भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ५

में उद्धृत है। सामाजिक अवस्था के वर्णन की समानता भी उक्त मत सिद्ध नहीं कर सकती क्योंकि कभी-कभी परिस्थितिवशात् दो लेखकों के समय में भी एक जैसी सामाजिक दशा मिलना संभव है। और जब से 'अवन्तिसुन्दरीकथा' नामक ग्रन्थ मिल गया है तब से विद्वान इसे ही दण्डी की तीसरी रचना के रूप में स्वीकार करते हैं। अतः पीटर्सन आदि विद्वान पिशेल का मत नहीं मानते हैं।¹

मृच्छकटिक भास की रचना है---

कुछ विद्वानों की धारणा है कि मृच्छकटिक महाकवि भास की रचना है। महाकवि भास ने अपने 'चारुदत्त' नामक नाटक को ही बाद में परिवर्द्धित करके 'मृच्छकटिक' नाम से प्रसिद्ध कर दिया।²

उक्त मत का खण्डन

किन्तु उपर्युक्त मत में कोई ठोस आधार नहीं है। कारण यह है कि जब भास ने अपनी अन्य सभी कृतियों में कर्ता के रूप में अपना उल्लेख किया है तब मृच्छकटिक को 'शूद्रक' नाम से क्यों लिखा ? भास को शूद्र मानने की कल्पना भी निराधार है। क्योंकि प्रस्तुत मृच्छकटिक की प्रस्तावना में इसके रचयिता को एक समर्थ और सम्पन्न राजा बताया गया है। वह अनेक विषयों का प्रौढ़ विद्वान भी था। अतः उसे जात्या शूद्र मानना तर्कसंगत नहीं है।

मृच्छकटिक किसी अज्ञात कवि की रचना है—

वास्तव में मृच्छकटिक के रचयिता का ज्ञान करना संभव नहीं है। यह किसी अज्ञात कवि की रचना है। यह मत डा० सिल्वालेवी ने प्रस्तुत किया था।³ इनका यह कहना है कि शूद्रक मृच्छकटिक के रचयिता नहीं हो सकते अपितु किसी अन्य कवि ने इसकी रचना करके अपनी इस रचना की प्राचीनता सिद्ध करने की भावना से शूद्रक की कृति घोषित कर दी। उस कवि ने अपनी कृति को शूद्रक के नाम से क्यों घोषित किया ? इस शंका का उत्तर देते हुये सिल्वालेवी का यह कहना है कि वह लेखक वास्तव में कालिदास से अर्वाचीन था किन्तु अपनी कृति को कालिदास से प्राचीन सिद्ध करना चाहता था। अतः कालिदास के आश्रयदाता राजा विक्रमादित्य से भी प्राचीन राजा शूद्रक के नाम से अपनी कृति को प्रसिद्ध कर दिया।


१. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० ३
२. मृच्छकटिक-भूमिका M. R, काले पृ० १७
३. मृच्छकटिक-भूमिका पं० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १०