भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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पृष्ठ 774

७२० मीमांसादर्शनम् [ सू० अतः, ‘'न द्रव्यम्'' = अर्थात् द्रव्य नहीं है आकृति होने से लिङ्ग, संख्या आदि गुणों का अन्वय नहीं हो सकता है। ‘'इति चेत्'' = यदि यह कहा जाय ॥ ३४ ॥ भा० प्र०—पूर्वं पक्ष की आशङ्का के उत्तर में सिद्धान्तियों ने कहा है कि शब्द का वाच्य जाति को मानने पर कोई भी अनुपपत्ति नहीं हैं। क्योंकि जाति और द्रव्य का अत्यन्त भेद नहीं हैं, इसलिए द्रव्य का ही प्रोक्षण आदि होगा। यदि यह कहा जाय कि जाति को क्यों वाच्य कहा जायगा ? इसके समाधान में कहना है कि ‘'तदर्थत्वात्'' जाति के निर्देश के साथ द्रव्य का उल्लेख होने पर उसका अन्यथा नहीं हो सकता है। एक जातीय द्रव्य के स्थान में स्वेच्छापूर्वक अन्य जातीय द्रव्य का व्यवहार नहीं किया जा सकता है। एवं ‘'श्येनचितं चिन्वीत'' इत्यादि क्रिया के भी लोप की सम्भावना नहीं है। इस कारण से अभिधान अर्थात् शब्द के द्वारा द्रव्य का नियम अर्थात् व्यवस्था करने के लिए जाति को ही अभिधेय कहा गया है। अतः, ‘'व्रीहीन् प्रोक्षति'' इस स्थल में प्रोक्षण क्रिया का आश्रय जो व्रीहि द्रव्य उसी को व्रीहित्व जाति विशेष माना गया है। इस प्रकार ‘'षड् देयाः'' इस स्थल में संख्या रूप गुण का आश्रय जो गोव्यक्ति उसको गोत्वजाति विशेष माना गया है। इस प्रकार ‘‘यदि पशुरुपाकृतः पलायेत तदा अन्यं पशुमालभेत'' इस स्थल में भी पशु शब्द के द्वारा पशुत्व जाति अभिहित होने से विनष्ट पशु व्यक्ति का जो अन्य प्रतिनिधि होगा उसी का विशेष निर्देश किया जाता है। अन्य स्थल में भी इसी प्रकार अवगत करना चाहिए। अतः, शब्द का अभिधेय आकृति या जाति होने पर व्यक्ति उससे अभिन्न नहीं है अथवा लक्षणा से व्यक्ति का बोध होने से व्यक्तिरूप द्रव्य ही लिङ्ग, संख्या, कारक आदि का आश्रय होता है। उसमें लिङ्ग, संख्या आदि का सामानाधिकरण्यरूप से अन्वय होने में कोई बाधा नहीं है। इसीलिए आकृति ही पदार्थ अर्थात् शब्द का वाच्य अर्थ है। ‘‘तदर्थत्वात्'' = तदर्थता अर्थात् द्रव्य की नियमार्थता के कारण अर्थात् द्रव्य की विशेष रूप में व्यवस्था करना रूप प्रयोजन होने से, आकृति ही शब्द का वाच्य है। ‘प्रयोगस्य' = प्रयोग का अर्थात् प्रोक्षण आदि क्रिया का, ‘अविभागः' = द्रव्य से विभाग = विच्छेद नहीं है, अर्थात् द्रव्यादि में ही प्रोक्षण आदि क्रियायें होती है। द्रव्य की व्यवस्था करने के लिए ही शब्द के द्वारा आकृति को विषय किया गया है। आकृति से द्रव्य का विभाग अर्थात् भेद नहीं होने से प्रोक्षण आदि क्रियायें भी द्रव्य की ही होती है, किन्तु वह द्रव्य से विच्छिन्न नहीं होता है ॥ ३५ ॥ ॥ इति श्रीगोस्वामिदामोदरलालात्मजमहाप्रभुलालगोस्वामिविरचितभावप्रकाशिकायां प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥