मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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मृच्छकटिक
दृश्य काव्य के भेद, उपभेद—वस्तु, नेता और रस के आधार पर किये जाते हैं। परन्तु आधुनिक समीक्षक नाटक में इन तत्त्वों पर भी महत्त्व देते हैं—कथानक, पात्र, उनका चरित्रचित्रण, संवाद, देश तथा काल का निर्णय, भाषा, शैली और अभिनययोग्यता आदि। इन सभी की दृष्टि से मृच्छकटिक की समीक्षा करनी आवश्यक है। परन्तु इन पर विचार करने के पहले इसके विवादग्रस्त विषय 'रचयिता' पर विचार कर लेना अच्छा है।
मृच्छकटिक का रचयिता
यद्यपि उपलब्ध सभी हस्तलेखों और प्रकाशित संस्करणों की भूमिका में मृच्छकटिक का रचयिता 'शूद्रक' नृप को ही माना गया है। परन्तु अभी तक विद्वान इसके रचयिता के विषय में सन्देह करते आ रहे हैं। इस सम्बन्ध में उपलब्ध मत और उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है—
मृच्छकटिक दण्डी की रचना है—पिशेल आदि का मत—
श्री पिशेल महोदय का मत है कि मृच्छकटिक दण्डी की रचना है। उनका यह कहना है कि राजशेखर ने दण्डी के तीन प्रबन्ध माने हैं—
“त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः।”१
इन तीनों में (क) दशकुमार-चरित और (ख) काव्यादर्श के अतिरिक्त तीसरी रचना (ग) 'मृच्छकटिक' है। पिशेल ने अपने मत के समर्थन में ये तर्क दिये हैं—
(१) ‘लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।’२ यह पद्य उदाहरण के रूप में काव्यादर्श ( २।२२६ ) में है। यही पद्य मृच्छकटिक के प्रथम अंक (१।३४) में भी है। इससे दोनों रचनाओं का एक कर्ता प्रतीत होता है।
(२) दशकुमार-चरित में सामाजिक अवस्था का जैसा वर्णन मिलता है वैसा ही मृच्छकटिक में भी है। दोनों की यह समानता भी दोनों का एक ही कर्ता होना सिद्ध करती है।३
पिशेल के उपर्युक्त मत का समर्थन मॅकडानल आदि ने भी किया है।
उपर्युक्त मत का खण्डन
दूसरे विद्वानों के मत में पिशेल के मत में कोई ठोस आधार नहीं है 'लिम्पतीव' यह पद्य तो सर्वप्रथम भास के 'चारुदत्त' में मिलता है। वहीं से अन्य कृतियों
१. राजशेखर २. काव्यादर्श २।२२६, मृच्छकटिक १।३४ ३. मृच्छकटिक-भूमिका M. R. काले पृ० १७