भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ६

उनका नाम तो जोड़ दिया किन्तु भूतकालिक क्रियावाची पदों का प्रयोग करके भ्रम उत्पन्न करा दिया। संभव है उसे यह आभास न हुआ हो कि भविष्य में उसके प्रयोगों की समीक्षा करने पर अनेक समस्यायें खड़ी हो जायेंगी।

यदि वास्तव में शूद्रक ही रचयिता होते तो वे आत्मप्रशंसा में इतने श्लोक न लिखते। यदि आत्मप्रशंसा-प्रेमी होते तो 'मृच्छकटिक' की समाप्ति में भी अपना नाम अवश्य लिखते। मुझे जितने भी प्रकाशित संस्करण उपलब्ध हुए, उनमें 'संहारो नाम दशमोऽङ्कः' इतना ही लिखा है।

अस्तु, जो भी हो, अभी तक यह समस्या ही बनी है। इस विषय में 'इदमित्थम्' कह सकना दुस्साहसमात्र है।

शूद्रक—

जब तक कोई ठोस आधार नहीं प्राप्त होता तब तक शूद्रक को ही मृच्छकटिक का कर्ता मानना चाहिये। परन्तु ऐसा मान लेने पर दूसरा प्रश्न उठता है शूद्रक के व्यक्तित्व के विषय में। मृच्छकटिक की प्रस्तावना में यह स्पष्ट है कि शूद्रक एक प्रौढ़ विद्वान और बलशाली राजा था। वह अनेक विषयों का मर्मज्ञ और वैदिक परम्परा का अनुयायी था। उसने इस प्रस्तुत प्रकरण की रचना की।

भारत में ऐसे अनेक राजा हुए हैं जिनकी साहित्यिक गतिविधियां भी उच्च-कोटि की थीं। इनमें समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन, यशोवर्मा, मुञ्ज तथा भोज आदि प्रमुख हैं। इन्होंने राजकार्य की व्यस्तता में भी उत्कृष्ट रचनायें कीं। अतः शूद्रक भी राजा होकर इस प्रकरण की रचना कर सकता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। प्रस्तावना में 'शूद्रको नृपः' यह स्पष्ट लिखा है।

परन्तु भारतीय समाज में ऐसे भी अनेक कवियों की चर्चा है जिन्होंने राजा द्वारा पुरस्कृत होने पर कृतज्ञतास्वरूप अपनी कृति को उस राजा के नाम से प्रसिद्ध कर दिया। इस बात का स्पष्ट उल्लेख आचार्य मम्मट के काव्य-प्रकाश में काव्य-प्रयोजन की चर्चा के प्रसंग में है "काव्यं यशसे, अर्थकृते' की व्याख्या में लिखा है—"श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्।" सम्भव है यह स्थिति शूद्रक या उसके पुत्र की राजसभा के किसी पण्डित की भी रही हो। राजशेखर ने इस प्रकार के कुछ राजाओं का उल्लेख भी किया है—"वासुदेव-शातवाहन-शूद्रक-साहसांकादीन् सकलान् सभापतीन् दानमानाभ्यामनुकुर्यात्।" (काव्यमीमांसा) उपर्युक्त तथ्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्वयं शूद्रक ने अथवा उसके आश्रित किसी कवि ने या शूद्रक के पुत्र के आश्रित किसी कवि ने मृच्छकटिक की रचना की है और शूद्रक के नाम से प्रसिद्ध कर दी है।