मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 766, कुल 804 में से
संदर्भ में पढ़ें७१२ मीमांसादर्शनम् [ सू० मानने पर प्रोक्षण क्रिया ही सम्भव नहीं है । 'व्रीहीन् प्रोक्षति' में व्रीहि व्यक्ति लक्ष्य है, आकृति स्वरूप शक्य है । एवं आकृति लक्ष्य अर्थ और व्यक्ति शक्य है । आशय यह है कि पूर्व सूत्र के द्वारा व्यक्ति को शब्द का अभिधेय माना गया है । इस सूत्र के तु शब्द के प्रयोग से पूर्वपक्ष का निरास कर आकृति को वाच्य माना है, क्योंकि, क्रिया आकृति को शब्दार्थ मानने पर ही सम्भव है । नैयायिकों ने अवयव संस्थान अर्थ अर्थात् अवयव सन्निवेश अर्थ में आकृति शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु, मीमांसक सिद्धान्त में इस अर्थ में आकृति शब्द का प्रयोग नहीं माना है । श्लोकवार्तिक में स्पष्ट शब्दों में लिखा है—जाति को ही आचार्यों ने आकृति शब्द से कहा है । क्योंकि, इसी के द्वारा व्यक्ति निरूपित होता है । "जातिमेवाकृतिं प्राहूर्व्यक्तिराक्रियते यया । सामान्यं तच्च पिण्डानामेकबुद्धिनिबन्धनम् ॥” (श्लो० वा० आ० ३ पृ० ३८५) । अवयव संस्थान आकृति नहीं है, इसका प्रतिपादन इस प्रसङ्ग में किया गया है, अतः, आकृति का अर्थ जाति है, अवयव संस्थान नहीं है । व्यक्ति को शब्द का शक्य मानने पर श्येनचितं चिनोति (तै० सं० ५।४।११) इत्यादि वचन अनर्थक होने लगेंगे । क्योंकि, श्रुतियों में कहा है कि चयनक्रिया अर्थात् अग्नि स्थापन रूप वैदिक क्रिया- विशेष से इष्टका के द्वारा चीयमान श्येन सदृश होमादि-वेदि-विशेष का सम्पादन करें । प्रकृत स्थल में श्येन सदृश अर्थ होता है । यदि व्यक्ति का ही सादृश्य अथ वा किसी एक व्यक्ति का सादृश्य या सभी श्येन व्यक्ति का सादृश्य गृहीत होगा । प्रकृत में सभी श्येन व्यक्तियों का सादृश्य एक स्थान में नहीं हो सकता है, अतः, किसी एक श्येन व्यक्ति का सादृश्य ही गृहीत होगा । किसी एक श्येन व्यक्ति का सादृश्य ग्रहण करने पर अर्थात् किसी एक श्येन व्यक्ति के सादृश्य को वेद वचन के तात्पर्य का विषय मानने पर उस कर्म काल में सादृश्य के लिए गृहीत श्येन का नाश होने पर इस चयन क्रिया का लोप ही होने लगेगा, क्योंकि, व्यक्ति ही शब्द का अभिधेय है और उस एक व्यक्ति का सादृश्य जब "श्येनचितं चिन्वीत्" इस वेद वचन के तात्पर्य का विषय है तब उसका नाश हो जाने पर अन्य श्येन व्यक्ति का सादृश्य तो ग्रहण के योग्य नहीं है । जाति को शब्द का वाच्य होने पर श्येनत्व जाति का आश्रय श्येन का सादृश्य ही विवक्षित है, ऐसी स्थिति में श्येन का नाश होने पर भी अन्य श्येन के सादृश्य से क्रिया का निर्वाह हो सकता है, क्योंकि सभी श्येन व्यक्ति श्येनत्व जाति का आश्रय है । अत एव व्यक्ति को अभिधेय मानने पर वेदविहित क्रिया का लोप होने से व्यक्ति शब्द का वाच्य नहीं है अपि तु आकृति अर्थात् जाति ही शब्द का वाच्य अर्थ है । इस प्रसङ्ग में व्यक्ति को वाच्य मानने वालों का कहना है कि आकृति के अभिधेय होने पर "व्रीहीन् प्रोक्षति" इत्यादि विधि उपपन्न नहीं हो सकती है, क्योंकि आकृति