भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका

संस्कृत-साहित्य में अभिनय-प्रदर्शन के स्रोत वैदिक काल से ही प्राप्त होते हैं। वेदों में स्थित संवादसूक्तों में इस कला के स्पष्ट दर्शन होते हैं। परिशीलन से स्पष्टतया ज्ञात होता है कि रामायण और महाभारत-काल में इस मनोरम कला की ओर लोगों की पर्याप्त रुचि हो चुकी थी।¹ वे इस कला से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार राजविहीन जनपद में 'नट' और 'नर्तक' प्रसन्न नहीं दिखाई देते थे। इसमें नटों द्वारा सामाजिकों के मनोरंजन का उल्लेख है।²

नटसूत्रों की प्रामाणिकता का स्पष्ट उल्लेख पाणिनि (ई. पू. ५००) की अष्टाध्यायी में है।³ पतंजलि (ई. पू. १५०) के महाभाष्य में क्रिया की वर्तमानकालिकता का उपपादन करने के लिये 'कंसं घातयति' 'बलिं बन्धयति' आदि में नटों (शोभनिक या शौभिक) का उल्लेख है।⁴ महाभाष्य में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक नाटकों का स्पष्ट उल्लेख है। इससे यह कहा जा सकता है कि पतंजलि के समय (ई. पू. १५०) में भारतीय समाज नाट्यकला से सुपरिचित होकर इसका आनन्द उठाने लगा था।

आचार्य भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में यह लिखा⁵ है "सांसारिक मनुष्यों को अति खिन्न देखकर इन्द्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा के पास जाकर ऐसे वेद के निर्माण करने की प्रार्थना की जिससे वेद के अनधिकारी स्त्री, शूद्र आदि सभी लोगों का मनोरंजन हो। यह सुनकर ब्रह्मा ने चारों वेदों का ध्यान करके ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर 'नाट्यवेद' नामक


१. द्र० संस्कृत-साहित्य का इतिहास (बलदेव उपाध्याय) पृ० ४६५
२. नाराजके जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः। (वा० रा० २।६७।१५)
३. पाराशर्य्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः। (पा० सू० ४।३।११०) कर्मन्दकृशाश्वा-दिनिः। (पा. सू. ४।३।१११)
४. ये तावदेते शोभनिका नामैते प्रत्यक्षं कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्ति।
वर्तमाने लट् (३।२।१११) पर महाभाष्य
५. द्र० संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृ० ४६९