भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२ मृच्छकटिक

पंचम वेद की रचना की।$^१$ और इन्द्र से कुशल, प्रगल्भ देवताओं में इसका प्रचार करने को कहा। इन्द्र ने कहा कि देवता लोग नाट्यकर्म में कुशल नहीं हैं। वेदों का मर्म जानने वाले मुनि लोग इसका ग्रहण और प्रयोग करने में समर्थ हैं। तब ब्रह्मा के कथनानुसार भरत मुनि ने अपने पुत्रों को इसकी शिक्षा दी। नाटक में सभी वस्तुओं का प्रदर्शन संभव है।$^२$ सर्वप्रथम ‘त्रिपुरदाह’ और इसके बाद ‘समुद्रमन्थन’ का अभिनय किया गया। यह विवेचन सिद्ध करता है कि भारत में अति प्राचीन काल में नाटकों की उत्पत्ति दिखाई देती है।

कुछ विद्वानों ने भारतीय नाटकों के विकास में ग्रीकप्रभाव माना है। इसका प्रमाण ‘यवनिका’ शब्द का प्रयोग कहा है। परन्तु संस्कृत में ‘जवनिका’ शब्द का प्रयोग सामान्य पर्दा के अर्थ में प्राप्त होता है। यूनानी शब्द यकारादि है, संस्कृत शब्द जकारादि है। अतः इस आधार पर ग्रीकप्रभाव की कल्पना ठीक नहीं है।$^३$

ग्रीक में सुखान्त और दुःखान्त दो प्रकार के नाटक हैं। किन्तु संस्कृत में केवल सुखान्त नाटक ही लिखे गये। परिमाण की दृष्टि से भी संस्कृत नाटक ग्रीक नाटकों से भिन्न हैं। प्रस्तुत ‘मृच्छकटिक’ अकेला ही ग्रीक के तीन-चार नाटकों के बराबर है।

संस्कृत-नाटकों में संस्कृत भाषा के साथ विभिन्न प्राकृत भाषाओं का प्रयोग भी इन नाटकों का साधारण जन तक प्रचार सिद्ध करते हैं। संस्कृत नाटकों में अंकों के द्वारा विभाजन किया जाता है और अंक के अन्त में सभी पात्रों का रंग-मंच से निकलना आवश्यक है। परन्तु ग्रीक नाटकों में ऐसी व्यवस्था नहीं है।

विदूषक की कल्पना संस्कृत नाटकों की अपनी विशेषता है। यह पात्र केवल मजाक के लिये नहीं होता है अपितु कभी-कभी महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है। मृच्छकटिक का विदूषक भी इसी श्रेणी का है।

संस्कृत नाटकों की कथावस्तु मौलिक है। ये रामायण और महाभारत पर प्रमुख रूप से आधृत हैं। इनमें ख्यातवृत्त को महत्त्व दिया जाता है।


१. एवं संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुस्मरन् ।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतिमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥
(नाट्यशास्त्र १।१६, १७)

२. न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो न तत्कर्म नाट्यॆऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥
(नाट्यशास्त्र १।११४)

३. द्र० संस्कृत साहित्य का इतिहास पृ० ४७२-७३