भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका

मनोहरं वपुः' (शाकु०) की तरह ऐतिह्यादि अर्थों से भिन्न अर्थ का ज्ञान कराने के लिये किया गया है। "लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः', 'बभूव', और 'चकार' के प्रकाश में यहाँ 'किल' शब्द 'ऐतिह्य' आदि अर्थों का ही बोध कराता है। कवि को अपनी आयु का निश्चित प्रमाण कैसे मालूम हो सकता है ? वह कैसे जान सकता है कि आगे चलकर उसकी मृत्यु कैसे और कब होगी ? 'बभूव' और 'चकार' का लिट् लकार भी परोक्ष भूत का बोधक होने के कारण ऐतिह्य आदि अर्थों का ही समर्थन करता है।"

"यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि नाटक तो शूद्रक का है, केवल प्रस्तावना के श्लोक दूसरे कवि के द्वारा प्रक्षिप्त हैं। ऐसा मानने का यह अर्थ होगा कि शूद्रक ने अपना नाटक बिना नाम डाले ही चला दिया। इसके अतिरिक्त 'बभूव' और 'चकार' के प्रकाश में यह भी मानना पड़ेगा कि शूद्रक के मरने के बहुत बाद प्रस्तावना के श्लोक डाले गये। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठेगा कि आखिर शूद्रक ने अपना नाटक अपना नाम दिये बिना ही क्यों चला दिया ? वह तो राजा था। उसे किसी का डर तो था नहीं। इसके अतिरिक्त बहुत दीर्घकाल तक किसी को उसका नाम डालने की क्यों नहीं सूझी ? बहुत लम्बे काल के बाद यह प्रश्न क्यों खड़ा हुआ ? इन प्रश्नों का कोई समुचित उत्तर नहीं मिलता। हमारे विचार से ये श्लोक यदि प्रक्षिप्त होते तो इनका स्वरूप ही दूसरा होता। यदि सच्चे दिल से केवल कवि का नाम स्थायी बनाने तथा उसका परिचय देने के लिये ही ये श्लोक प्रक्षिप्त होते तो इसमें सन्देह उत्पन्न करने वाली विचित्र बातें तथा परोक्षभूत की क्रिया न रखी गयी होती। जिस प्रकार अन्य प्रसिद्ध नाटकों के कवि अपना परिचय देते हैं वैसे ही सच मालूम होने वाले श्लोक बना कर मेल मिला दिया होता। अतः हम तो यही मानना श्रेयस्कर समझते हैं कि यह नाटक शूद्रक का नहीं है। किसी दूसरे कवि ने इसे रचकर शूद्रक के नाम से चला दिया है। शूद्रक इतिहासप्रसिद्ध व्यक्ति थे या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं है।"

आगे उन्होंने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुये लिखा है कि उस कवि ने अपना नाटक शूद्रक के नाम से क्यों चला दिया--इसके दो कारण हो सकते हैं--(१) उसने सोचा होगा कि इसमें आधा भाग भास का है। यदि इसे मैं अपने नाम से चलाऊँगा तो लोग मुझे चोर कहेंगे। (२) इस नाटक का घटनाचक्र तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों तथा मान्यताओं के विपरीत जान पड़ता है। चारुदत्त तथा शर्विलक जैसे ब्राह्मणों का वेश्याओं के साथ विवाह, ब्राह्मणों का चोर होना, चन्दनक और वीरक जैसे शूद्रों का राज्य के उच्च पदों पर स्थित होना—इत्यादि घटनायें क्रान्तिकारी विचारों की सूचक हैं। अतः यदि वह कवि अपने नाम से