भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 768, कुल 804 में से

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पृष्ठ 768

७१४ मीमांसादर्शनम् [ सू० माना जा सकता है । व्यक्ति में शक्ति मानने पर 'गाय लाओ' यह सुनकर सन्देह भी होगा, किस वर्ण की गौ को लाऊँ और शाब्द ज्ञान संशयात्मक उत्पन्न नहीं होता है । अपि तु निश्चयात्मक ही होता है, किन्तु व्यक्ति में शक्ति मानने पर यह सन्देह स्वाभाविक है । जाति को शब्द का अभिधेय मानने पर गो शब्द को सुनने के बाद गो जाति- विषयक प्राथमिक ज्ञान निश्चयात्मक ही होगा । इसके बाद विशेष स्वरूप अज्ञात होने से संशय होगा कि किस वर्ण की गौ लाऊँ, इसलिए भी व्यक्ति शब्द का वाच्य नहीं है । नैयायिकों के मत में विशिष्ट में शक्ति मानी जाती है, यह भी ठीक नहीं है । अर्थात् जाति विशिष्ट व्यक्ति शब्द का वाच्य नहीं हो सकती है । क्योंकि यह स्वरूप मानने पर व्यक्ति विशेष्य है, जाति उसका विशेषण है, ऐसी स्थिति में विशेषण का प्रथम ज्ञान हुए बिना विशिष्ट बुद्धि नहीं हो सकती है । क्योंकि दण्डी पुरुष को देखकर प्रथम में ही 'यह दण्ड' इस प्रकार ज्ञान नहीं होता है, अपि तु उसके हाथ में जो दण्ड है उसका प्रथम ज्ञान होने के बाद ही दण्ड, पुरुष एवं दोनों के सम्बन्ध ज्ञान के बाद दण्डी यह बोध होगा । अतः, जाति-विशिष्ट-व्यक्ति में शक्ति मानने पर जाति-विशिष्ट-व्यक्ति की प्रतीति से पूर्व जाति का ज्ञान आवश्यक है, और शब्द शक्ति के आधार पर प्रथम जाति के ही बोधगम्य होने पर अभिधा व्यापार के द्वारा पुनः व्यक्तिरूप विशेष्य का बोध नहीं हो सकता है, क्योंकि अनुभवसिद्ध यह नियम सकलजन स्वीकृत है कि 'शब्दबुद्धि- कर्मणां विरम्य व्यापाराभावः' अर्थात् शब्द, ज्ञान और कर्म का व्यापार निवृत्त होने पर पुनः उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती है । अत एव विशिष्ट प्रतीति के स्थल में व्यक्ति का विशेषण जो जाति उसी को शब्द का अभिधेय मानने पर अभिधा शक्ति के विरत व्यापार होने पर जाति-विशिष्ट-व्यक्ति शब्द का वाच्य नहीं हो सकती है । इसीलिए, कुमारिल भट्ट ने कहा है— "विशेष्यं नाभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिर्विशेषणे" शब्द की अभिधाशक्ति के द्वारा जाति रूप विशेषण को अवगत कराने के बाद व्यक्तिरूप विशेष्य उसका वाच्य नहीं हो सकता है, तब लक्षणा वृत्तिरूप व्यापारद्वारक व्यापार से शब्द से व्यक्ति की भी प्रतीति में कोई बाधा नहीं है । आकृति की वाच्यता मीमांसकों की केवल उत्प्रेक्षामात्र नहीं है, अपितु यह अन्वय- व्यतिरेक सिद्ध है । क्योंकि उच्चारण करने पर गो व्यक्ति की प्रतीति होती है—यह सभी लोगों का अनुभव सिद्ध विषय है । व्यक्ति की प्रतीति शब्द से होती है या आकृति से उत्पन्न होती है—यह सन्देह का विषय है । यह भी देखा जाता है कि शाब्द ज्ञान न होने पर भी जो आकृति अर्थात् जाति का अनुभव करता है उसके साथ व्यक्ति का भी अनुभव करता है । किन्तु मानसिक दुर्बलता आदि किसी कारण से आकृति जिसके ज्ञान का

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