भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका

(१) स्कन्दपुराण में कुमारिका-खण्ड में यह लिखा है कि कलि सम्वत् ३२६० अर्थात् १६० ई० में शूद्रक नाम का कोई राजा हुआ था।¹ कुछ विद्वान स्कन्द-पुराण में निर्दिष्ट शूद्रक को आन्ध्रवंशीय प्रथम राजा 'सिमुक' से अभिन्न मानते हैं। उनके कथन का आधार है भागवतपुराण में आन्ध्रवंश के प्रथम राजा को 'शूद्र' कहना। यह भी सम्भव है कि सिमुक का वास्तविक नाम 'शूद्रक' ही रहा हो। M.R. काले महोदय ने आन्ध्रवंश का प्रथम राजा 'शूद्रक' ही माना है। उसका यह समय आन्तरिक प्रमाणों से भी पुष्ट होता है और उसके पूर्ववर्ती कवि भास के समय से भी मेल खाता है।²

(२) आन्ध्रवंश का राज्य दक्षिण भारत में था और वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति के एक टीकाकार के अनुसार 'शूद्रक' भी दक्षिण का था। इस कथन की पुष्टि मृच्छकटिक के अन्तःसाक्ष्यों से भी होती है। दूसरे अंक में 'खुण्डमोटक' शब्द का प्रयोग दक्षिण भारत का है। दशम अंक में चारुदत्त के वध के समय चाण्डालों द्वारा 'सह्यवासिनी' का स्मरण “भगवति सह्यवासिनि ! प्रसीद प्रसीद” भी दाक्षिणात्य होने में प्रमाण है। भवभूति ने भी दुर्गा को इसी नाम से लिखा है। इसके विपरीत उत्तर भारत में 'विन्ध्यवासिनी' शब्द प्रयुक्त होता है। छठे अंक में वीरक और चन्दनक के कलह में 'दाक्षिणात्य' तथा 'कर्णाटककलहप्रयोग' आदि शब्द यही सिद्ध करते हैं। पैसा के अर्थ में 'नाणक' का प्रयोग भी उक्त कथन की पुष्टि करता है। इससे शूद्रक का दाक्षिणात्य होना सिद्ध होता है।³ परन्तु कुछ विद्वान उज्जयिनी का विशेष वर्णन देखकर वहीं का मानते हैं। अथवा दक्षिण से आकर वहाँ रहने लगा हो, ऐसा कहते हैं।

राजशेखर के अनुसार 'रामिल' और 'सोमिल' नामक कवियों ने 'शूद्रककथा' नाम का ग्रन्थ लिखा था⁴। यह 'सोमिल' वही प्रतीत होता है जिसका उल्लेख कालिदास ने 'सौमिल्लक' नाम से किया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि


१. त्रिषु वर्षसहस्रेषु कलेर्यातेषु पार्थिव।
त्रिशतेषु दशन्यूनेष्वस्यां भुवि भविष्यति ॥
शूद्रको नाम वीराणामधिपः सिद्धिमत्र सः।
चर्चितायां समाराध्य लप्स्यते भूभयापहः ॥

२. मृच्छकटिक भूमिका M.R. काले पृ० १९।
३. द्र० मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवासशास्त्री पृ० १३ ।

४. तौ शूद्रककथाकारौ रम्यो रामिलसौमिलौ।
काव्यं ययोर्द्वयोरासीदर्धनारीनरोपमम् ॥