भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६ मृच्छकटिक

डा० कीथ आदि कुछ विद्वान भी इस मत का अंशतः समर्थन करते हैं। उनके अनुसार कोई अज्ञात व्यक्ति ही मृच्छकटिक का रचयिता था। शूद्रक कोई वास्तविक व्यक्ति न होकर केवल कल्पित व्यक्ति था।¹

उपर्युक्त मत का खण्डन

परन्तु अधिकांश समीक्षक उपर्युक्त मत को नहीं मानते हैं। उनके अनुसार मृच्छकटिक को किसी अज्ञात कवि की रचना सिद्ध करने के लिए ठोस आधार और प्रमाणों का होना आवश्यक है। परन्तु इसमें केवल कल्पना के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं दिखलाई देता है। उपलब्ध सभी प्रकाशित और हस्तलिखित संस्करणों की प्रस्तावना में शूद्रक को ही इसका रचयिता कहा गया है।² इसके अतिरिक्त शूद्रक को ऐतिहासिक व्यक्ति न मानकर केवल कल्पित मानना भी प्रमादपूर्ण है।

पं० कान्तानाथ शास्त्री तेलंग का मत

“हमारे³ विचार से भी शूद्रक 'मृच्छकटिक' के कर्ता नहीं हैं। इसके कर्ता कोई दूसरे ही कवि हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कवि ने भास का 'दरिद्र-चारुदत्त' देखा। उन्हें वह अपूर्ण प्रतीत हुआ। उन पर उसे पूर्ण करने की धुन सवार हुई। उन्होंने आवश्यकता और अपनी रुचि के अनुसार 'दरिद्रचारुदत्त' में परिवर्तन किये। उसकी कथा के साथ अपनी कल्पना से रची हुई अथवा गुणाढ्य की 'बृहत्कथा' से ली हुई गोपालदारक आर्यक के विद्रोह की कथा वट थी। इस प्रकार 'मृच्छकटिक' तैयार हुआ। कवि ने अपना नाम जानबूझ कर छिपाया। प्रस्तावना में शूद्रक के साथ 'किल' का प्रयोग यही सूचित करता है। कवि ने इस शब्द का प्रयोग जानबूझ कर किया है। यह भी एक दो बार नहीं, चार-चार बार। तीन बार तो इसका प्रयोग शूद्रक के साथ किया गया है और एक बार चारुदत्त के। प्रस्तावना में शूद्रक का नाम बताने वाले पद्य देने के पहले ही कवि ने लिखा है--“एतत्कविः किल।” इसके बाद पुनः पांचवें पद्य में शूद्रक के साथ 'किल' शब्द है। इस अव्यय का प्रयोग प्रायः 'ऐतिह्य' 'अलीकता' या 'सम्भावना' सूचन करने के लिये पाया जाता है। यह अधिकतर अनिश्चय व्यक्त करता है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यहाँ इसका प्रयोग 'इदं किलाव्याज-


१. Sanskrit Drama पृ० १२६
२. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० २
३. मृच्छकटिक-भूमिका पं० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० ११-१२