मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ मृच्छकटिक
इस नाटक को प्रचलित करता तो समाज और राजा उसकी दुर्गति कर देते। इसी कारण से उसने एक प्राचीन राजा के नाम से अपनी रचना को प्रसिद्ध किया होगा।
उपर्युक्त मत में अनुपपत्तियाँ
माननीय तेलंग जी के उपर्युक्त मत से तो ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक का 'मृच्छकटिक' के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है। किसी कवि ने श्रम एवं प्रतिभा से इतनी विशाल और महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो और वह बिना किसी विशेष कारण अपना नाम छोड़कर अन्य 'शूद्रक' के नाम से प्रसिद्ध कर दे, ऐसी बात बुद्धिगम्य नहीं है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखाई देता। यह कहा जाय कि क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करने के कारण उसे राजा या समाज का भय था, तो यह भी तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि क्रान्तिकारी को किसी से भय नहीं होता है। 'किल' 'चकार' 'बभूव' आदि शब्दों के प्रयोग अवश्य विचारणीय हैं।
मृच्छकटिक शूद्रक की ही रचना है-परम्परावादी मत
परम्परावादी विद्वानों का मत है कि शूद्रक ही मृच्छकटिक के रचयिता हैं। प्रत्येक नाटक में उसके रचयिता का नाम उसकी प्रस्तावना में प्राप्त होता है। ठीक यही स्थिति मृच्छकटिक में भी है। इसकी भी प्रस्तावना में स्पष्ट शब्दों में 'शूद्रक नृप' को ही इसका रचयिता लिखा है।१ यहाँ परोक्ष भूतकालिक क्रिया के वाचक 'चकार' 'बभूव' 'अग्निं प्रविष्टः' आदि पदों का प्रयोग सन्देह अवश्य पैदा करता हैं। इन प्रयोगों की उपपत्ति का प्रयास विभिन्न टीकाकारों ने किया है। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हों। अथवा लिपिकर्ता आदि के प्रमाद से अशुद्ध हो गये हों। अतः जब तक कोई ठोस आधार और प्रबल प्रमाण उपलब्ध नहीं होता तब तक शूद्रक को ही मृच्छकटिक का रचयिता मानना उचित है।
शूद्रक नृप के पुत्र के आश्रित कवि की रचना है—
ऊपर विभिन्न कल्पनाओं के साथ मेरा एक विनम्र परामर्श है कि मृच्छकटिक का रचयिता शूद्रक नहीं है। ऐसा लगता है कि शूद्रक का पुत्र जब राजा बना तो उसे अपने पिता की प्रसिद्धि स्थिर बनाने का विचार आया और उसने अपने आश्रित किसी महाकवि द्वारा यह रचना करायी। बाद में धनादि देकर अपने पिता का नाम उसमें जुड़वा दिया। चूँकि उस समय राजा शूद्रक नहीं थे। अतः उस कवि ने
१. द्र० प्रस्तुत संस्करण की प्रस्तावना के श्लोक।