिष्टस्य विशेषशिष्टेनाबाधः पूर्वपक्षे । परमतेनाधिकरणं व्याख्याय स्वमतेन नामाख्यातयोरर्थनिर्णयः इति निरूपणम् एवं वा—गौरित्येवंविधाः शब्दाः साधुत्वेन निरूपिताः । तेषामेवाभिधेयेऽर्थे व्यापारः क्वेति चिन्त्यते ॥ ९९८ चतुर्विधे' पदे चात्र द्विविधस्याऽर्थनिर्णयः । क्रियते संशयोत्पत्तेर्नोपसर्गनिपातयोः ॥ ९९९ तयोरर्थाभिधाने हि व्यापारो नैव विद्यते । यदर्थद्योतकौ तौ तु वाचकः स विचार्यते ॥ १००० वाचकत्वेऽपि पाश्चात्यमनुयात्येवमादिषु । प्रतीयते विशेषो यः संशयेन स नाऽऽप्यते ॥ १००१ यदि ह्यर्थद्वये बुद्धिर्निपातोच्चारणाद्भवेत् । ततो विचारो जायेत न सामान्यधिया विना ॥ १००२ आख्याताथविचारस्य भावार्थाधिकरणे कृतत्वात् अत्र प्रकृत्यर्थविचारः आख्यातस्यापि नन्वत्र न युक्ताऽर्थविचारणा । द्वितीयादावियं यस्माद्विस्तरेण करिष्यते ॥ १००३ कः पुनर्भाव² इत्यादौ विवेकेनार्थनिर्णयः । आख्यातस्य कृतस्तेन तच्चिन्ता नोपपद्यते ॥ १००४ प्रत्ययार्थस्य भावस्य वाच्यता प्रतिपादिता । प्रकृत्यर्थविवेकार्थं विचारः क्रियतेऽधुना ॥ १००५ प्रत्ययस्यापि वा तत्र भावार्थत्वे निरूपिते । सामान्यं वा विशेषो वा किं वाक्यमिति चिन्त्यते ॥ १००६ अत्र सिद्धस्यैव तत्र व्यवहारो भाष्यकृतः या चोक्ता भाष्यकारेण यागादेरभिधेयता । सिद्धा सेह विवेकार्थं तत्र भावस्य भाषिता ॥ १००७ १. नामाख्यातोपसर्गनिपातरूप इत्यर्थः । २. जै० सू० २-१-१ इत्यत्र भाष्यकारेण ।
३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ६७५ यज्याद्यर्थेऽपि वा वाच्ये किं सामान्यविशेषयोः । अभिधेयमिति प्राप्ता चिन्ता कर्तुं क्रियापदे ॥ १००८ अपूर्वं कस्मादिति प्रधानविचारे न पुनरुक्तिशंका अपूर्वं भावशब्देभ्यो द्रव्यादिभ्यः किमिष्यते । एषा तत्र च चिन्तोक्ता शेषा प्रासङ्गिकी कथा ॥ १००९ नामाख्यातपदे तेन कस्यार्थस्याभिधायके । किमाकृतेरुत व्यक्तेरिति चिन्ता प्रवर्तते ॥ १०१० प्रयोगस्य प्रतीतेश्च तुल्यत्वाच्छब्दलक्षणे । व्यक्तिपक्षाभिधानाच्च संशयः प्रतिभाति नः ॥ १०११ संगतिसंशययोरुपपादनम् कथं लक्षणसंबन्धश्चिन्तायाः प्रकृतेन वा । स्मृतिमूलविचारेण वक्तव्यं त्विदमादितः ॥ १०१२ इयं प्रासङ्गिकी चिन्ता साधुशब्दे निरूपिते । उदाहृतस्य तस्यैव क्रियतेऽर्थविनिश्चयः ॥ १०१३ वक्तव्यः पूर्वमर्थश्चेच्छब्दरूपनिरूपणात् । न हि वाच्यमविज्ञाय साधुत्वमवधार्यते ॥ १०१४ अनिश्चितेऽपि वाच्यत्वे व्यक्ताकृत्योर्विवेकतः । साधुत्वं शक्यते ज्ञातुं तेन वाच्यमिहोच्यते ॥ १०१५ वाच्यमात्रे हि साधुत्वमविज्ञाते न लभ्यते । न चाऽऽकृत्या न च व्यक्त्या विना तन्नोपपद्यते ॥ १०१६ प्रकारान्तरेण संगत्यूत्पादनम् अथ वोक्तेन मार्गेण सर्वा व्याकरणस्मृतिः । प्रयाणमिति सिद्धस्य किंचिदत्र विचार्यते ॥ १०१७ व्यक्तिर्वाच्येति विज्ञानं न सन्मूलमसंभवात् । तेन व्याचरणेऽपीदृग् न प्रमाणं स्मृतिर्मता ॥ १०१८ स्मृतेस्तेनापवादोऽयं प्रामाण्यस्य क्वचित्कृतः । युक्तो लक्षणपादाभ्यां पूर्वया चापि चिन्तया ॥ १०१९ आकृतिपक्षेऽपि क्रियाया उपपत्तिर्व्यक्तिमादायैव वाच्येति फलवैकल्या- भावशंका-समाधाने ननु चाऽऽकृतिपक्षेऽपि व्यक्तावेव क्रियाक्रिये । शब्दार्थे संभवात्तेन किमर्थैषा विचारणा ॥ १०२०
६७६ मीमांसादर्शनम् [ सू० यद्यप्येवं न भेदोऽस्ति वेदार्थकरणे नृणाम् । दधि विप्रेभ्य इत्यादौ फलं लोके भविष्यति ॥ १०२१ व्यक्तिपक्षे विकल्पः स्यात्कौण्डिन्ये दधितक्रयोः । सामान्यवाक्यदौर्बल्यात्क्रममेवेतरत्र तु ॥ १०२२ वेदेऽपि च विशेषोऽस्ति व्रीहिप्रोक्षणचोदके । दध्नेत्यादिषु भेदश्च जायते होमचोदके ॥ १०२३ प्रोक्षणं पूर्वपक्षेऽपि कर्तव्यं लौकिकेष्वपि । व्रीहिषु श्रुतिसामर्थ्याद्वाधित्वा संनिधिक्रमम् ॥ १०२४ प्रकृतेष्वेव सिद्धान्ते श्रुतिसंनिध्यनुग्रहात् । तत्रापि कृत्स्नमस्त्येव व्रीहित्वं हि श्रुतीरितम् ॥ १०२५ एवं होमेऽपि दध्यादौ प्रकृतेऽप्रकृतेऽथ वा । प्रकृते श्रुतिवाच्यस्य होमत्वस्यापि संभवात् ॥ १०२६ सोपपत्तिकमन्यच्च वक्तव्यमनया दिशा । कर्तव्या तेन यत्नेन चिन्तेयं सप्रयोजना ॥ १०२७ ननु गौरितिशब्दादौ सर्वमेतद्विचारितम् ।१ तेन तेन गतार्थत्वात्पुनश्चिन्ता न युज्यते ॥ १०२८ आकृतिश्शब्दार्थ इत्यत्र हेतूपन्यासार्थमिति कथनम् आकृतेरभिधेयत्वप्रतिज्ञा केवला कृता । तत्रेदानीं सहेतुत्वं तस्या एवाभिधीयते ॥ १०२९ यथा वाऽऽकृतिरित्यादौ भाष्यकारेण चोदितम् । पुनरस्याः प्रतिज्ञाया हेतुरप्यभिधास्यते ॥ १०३० आकृतिश्शब्दार्थत्वं पूर्वसिद्धं व्यक्तेर्वाच्यावाच्यत्वचिन्ता यद्वोक्तस्तत्र सद्भावः शब्दार्थत्वमिहोच्यते । या तु शब्दार्थता प्रोक्ता सेह सिद्धा न चिन्तिता ॥ १०३१ उक्ते वाऽप्यभिधेयत्वे जातेः सद्भावसिद्धये । व्यक्तिर्वाच्या न वेत्येतदगतार्थं विचार्यते ॥ १०३२ एतच्चिन्ताप्रसिद्धयर्थमिदं तावद्विचार्यते । शब्दार्थौ लौकिकौ वेदे किमन्याविति संशयः ॥ १०३३ १. जै० सू० ( १-१-५ ) इत्यत्र वृत्तिकारमतानुवादे शब्दार्थसम्बन्धाक्षेपपरिहारग्रन्थे भाष्यकारैरिति शेषः ।