मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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ग्रीक नाटकों में (१) स्थानान्विति, (२) कालान्विति और (३) कार्यान्विति प्राप्त होतीं हैं। परन्तु संस्कृत नाटकों में केवल 'कार्यान्विति' पर बल दिया जाता है। ग्रीक नाटकों में 'कोरस' [ एक साथ गाने नाचने वालों की टोली ] का महत्त्व है। जब कि संस्कृत नाटकों में इसका अभाव है। अकेला सूत्रधार ही नान्दीपाठ के बाद नाटक प्रारम्भ करा देता है।
रंगमंच की दृष्टि से भी दोनों में बहुत अन्तर है। ग्रीक (यूनान) में नाटकों को खुले आसमान में सामान्य जनता के लिये खेला जाता था। जब कि संस्कृत नाटक प्रारंभिक काल से ही कलात्मक प्रेक्षागृहों में खेले जाते थे। इनके निर्माण की दक्षता की जानकारी प्राचीन काल से ही मिलती है। संस्कृत नाटकों का उद्देश्य केवल मनोरंजन कराना ही नहीं है, साथ-साथ शिक्षा देना भी रहा है। इसी प्रकार के ऐसे अनेक अन्तर हैं जो संस्कृत नाटकों पर ग्रीकप्रभाव का खण्डन करते हैं।$^१$ अतः संस्कृत नाटकों पर ग्रीकप्रभाव मानना अनुचित और अप्रामाणिक है।
संस्कृत में काव्य को सामान्यरूप से दो भेदों में बांटा गया है—(क) दृश्य और (ख) श्रव्य।$^२$ श्रव्य की अपेक्षा दृश्य का महत्त्व अधिक है। रंगमंच पर जिनका अभिनय करना संभव होता है उन्हें 'दृश्य' काव्य कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं—(क) रूपक और (ख) उपरूपक। रूपक को रस, भाव, आदि का आश्रय माना जाता है।$^३$ इसके दश भेद होते हैं—
नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोग-समवकारडिमाः।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥$^४$
१-नाटक, २-प्रकरण, ३-भाण, ४-व्यायोग, ५-समवकार, ६-डिम, ७-ईहामृग, ८-अंक, ९-वीथी, १०-प्रहसन।
उपरूपक के भी नाटिका आदि १८ भेद माने गये हैं। कुछ बातों को छोड़कर इनमें भी वे सभी बातें होतीं हैं जो नाटक में मानी जातीं हैं।$^५$
१. संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृ० ४७४-७८
२. दृश्यश्रव्यभेदेन काव्यं द्विधा मतम्। साहित्यदर्पण ६।१
३. अवस्थानुकृतिर्नाट्यं रूपं दृश्यतयोच्यते।
रूपकं तत्समावेशाद्दशधैव रसाश्रयम् ॥ दशरूपक १।७
४. साहित्यदर्पण ६।३
५. अष्टादश प्राहुरुपरूपकाणि मनीषिणः।
विना विशेषं सर्वेषां लक्ष्म नाटकवन्मतम् ॥ साहित्यदर्पण ६।६