भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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३४ मीमांसादर्शनम् [ सू० मात्रेण बहुवचनोपपत्तेरतिरिक्ताक्षेपे प्रमाणाभावात् त्रित्वनियम इति सिद्धान्तयिष्यते । दृष्टान्ते पौर्वापर्य्यादर्थमेव तेनैव पथेत्युक्तमित्याह—तथा चेति । भवत्वन्यानर्थक्यमत आह— तस्मादिति । फलविशेषार्थत्वेन तर्ह्यन्येषामर्थवत्त्वं भविष्यतीत्यत आह—न चेति । नन्वेव- मपि सिद्धान्त्यभिमतस्तुत्यर्थत्वानिराकरणात्पूर्वपक्षो न सिद्धः, अत आह—न चेति ॥ ४ ॥ अन्यका अर्थात अर्थवाद से अतिरिक्त अनेक वाक्यों की अनर्थकता होने से अर्थवाद प्रमाण नहीं है । यदि अर्थवाद का प्रामाण्य स्वीकार किया जाय, तब अनेक स्थलों में विधिवाक्य अनर्थक या विफल होने लगेंगे, इसलिए, अर्थवाद को प्रमाण नहीं कहा जा सकता है । श्रुति में कहा गया है—“तरति मृत्युं तरति पाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद” । (तै०५।३।१२।१) जो व्यक्ति अश्वमेध यज्ञ करता है, एवं जो उसका इस प्रकार (स्वरूप) अवगत करता है, वह मृत्यु का अतिक्रमण करता है, पाप से उद्धार प्राप्त करता है तथा ब्रह्महत्या से छुटकारा प्राप्त कर लेता है । इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि अश्वमेध का स्वरूप जानने से ही पूर्वोक्त फलों की प्राप्ति होती है, जो व्यक्ति यज्ञ करता है उसको भी पूर्व में वेद का अध्ययन करना पड़ता है, अतः, अध्ययन काल में ही अश्वमेध के स्वरूप की अवगति हो जाने से “अश्वमेधेन यजेत” यह विधि निरर्थक हो जायगी, कारण, अध्ययन के बिना तो यज्ञ का अधिकारी नहीं होता है और अध्ययन से ही फल की प्राप्ति हो जाने से पुनः यज्ञ का अनुष्ठान तो व्यर्थ ही होगा, क्योंकि, यज्ञ के अनुष्ठान के सम्पादन में जो कष्ट होता है उसकी तुलना में वेदाध्ययन एवं यज्ञ- विषयक शास्त्रीयज्ञान में श्रम नगण्य है, अतः, बिना आयास के ही अभीष्ट की प्राप्ति हो जाने पर कौन बुद्धिमान् उस की प्राप्ति के लिए क्लेश सहन करने की इच्छा करेगा । इसी के उदाहरण स्वरूप भाष्यकारने कहा है— अर्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् । इष्टस्यार्थस्य संसिद्धौ को विद्वान् यत्नमाचरेत् ॥ पथ के किनारे अकवन (आक) के वृक्ष में यदि मधु को प्राप्ति हो जाती है, तब उसकी प्राप्ति के लिए पर्वत पर क्यों जायगा ? इसी प्रकार यदि अभीष्ट विषय की अनायास सिद्धि हो जाय तब कौन विद्वान् उसके लिए विशेष परिश्रम चाहेगा ? इसी प्रकार “पूर्णाहुत्या सर्वान् कामानाप्नोति” (तै० ब्रा० ३।८।१०।५) “पूर्णाहुति के द्वारा सभी कामनाएँ सिद्ध होती हैं”। इसी प्रकार “पशुबन्धयाजी सर्वान् लोकानभिज- यति” । जो व्यक्ति निरूढपशुबन्धनामक यज्ञ करता है, वह स्वर्ग आदि सभी लोकों का लाभ करता है अर्थात् लाभ करता है इत्यादि सभी अर्थवाद अन्य विधियों के विघा- तक हैं । क्योंकि, अग्नि आधान कर्म में पूर्णाहुति देने से ही यदि सभी कामनाओं की पूर्ति हो तो अग्निहोत्र आदि कर्मों का विधान अनर्थक हो जायगा, क्योंकि, पूर्वसम्पादित अग्नि आधान के बिना अग्निहोत्र आदि कर्मों का अनुष्ठान नहीं हो सकता है और पूर्णा-