भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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३३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ७११ कस्यत्वाकारेण नाक्षः प्रतीयते, किं त्वक्षमात्रम् । तेनोपलक्षणत्वेऽपि गवाकारप्रतीत्ययोगा- त्सामान्यप्रत्ययो न स्यादेवेत्यनर्थकमुपलक्षणत्वाङ्गीकरणमित्याशङ्कयाह - एवं चेति । एतद्दोषापरिहारोत्तरदोषपरिहारार्थोपलक्षणत्वोक्तिरित्याशयः । नैतदितिपरिहारभाष्यं व्याचष्टे -- तदेतदिति । यद्योपलक्षणाभावेऽश्वव्यक्तावपि गोशब्दो वर्त्तेत इत्यतिप्रसक्तिरुक्ता तथा चातोऽप्युपलक्षणस्याप्रतीतस्याविशेषकत्वात्प्राप्नोतीत्यर्थः । नन्वेवं सति मत्वर्थीयेभ्योऽपि विशेषणांशाभिधानद्वारेण तद्विनाभावाद्विशिष्टा प्रत्ययोप- पत्तिः तेषामपि न विशिष्टवाचिता स्यादित्याशङ्कानिराकरणार्थं न च यथेति भाष्यं व्याचष्टे -- न चेति । प्रकृत्यर्थस्य दण्डस्य प्रत्ययेन विशेषणत्वोक्तौ विशेषणत्वान्यथानुपपत्त्या विशिष्टप्रतीतिसम्भवेऽपि मत्वर्थीयप्रत्ययस्य विशेषणे प्रयोगाभावाद्विशिष्टवाचितैषा, तद्व- ज्जातिशब्दानामप्याकृतौ प्रयोगाभावे सति विशिष्टवाचिता स्यात् न चासावस्ति श्येन- चिच्छब्दे जातिशब्दस्याकृतौ प्रयोगदर्शनादित्यर्थः । यदा च केवलाकृत्यभिधायिश्येनशब्दो दृष्टः तदान्वयव्यतिरेकाभ्यामप्याकृतिवाचिता निश्चीयते । व्यक्तिसम्बन्धाभावेऽप्याकृतौ प्रयोगादाकृतिसम्बन्धं विना क्वचिदपि व्यक्तावप्रयोगादिति प्रतिपादनार्थं तदेवमिति भाष्यं व्याचष्टे - अन्वयेति । व्यक्तेरशाब्दत्वेऽन्वयव्यतिरेकौ पूर्वमुक्तौ शब्दस्याकृतिवा- चितायामधुनेति विवेकः ॥ ३३ ॥ भा० प्र० -- इस सूत्र में तु शब्द का प्रयोग पूर्वपक्ष के निराकरण के लिए किया गया है । मीमांसादर्शन में आकृति ही शब्द की वाच्य अर्थ है, किन्तु नैयायिक की आकृति से मीमांसकों की आकृति भिन्न है, नैयायिकों ने अवयव-सन्निवेश को आकृति माना है । किन्तु कुमारिल ने जाति को ही आकृति माना है, क्योंकि, उसी के द्वारा व्यक्ति अर्थ निरूपित होता है । इस प्रसङ्ग में भगवान् भाष्यकार ने कहा है कि व्यक्ति को वाच्य मानने पर इष्टका के चयन से श्येन व्यक्ति का उत्पादन सम्भव नहीं है । इस असम्भव अर्थ को कहने से यह वचन सर्वथा अनर्थक होगा । इसलिए शब्द का जाति अर्थ वाच्य है । यदि यह कहा जाय कि श्येन व्यक्तियों के चयन से अनुष्ठान किया जायगा । प्रस्तुत प्रसङ्ग में श्येन शब्दार्थ साधकतम करण नहीं है । अपितु यह 'श्येनचितम्' ईप्सिततम है । आशय यह है कि श्येनचित् शब्द की सिद्धि कर्मण्यग्न्याख्यायाम् (पा० सू० ३।२।९२) से होती है । अर्थात् अग्नि की संज्ञा प्रतीति होने पर कर्म के उपपद रहने पर चयक अर्थ को कहने वाले चिञ् धातु से कर्मकारक में क्विप् प्रत्यय का विधान होता है । अतः श्येन' शब्द ईप्सिततम कर्म है, साधकतम नहीं है । अतः श्येन व्यक्ति की उत्पत्ति न होकर श्येन आकृति का ही उत्पादन सम्भव होने से यह आकृति का वाचक है । "व्रीहीन् प्रोक्षति" व्रीहिका प्रोक्षण करता है । इस उदाहरण का अवलोकन करने पर यह अवगत होता है कि व्यक्ति शब्द का अर्थ है, क्योंकि, आकृति को शब्दार्थ