मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० | मृच्छकटिक
कुछ समय पहले मद्रास में 'अवन्तिसुन्दरी-कथा' नाम का एक ग्रन्थ मिला जिसे विद्वानों ने दण्डी की तीसरी कृति माना। उसमें शूद्रक की प्रशंसा में निम्न श्लोक है--
शूद्रकेणासकृज्जित्वा स्वच्छया खड्गधारया।
जगद् भूयोऽवष्टब्धं वाचा स्वचरितार्थया ॥१
इसमें शूद्रक को एक वीर योद्धा कहा गया है। 'वाचा स्वचरितार्थया' इन पदों से यही प्रतीत होता है कि शूद्रक ने अपनी रचना में आत्मकथा प्रतिबिम्बित की है। कुछ विद्वानों का कहना है कि मृच्छकटिक में शूद्रक के जीवन की कुछ प्रमुख घटनाओं का संकेत है। यहाँ का चारुदत्त शूद्रक के मित्र बन्धुदत्त का दूसरा रूप है। और गोपालपुत्र आर्यक के रूप में शूद्रक ने स्वयं को प्रस्तुत किया है। परन्तु इस कल्पना में कोई ठोस तर्क या प्रमाण नहीं दिया गया। केवल यही कहा जा सकता है कि शूद्रक एक वीर योद्धा था।
वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति से भी यह संकेत मिलता है कि शूद्रक नाम का कोई कवि था। उसकी रचनायें लोककथाश्रित थीं। अर्थगुणों के विवेचन के प्रसङ्ग में वामन ने श्लेष (घटना) का उल्लेख किया है और शूद्रक की रचनाओं में इस श्लेष का विशेष प्रयोग बताया है "शूद्रकादिरचितेषु प्रबन्धेषु अस्य भूयान् प्रपञ्चो दृश्यते।" (काव्यालङ्कार-सूत्रवृत्ति ३।२।४) इस उल्लेख से शूद्रक का कवि होना और श्लेष में उसकी दक्षता ये दो बातें प्रमाणित होती हैं।
परन्तु उपर्युक्त उल्लेख से यह अनुमान लगाना कठिन है कि वामन शूद्रक को मृच्छकटिक के रचयिता के रूप में जानता था अथवा नहीं। कारण यह है कि मृच्छकटिक को विशेष रूप से श्लेषगुणयुक्त कहना कठिन है। परन्तु वामन ने सूत्रवृत्ति में ऐसे कई उदाहरण दिये हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि वह भी मृच्छकटिक से सुपरिचित था। यह श्लेष गुण श्लेष अलंकार से सर्वथा भिन्न है। अतः वामन के उपर्युक्त कथन से भी यह अनुमान करना सम्भव है कि शूद्रक ने मृच्छकटिक के अतिरिक्त और दूसरी भी रचना की थी।
शूद्रक के विषय में ऐतिहासिक उल्लेख :
संस्कृत-साहित्य में अनेक शूद्रकों का उल्लेख प्राप्त होता है। अतः इसको केवल काल्पनिक व्यक्ति मानना ठीक नहीं है। यह शूद्रक विभिन्न प्रसंगों और विभिन्न कालों में चर्चित है। अतः इन शूद्रकों में कौन शूद्रक मृच्छकटिक का रचयिता है—यह कहना कठिन है। इस विषय में निम्न विवेचन उपयोगी होगा—
१. मृच्छकटिक भूमिका M. R. काले पृ० २१ में उद्धृत।