मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ मृच्छकटिक
'सोमिल' कालिदास से प्राचीन था और शूद्रक इसका समकालीन या इससे पूर्ववर्ती था।
प्रो० कोनो ने आभीरवंश के राजा शिवदत्त को ही शूद्रक बताया है। इनका राज्यकाल ई० की तीसरी शती है। इसका आधार 'गोपालदारक' शब्द है।$^१$ अन्य कुछ विद्वानों ने भी कुछ शब्दों के साम्यादि को आधार मानकर अनेक कल्पनायें की हैं जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
साहित्यिक उल्लेख :
कुछ ऐसे साहित्यिक उल्लेख यह सिद्ध करते हैं कि उदयन तथा विक्रमादित्य के समान शूद्रक भी एक साहित्यानुरागी राजा था। शूद्रक के नाम से 'विक्रान्त-शूद्रक' 'शूद्रकवध', 'शूद्रकचरित' आदि ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है। परन्तु अभी तक ये ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हुये हैं। अतः इनके द्वारा किसी प्रकार का निर्णय करना कठिन है। कल्हण ने अपनी 'राजतरंगिणी' में और सोमदेव ने अपने 'कथासरित्-सागर' में 'शूद्रक' का उल्लेख किया है। बाण ने अपनी 'कादम्बरी' में शूद्रक को विदिशा का राजा बताया है और 'हर्षचरित' में इसे चन्द्रकेतु का शत्रु कहा है। दण्डी ने भी 'दशकुमारचरित' में शूद्रक का उल्लेख किया है। 'वेताल-पंचविंशतिका' में शूद्रक की राजधानी 'वर्धमान' या 'शोभावती' कही गयी है। वामन ने अपने काव्यालंकारसूत्र में शूद्रक का कवि के रूप में स्पष्ट उल्लेख किया है और मृच्छकटिक के कुछ उदाहरण भी दिये हैं।$^२$
उपर्युक्त विवेचन से यह प्रतीत होता है कि शूद्रक नाम के कई राजा और कवि हुये थे। परन्तु मृच्छकटिक का रचयिता कौन सा शूद्रक है-यह कहना कठिन है।
मृच्छकटिक का रचनाकाल
जिस प्रकार मृच्छकटिक के कर्ता शूद्रक का व्यक्तित्व विवादग्रस्त है ठीक इसी प्रकार इनका काल भी। इनका काल ई० पू० ३०० से लेकर ई०अ० ६०० तक के मध्य में दोलायमान है।
(क) ई० पू० ३०० से लेकर ई० प्रथम शती तक :
कुछ विद्वान यह कहते हैं कि मृच्छकटिक का रचयिता शूद्रक आन्ध्रवंशीय प्रथम राजा से अभिन्न है। अतः इसका काल ई० पू० तीसरी शती से लेकर ई०
१ मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तेलंग पृ० ८।
२. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० ८।